मध्य प्रदेश सरकार ने भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए लड़ाई लड़ रहीं सामाजिक कार्यकर्ता रचना ढींगरा ने भोपाल से पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र लाए गये 346 में से 337 मीट्रिक टन इस जहरीले कचरे में कौन कौन से रसायन हैं जिनकी आमद की खबर सुनकर ही पीथमपुर के लोग आंदोलित हो गये हैं. इन जहरीले कचरों की रसायनिक संरचना क्या है? इन कचरों का मानव स्वास्थ्य पर कितना भयंकर नुकसान होता है?
भोपाल गैस त्रासदी से निकली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस इतनी खतरनाक है कि इंसान के खून में मिलने के बाद प्रोटीन और एनजाइम की संरचना में ही बदलाव कर देती है. ये परिवर्तन कोई कुछ समय के लिए नहीं होता है बल्कि स्थायी होता है. इन बदलावों की वजह से शरीर की सामान्य काम-काज की प्रणाली भी प्रभावित होती है. ये शारीरिक बदलाव ऐसे होते हैं जिसमें रिकवरी असंभव सी होती है और व्यक्ति हमेशा के लिए इस दंश को झेलने पर मजबूर हो जाता है. ये निष्कर्ष इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के शोध से सामने आए हैं.
भोपाल में यूनियन कार्बाइड के प्लांट से निकला ये जहरीला कचरा अबतक भोपाल में दबा था. लेकिन इसे अब नष्ट करने के लिए 1 जनवरी को भोपाल से लगभग 250 किलोमीटर दूर पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र में ले जाया गया है. हालांकि मध्य प्रदेश सरकार के इस फैसले का पीथमपुर के लोगों ने इतना तीव्र विरोध हुआ कि सरकार ने इस जहरीले कचरे को जलाने पर फिलहाल रोक लगा दी है. भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए लड़ाई लड़ रहीं सामाजिक कार्यकर्ता रचना ढींगरा ने आजतक डॉट इन से बातचीत में कहा है कि सरकार का ये फैसला पीथमपुर में दूसरा 'भोपाल' (Create a slow motion Bhopal) बना देगा. रचना ढींगरा ने सरकारी अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि अभी भी 11 लाख टन जहरीला कचरा और मिट्टी भोपाल के वातावरण और ग्राउंडवाटर को जहरीला बना रहा है
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