मथानी और चक्की… गांव की महिलाएं आज भी अपनाती हैं यह सदियों पुराना तरीका, तस्वीरों के जरिए जानें पूरा प्रोसे...

मथानी से मक्खन News

मथानी और चक्की… गांव की महिलाएं आज भी अपनाती हैं यह सदियों पुराना तरीका, तस्वीरों के जरिए जानें पूरा प्रोसे...
लखीमपुर खीरीलोकल 18Butter From Churner
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उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के कुछ ग्रामीण इलाकों में आज भी ऐसा नज़ारा देखने को मिलता है, जो आपको पुराने जमाने की याद दिला देगा. सालों पहले जिन चीज़ों का रोज़मर्रा में इस्तेमाल होता था, वो अब मशीनरी के चलते गायब होती जा रही हैं. लेकिन, कुछ महिलाएं आज भी इन पुरानी परंपराओं को जीवित रख रही हैं.

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के ग्रामीण इलाकों में आज भी कुछ ऐसी चीजें देखने को मिलती हैं, जिनका उपयोग सालों पहले होता था. हालांकि मशीनीकरण के चलते ये चीजें अब धीरे-धीरे ग्रामीण क्षेत्रों से गायब होती जा रही हैं.

फिर भी, कुछ इलाकों में महिलाएं आज भी इन पुरानी चीजों का इस्तेमाल करती हैं. जब मशीन नहीं थी, तो गांव की महिलाएं दही से छाछ यानी मट्ठा और मक्खन निकालने का काम मथानी से किया करती थीं. आज भी, मशीनरीकरण के बावजूद, कुछ गांवों में महिलाएं मथानी से मक्खन निकालती हैं. यह परंपरा अब शहरी क्षेत्रों में खत्म हो गई है; शहरों में आपको मथानी शायद ही देखने को मिले. मथानी का इस्तेमाल करने वाली ग्रहणी मंजू ने बताया कि मथानी लकड़ी से बनाई जाती है. मथानी दो प्रकार की होती है: एक बड़ी मथानी जिसे रस्सी से बांधकर मक्खन निकाला जाता है, और एक छोटी मथानी जिसे हाथ से चलाया जाता है और मक्खन आसानी से निकल आता है. मथानी से निकला मक्खन स्वाद में बहुत ही अलग और खास होता है. पहले जमाने में, जब गांव में आटा पीसने के लिए चक्की नहीं होती थी, तब महिलाएं हाथ से ही चक्की चलाकर आटा पीसती थीं. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी चकरी का इस्तेमाल होता है. महिलाएं चना और अरहर की दाल, दलिया पीसने का काम आज भी इसी चक्की से करती हैं. यह पत्थर की होती है और गांव की महिलाएं इसे आसानी से हाथ से चला लेती हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मूसर का इस्तेमाल देखा जा सकता है. पहले महिलाएं मूसर के माध्यम से धान की कुटाई किया करती थीं. हालांकि अब इसका रोजमर्रा के काम में उपयोग कम हो गया है, लेकिन शादी-विवाह में मूसर आज भी दिखाई देता है. जब लड़की की बारात निकलती है, तो कुछ पारंपरिक रस्मों में मूसर का इस्तेमाल किया जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी महिलाएं सिकहरा का इस्तेमाल करती हैं. यह प्लास्टिक की रस्सी से बनाया जाता है और जाली नुमा होता है. इसे ऊंचे स्थान पर टांग दिया जाता है, जिससे बिल्लियां और चूहे आसानी से नहीं पहुंच पाते और भोजन सुरक्षित रहता है. पुराने जमाने में जब फ्रिज नहीं होती थी, तब रोटी, सब्ज़ी और दूध जैसी चीजें इसमें रखी जाती थीं.

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