बिहार विधानसभा चुनाव में राजद की करारी हार के बाद लालू प्रसाद यादव के परिवार में फूट पड़ गई है। रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर परिवार और पार्टी से नाता तोड़ने की घोषणा की है। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर गंभीर आंतरिक मतभेद को उजागर किया है।
राजद की करारी हार के बाद पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के परिवार में भी दरार सामने आने लगी हैं। चुनावी नतीजों के अगले ही दिन पार्टी और परिवार के मुखिया लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने परिवार और पार्टी से नाता तोड़ने की घोषणा सोशल मीडिया पर की है। इससे पहले लालू यादव ने अपने बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को ख़राब आचरण का हवाला देते हुए पार्टी और परिवार से निष्कासित कर दिया था। एक्स पर एक पोस्ट में रोहिणी आचार्य ने लिखा, ‘मैं राजनीति छोड़ रही हूं और अपने परिवार से नाता तोड़ रही हूं। यही संजय
यादव और रमीज़ ने मुझे करने को कहा था.. और मैं पूरा दोष अपने ऊपर ले रही हूं।’ संजय यादव राजद से राज्यसभा सांसद हैं और तेजस्वी यादव के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाते हैं। वहीं उत्तर प्रदेश के एक राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाले रमीज़ तेजस्वी के पुराने मित्र हैं। हालांकि रोहिणी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि दोनों ने उनसे क्या करने को कहा था, लेकिन उनका यह ट्वीट लालू परिवार के अंदर आंतरिक मतभेद को साफ़ साफ़ दिखाता है। रोहिणी राजनीति में ज्यादा सक्रिय चेहरा नहीं हैं, वे पेशे से डॉक्टर हैं और सिंगापुर में रहती हैं। अपने पिता लालू प्रसाद यादव को किडनी दान करने के बाद वह पूरे देश में चर्चित हुईं थीं।\रोहिणी के विरोधाभासी संकेत स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। एक समय उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को सोशल मीडिया पर अनफॉलो कर दिया था और आरोप लगाया था कि उनके बारे में गलत जानकारी फैलाई जा रही है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से चुनौती देते हुए अपने पिता को किडनी देने के निर्णय का बचाव किया था और आलोचकों को माफी मांगने की चेतावनी दी थी। इसके बावजूद, चुनाव अभियान के दौरान वे तेजस्वी के लिए प्रचार करती रहीं, उनके जन्मदिन पर तारीफ वाले संदेश साझा किए और पार्टी लाइन के समर्थन में खड़ी दिखाई दीं। अब उन्होंने पार्टी की करारी हार के बाद पार्टी और परिवार को छोड़ने की घोषणा करके संदेश दिया है कि परिवार के भीतर लंबे समय से कोई गहरा मतभेद पनप रहा था। यह स्थिति पार्टी के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई है, जो आगामी चुनाव में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए संघर्ष कर रही है। हार के बाद पार्टी के अंदरूनी कलह का उजागर होना, पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मनोबल गिरने की संभावना है।\ज्ञात हो कि शुक्रवार को घोषित बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों में राजद ने अपने इतिहास का दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन किया। 143 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी केवल 25 सीटें जीत पाई। वहीं राजद के नेतृत्व में महागठबंधन ने महज 35 सीटें जीतीं। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में पार्टी के खराब प्रदर्शन के कारण, पार्टी के भीतर नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं। चुनाव परिणामों के बाद, तेजस्वी यादव की राजनीतिक भविष्य पर भी सवालिया निशान लग गया है। इस हार ने पार्टी को अपनी रणनीति और संगठनात्मक ढांचे पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। पार्टी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती है कार्यकर्ताओं और समर्थकों के विश्वास को बहाल करना और आगामी चुनाव के लिए एक मजबूत रणनीति बनाना। पार्टी को अपनी कमजोरियों को दूर करना होगा, आंतरिक कलह को समाप्त करना होगा और एक एकजुट होकर काम करना होगा। पार्टी को जनता का विश्वास जीतने के लिए जमीनी स्तर पर काम करना होगा और लोगों की समस्याओं को सुनना होगा। पार्टी को अपने घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करने के लिए भी काम करना होगा। पार्टी के लिए यह एक कठिन दौर है, लेकिन अगर पार्टी एकजुट होकर काम करती है, तो वह निश्चित रूप से फिर से उठ खड़ी होगी
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