राजनीतिक परिवारों के वारिसों के उतावलेपन से उलझी महाराष्ट्र की राजनीति via NavbharatTimes
मुंबई महाराष्ट्र के प्रमुख राजनीतिक परिवारों के वारिसों की सत्ता में आने की लालसा से राजनीतिक मंजर उलझ गया है। लोकसभा चुनावों से ठीक पहले राजनीतिक घरानों की युवा पीढ़ी की टिकट पाने की बेसब्री से हलचल मच गई है। वंशवाद की राजनीति में युवाओं को अपने राजनीतिक गार्जियन की छाया में पलना होता है और ऐक्टिव पॉलिटिक्स में आने से पहले खुद को मांझना पड़ता है। हालांकि एनसीपी चीफ शरद पवार की फैमिली तथा कांग्रेस के सीनियर नेता राधाकृष्ण विखे पाटील के बेटे की महत्वकांक्षा के आगे राजनीति की यह विरासत खतरे में आ गई है। नैशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार के भतीजे के बेटे पार्थ ने लोकसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। अजीत पवार के बेटे पार्थ ने मावल सीट पर दावेदारी पेश की है। इससे पहले शरद ने पार्थ के चुनाव लड़ने की संभावनाओं को खारिज करते हुए कहा था कि चूंकि वह और उनकी पुत्री सुप्रिया सुले चुनाव लड़ रहे हैं, लिहाजा एक ही परिवार से अगर 3 उम्मीदवार चुनाव में उतरेंगे तो पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच गलत संदेश जाएगा। एनसीपी में अब तक पवार ही जो कहते थे वह होता था। हालांकि उनके इस बयान के बावजूद पार्थ और उनके पिता अजित ने मावल सीट पर संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दीं। जब पवार ने यह भांप लिया कि उनके भतीजे चुनाव लड़ने को लेकर अडिग हैं तो उन्होंने चुनाव में नहीं उतरने का फैसला किया। इस कदम से अजित पवार पर अपने बेटे को पवार को मनाने के लिए दबाव बढ़ गया है। कांग्रेस के सीनियर नेता तथा विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल के बेटे सुजय ने मंगलवार को बीजेपी का दामन थाम लिया, क्योंकि उन्हें अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए अपने गृह क्षेत्र अहमदनगर से टिकट नहीं मिल सका था। सुजय ने ठाकरे ने अपनी उम्मीदवारी के लिए शिवसेना के समर्थन की मांग की। बता दें कि अहमदनगर सीट कांग्रेस की गठबंधन सहयोगी एनसीपी के खाते में चली गई है और वह सुजय के लिए अहमदनगर सीट खाली करने को तैयार नहीं थी। हालांकि महाराष्ट्र में पहले भी राजनीतिक उत्तराधिकार शांति से हुआ। 1960 के दौर से शुरू हुआ सिलसिला नासिक के हिरे, विरार के वर्तक, विखे पाटिल, पवार, नांदेड़ के च्वहाण परिवारों में बिना किसी गहमा-गहमी के सत्ता का हस्तांतरण हो गया। विद्रोह का पहला स्वर मुंबई के ठाकरे घराने से फूटा था, जहां बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने बागी तेवर अपनाते हुए अलग पार्टी का निर्माण कर लिया। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक नेताओं के बच्चों का राजनीति में आना गलत नहीं है, लेकिन उन्हें बैठे-बिठाए सत्ता का सुख दे देना सही नहीं है। राजनीतिक विरासत संभालने की सीढ़ी चढ़ने से पहले छोटी जिम्मेदारियां या प्रभार देना चाहिए। शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने कहा, 'मेरे पिता मुझे मंत्रालय भेजते थे। मुझे विभाग में फाइलें देखकर यह समझ में आता था कि राज्य में प्रशासन कैसे काम करता है। महिला सशक्तिकरण के मुद्दे को उठाने से पहले मुझे काम समझने का मौका मिला।' पूनम महाजन, मिलिंद देवड़ा, अमित देशमुख, प्राणिती शिंदे जैसे नेताओं ने सफलता से राजनीतिक विरासत को संभाला। वहीं अभी बाल ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे, राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे, नारायण राणे के बेटे नितेश राणे जैसे युवा अभी राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए तैयार बैठे हैं।.
मुंबई महाराष्ट्र के प्रमुख राजनीतिक परिवारों के वारिसों की सत्ता में आने की लालसा से राजनीतिक मंजर उलझ गया है। लोकसभा चुनावों से ठीक पहले राजनीतिक घरानों की युवा पीढ़ी की टिकट पाने की बेसब्री से हलचल मच गई है। वंशवाद की राजनीति में युवाओं को अपने राजनीतिक गार्जियन की छाया में पलना होता है और ऐक्टिव पॉलिटिक्स में आने से पहले खुद को मांझना पड़ता है। हालांकि एनसीपी चीफ शरद पवार की फैमिली तथा कांग्रेस के सीनियर नेता राधाकृष्ण विखे पाटील के बेटे की महत्वकांक्षा के आगे राजनीति की यह विरासत खतरे में आ गई है। नैशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार के भतीजे के बेटे पार्थ ने लोकसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। अजीत पवार के बेटे पार्थ ने मावल सीट पर दावेदारी पेश की है। इससे पहले शरद ने पार्थ के चुनाव लड़ने की संभावनाओं को खारिज करते हुए कहा था कि चूंकि वह और उनकी पुत्री सुप्रिया सुले चुनाव लड़ रहे हैं, लिहाजा एक ही परिवार से अगर 3 उम्मीदवार चुनाव में उतरेंगे तो पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच गलत संदेश जाएगा। एनसीपी में अब तक पवार ही जो कहते थे वह होता था। हालांकि उनके इस बयान के बावजूद पार्थ और उनके पिता अजित ने मावल सीट पर संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दीं। जब पवार ने यह भांप लिया कि उनके भतीजे चुनाव लड़ने को लेकर अडिग हैं तो उन्होंने चुनाव में नहीं उतरने का फैसला किया। इस कदम से अजित पवार पर अपने बेटे को पवार को मनाने के लिए दबाव बढ़ गया है। कांग्रेस के सीनियर नेता तथा विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल के बेटे सुजय ने मंगलवार को बीजेपी का दामन थाम लिया, क्योंकि उन्हें अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए अपने गृह क्षेत्र अहमदनगर से टिकट नहीं मिल सका था। सुजय ने ठाकरे ने अपनी उम्मीदवारी के लिए शिवसेना के समर्थन की मांग की। बता दें कि अहमदनगर सीट कांग्रेस की गठबंधन सहयोगी एनसीपी के खाते में चली गई है और वह सुजय के लिए अहमदनगर सीट खाली करने को तैयार नहीं थी। हालांकि महाराष्ट्र में पहले भी राजनीतिक उत्तराधिकार शांति से हुआ। 1960 के दौर से शुरू हुआ सिलसिला नासिक के हिरे, विरार के वर्तक, विखे पाटिल, पवार, नांदेड़ के च्वहाण परिवारों में बिना किसी गहमा-गहमी के सत्ता का हस्तांतरण हो गया। विद्रोह का पहला स्वर मुंबई के ठाकरे घराने से फूटा था, जहां बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने बागी तेवर अपनाते हुए अलग पार्टी का निर्माण कर लिया। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक नेताओं के बच्चों का राजनीति में आना गलत नहीं है, लेकिन उन्हें बैठे-बिठाए सत्ता का सुख दे देना सही नहीं है। राजनीतिक विरासत संभालने की सीढ़ी चढ़ने से पहले छोटी जिम्मेदारियां या प्रभार देना चाहिए। शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने कहा, 'मेरे पिता मुझे मंत्रालय भेजते थे। मुझे विभाग में फाइलें देखकर यह समझ में आता था कि राज्य में प्रशासन कैसे काम करता है। महिला सशक्तिकरण के मुद्दे को उठाने से पहले मुझे काम समझने का मौका मिला।' पूनम महाजन, मिलिंद देवड़ा, अमित देशमुख, प्राणिती शिंदे जैसे नेताओं ने सफलता से राजनीतिक विरासत को संभाला। वहीं अभी बाल ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे, राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे, नारायण राणे के बेटे नितेश राणे जैसे युवा अभी राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए तैयार बैठे हैं।
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