उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले के कई गाँव भेड़िये के खौफ़ में रह रहे हैं लोग. जानिये क्यों बढ़ रहे हैं इंसानों पर हमले.
17 मिनट पहलेये इलाक़ा भारत-नेपाल सीमा से सटे तराई अंचल का है, जहाँ भेड़ियों का झुंड ख़ासतौर से बच्चों को निशाना बना रहा है. भेड़ियों के हमलों से बड़े भी महफ़ूज़ नहीं हैं. इस इलाक़े में जुलाई महीने से अब तक भेड़िए छह बच्चों को अपना शिकार बना चुके हैं और तकरीबन 26 लोग उनके हमले में घायल हो चुके हैं.
वन विभाग भेड़ियों के झुंड को पकड़ने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा है, लेकिन अभी तक तीन भेड़िए ही पकड़े जा सके हैं. वन विभाग की नौ टीमें इस अभियान में जुटी हुई हैं और भेड़ियों की मौज़ूदगी वाले इलाक़े में चार पिंजरे और छह कैमरे लगाए गए हैं. वन विभाग भेड़ियों की तलाश के लिए थर्मल ड्रोन का भी इस्तेमाल कर रहा है.इमेज कैप्शन,बहराइच के डीएफओ अजीत प्रताप सिंह का कहना है, "हम गांव वालों से कह रहे हैं कि बच्चों को बाहर न सुलाएं. इस इलाक़े में ज़्यादातर घरों में दरवाज़े ना होने से भेड़िए घर में घुस जाते हैं." उन्होंने कहा, "जहाँ तक भेड़ियों की बात है, ये इंसान पर हमला नहीं करते. लेकिन ऐसा लग रहा है कि किन्हीं हालात में उन्होंने ग़लतफ़हमी में इंसानों पर हमला किया और उसके बाद उन्हें इसकी आदत पड़ गई है."उन्होंने कहा, "हम नहीं चाहते हैं कि किसी वन्यजीव या इंसान की जान जाए, हमने अब तक तीन भेड़ियों को पकड़ा भी है." इस साल प्रदेश भर में रेस्क्यू किए गए वन्यजीव प्राणियों को लेकर मंत्री ने कहा, “जनवरी 2024 से 23 अगस्त 2024 तक 27 तेंदुए और तीन बाघ भी रेस्क्यू किए गए हैं."इमेज कैप्शन,दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर बहराइच ज़िले की महसी तहसील के तकरीबन 100 वर्ग किलोमीटर के 25 से 30 गांव भेड़ियों के खौफ़ से प्रभावित हैं. यह क्षेत्र भारत-नेपाल सीमा से सटा हुआ है. डीएफओ अजीत प्रताप सिंह ने बीबीसी को बताया, "पहली बार भेड़िए इंसानों के बच्चों को ग़लती से निशाना बनाते हैं." उन्होंने कहा, "मौसम की वजह से भेड़ियों की मांद में पानी भर जाता है तो वे आबादी की तरफ़ बढ़ते हैं और ग़लती से इंसान को निशाना बनाते हैं, फिर उन्हें इसकी आदत पड़ जाती है."बीबीसी की टीम ने बहराइच ज़िले के कई गांवों का दौरा किया, जिसमें मैकूपुरवा के इलाक़ा भी शामिल है. यहां के एक पुरवे में भेड़ियों ने रात के वक़्त सोते हुए आठ साल के उत्कर्ष को उठा ले जाने की कोशिश की. हालांकि, उसकी माँ वक़्त रहते जाग गई और उसने भेड़िये के चंगुल में फंसे उत्कर्ष को पकड़ लिया.मैकूपुरवा के प्रधान अनूप सिंह ने बीबीसी को बताया, "17 अप्रैल को इस तरह की पहली घटना घटी थी. उससे पहले मार्च में भी हमला हुआ था, तब से गांव में लगातार गश्त की जा रही है. उन्होंने बताया, "वन विभाग की टीम रात में पहरे पर रहती है. हम लोग रात जागकर काटते हैं, लेकिन फिर सुनने में आता है कि किसी और गांव में भेड़ियों के हमले की घटना हो गई." हालांकि, इस इलाक़े में हर साल घाघरा नदी की वजह से बाढ़ आती है. जिसकी वजह से भेड़ियों की मांद में पानी भर जाता है, लेकिन यह एक बड़े अरसे के बाद हुआ है कि भेड़ियों ने इंसानों पर हमला करना शुरू किया है.डीएफओ ने बताया, "तकरीबन 20 साल पहले भेड़ियों ने इंसानों पर हमला किया था. गोंडा, बहराइच और बलरामपुर, इन तीन ज़िलों में भेड़ियों के हमलों से तकरीबन 32 बच्चों की जान चली गई थी. इसके बाद से इस तरह भेड़िए के हमले नहीं हुए हैं."पिछली बार की तरह इस बार भी वैसे ही हालात हैं, जिसको लेकर स्थानीय लोगों में इससे ग़ुस्सा बढ़ रहा है. डीएफ़ओ का कहना है, "इन हालात में कभी-कभी जब भेड़िये उनकी पकड़ में आ जाते हैं, तब कई बार होता है कि स्थानीय निवासी जानवर को विभाग से छीनकर मारने की कोशिश करते हैं." ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस में वन्य जीवन अधिनियम के तहत मामला भी दर्ज किया जाता है. बहराइच में वन विभाग की टीम पर हमला करने के आरोप में तीन लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है.अयोध्या में नाबालिग के कथित बलात्कार के बाद राज्य में शुरू हुई सियासत17 अगस्त की रात चार साल की संध्या को भेड़िया खीच ले गया था बाद में जिसकी आधी खाई हुई लाश खेत में मिली थी भेड़ियों के हमलों से बचने के लिए ग्रामीण पहरेदारी कर रहे हैं. हालांकि, यह उनके लिए आसान नहीं है. रात में बिजली नहीं होने और अंधेरा होने की वजह से चुनौती और भी बढ़ जाती है. मैकूपुरवा गांव के रामलाल का कहना है, "बिजली की समस्या की वजह से भेड़िए अंधेरे का फ़ायदा उठाते हैं. हम लोग ज़िलाधिकारी तक बात पहुँचा चुके हैं लेकिन रात में बिजली नहीं आती है. अगर रात में बिजली रहे तो कुछ आसान हो जाए." भेड़ियों के हमलों की पिछली घटना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया, "रात में भी गाँव में जानवर आया था. चौकसी के कारण कोई घटना नहीं हो पाई है, लेकिन 17 अगस्त की रात में हिंदूपुरवा गांव से चार साल की संध्या को भेड़िया उठा ले गया."घटना के बारे में संध्या की मां सुनीता ने बताया, "जैसे ही लाइट गई है, वैसे ही दो मिनट के भीतर भेड़िए ने हमला किया और जब तक हम लोग कुछ समझ पाते, वो उसे लेकर भाग चुका था." मैकूपुरवा गांव की तरह ही आसपास के गांवों में भी भेड़ियों ने इंसानी बच्चों पर हमले किए. 21 अगस्त को भटोली गांव के पास भेड़िए ने एक बच्ची का शिकार किया. हिंदूपुरवा गांव के पास नसीरपुर गांव में चार साल की सबा पर भी हमला हुआ था, लेकिन उसके पिता ने बच्ची को पकड़े रखा तो वह बच गई. लेकिन उसके सिर पर काफ़ी चोट आई है और पट्टी बंधी हुई है. भेड़िये के हमले को लेकर सबा के पिता शकील ने बताया, "मैं जानवर के पीछे दौड़ा, लेकिन सिर्फ़ पीछे से देख पाया. जब घर लौटे तो उनकी बेटी के सिर से बहुत ख़ून बह रहा था क्योंकि जानवर ने सिर की तरफ़ से पकड़ रखा था." वन विभाग के अफ़सर गांव वालों को चौकसी बरतने के लिए जागरूक भी कर रहे हैं. इसके लिए सार्वजनिक एलान भी कराया जा रहा है ताकि लोग सतर्क रहें. साथ ही गांव वालों को पटाखे भी दिए गए हैं कि वे ख़तरे को देखते ही इसका उपयोग करें, जिसकी आवाज़ से जानवर भाग जाते हैं. रात में जानवरों से होने वाले ख़तरों को लेकर वन विभाग के अफसर अजीत प्रताप सिंह का कहना है, "इलाक़े में बहुत ज़्यादा ग़रीबी है. लोगों के पास पक्के मकान नहीं हैं और वो बाहर सोते हैं. इसलिए ख़तरा बना हुआ है."इमेज कैप्शन, डीएफओ के मुताबिक इस झुंड में एक वयस्क भेड़िया लंगड़ा है, तो हो सकता है कि वो ज़्यादा खूंखार हो. इसलिए उसको पकड़ने की कोशिश की जा रही है डीएफओ अजीत प्रताप सिंह ने बताया, "हम जल्द ही बाकी बचे हुए जानवरों को पकड़ लेंगे. जो तीन जानवर पकड़े गए हैं, उसमें एक की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है. बाकी दोनों को लखनऊ के चिड़ियाघर में भेजा गया है, जिनमें एक नर और मादा है." उन्होंने बताया, "इस झुंड में एक वयस्क भेड़िया लंगड़ा है, तो हो सकता है कि वो ज़्यादा खूंखार हो. इसलिए उसको पकड़ने की कोशिश की जा रही है."इस दौरान सत्तार ने बताया, "उन्हें तीन भेड़िए दिखे हैं, जिसमें एक लंगड़ा कर चल रहा है और दो अभी अवयस्क लग रहे हैं."डीएफ़ओ के मुताबिक़, भेड़ियों के हमलों में मारे गए लोगों के आश्रितों को सरकार पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता दे रही है, जिनमें चार लाख रुपये प्रशासन की तरफ़ से और एक लाख रुपये वन विभाग की तरफ़ से दिया जा रहा है.उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, लखीमपुर खीरी जिले के धौरहरा में भड़िए के हमले में 21 लोग ज़ख्मी हो गए थे. ये सभी हमले दुधवा टाइगर रिजर्व के बफ़र ज़ोन में हुए थे, जिसमें तकरीबन 8 गांव के लोगों को निशाना बनाया गया था.अखिलेश यादव ने माताप्रसाद पांडे को विपक्ष का नेता बनाकर क्या योगी आदित्यनाथ को दिया है संदेश?इलाके में पानी भरे रहने और गन्ने की फसल बढ़ने के कारण भेड़ियों की खोजबीन में ड्रोन से काफी मदद मिल रही है वन विभाग के डीएफओ की निगरानी में बहराइच के रेंज अफसर और उनकी टीम ड्रोन के ज़रिए इलाके के कछार और गन्ने के खेतों में सुबह से रात तक भेड़ियों को लोकेट करने की कोशिश करती है, जिसमें गांव-गांव जाकर किसानों और घास काटने वालों से भी पूछताछ की जाती है.किसानों से मिली जानकारी के हिसाब से भेड़ियों की मौज़ूदगी के संदेह वाले इलाके की घेराबंदी कर उन्हें पकड़ने का प्रयास किया जाता है. साथ ही जानवर को कोई चोट ना लगे इसका ध्यान भी रखा जाता है. बहराइच के रेंज अफसर मोहम्मद साकिब ने बीबीसी को बताया, "इलाके में पानी भरा है. गन्ने की फसल भी बढ़ गई है, जिससे भेड़ियों की खोजबीन में परेशानी हो रही है." "इसके अतिरिक्त ड्रोन भी ओवरहीट हो जाता है तो काम करना बंद कर देता है. तब हम स्थानीय लोगों से मदद लेकर भेड़ियों की घेराबंदी करते हैं. फिर जाल लगाते हैं और पिंजरा भी तैयार रखते हैं ताकि भेड़िया पिंजरे में आ जाए. ये सावधानी भी बरतनी पड़ती है कि कहीं जानवर को चोट ना लग जाए." उत्तर प्रदेश के वन मंत्री अरुण कुमार सक्सेना ने मानव-वन्यजीव संघर्षों को रोकने के लिए भविष्य में चलाए जाने वाले अभियानों और कार्यक्रमों को लेकर बीबीसी से बात की. उन्होंने बताया, "उच्च स्तर पर मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए वन विभाग फेंसिंग का भी काम शुरू करने वाला है. इंसानों की जान हानि रोकने के लिए संवेदनशील गांवों की सूची तैयार कर असुरक्षित क्षेत्रों में गूगल मैपिंग के माध्यम से वन्यजीव प्रभावित क्षेत्रों का विश्लेषण कर सुनियोजित तरीके से कार्रवाई की जा रही है." उन्होंने कहा, "समय-समय पर सक्षम स्तर से अनुमति प्राप्त करके पिंजरा लगाकर, उसमें बेंट बंधवाकर संघर्षी वन्यजीव को पकड़ने का प्रयास किया जा रहा है."हाथरस हादसा: अस्पतालों ने कहा, 'सच ये है कि हम तैयार नहीं थे'- बीबीसी पड़तालप्रोफेसर अमिता कनौजिया कहती हैं कि क्लाइमेट चेंज का सीधा असर तो नहीं, लेकिन जैसे बाढ़ आने के कारण हो सकता है भेड़िए आसान भोजन की तलाश में बच्चों को उठा रहे हैं. इंसानों और भेड़ियों के बीच संघर्ष दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिले हैं. इसको लेकर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है. अमेरिका के ऊपरी प्रायद्वीप में भी इंसानों और भेड़ियों के बीच संघर्ष देखा गया है. मिशीगन स्थित डिपार्टमेंट ऑफ नेचुरल रिसोर्सेस के वन्यजीव जीवविज्ञानी ब्रायन रॉएल का मानना है कि ऐसे संघर्ष बहुत कम होते हैं. साप्ताहिक पत्रिका नॉर्देन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में ब्रायन रॉएल कहते हैं, "भेड़िए और अवारा कुत्ते यानि फेरल डॉग्स के बीच टकराव देखा गया है, लेकिन इंसानों पर हमले के मामले बहुत ही कम हैं." रॉएल जो कि भेड़ियों के विशेषज्ञ माने जाते हैं, भेड़िये और पालतू जानवरों के बीच टकराव को लेकर कहते हैं, "ऐसे हमले बहुत कम हैं, ख़ासकर ऊपरी प्रायद्वीप का परिदृश्य काफी बड़ा है और यहां कितने सारे पालतू जानवर हैं.वाइल्ड लाइफ एसओएस के मुताबिक़, प्राकृतिक बदलाव की वजह से मौसम और ऋतु पर असर हो रहा है, जिसकी वजह से वन्य जीवों पर भी इसका प्रभाव ब्रीडिंग सीज़न और माइग्रेशन पर देखने को मिल रहा है. इसलिए जंगली जानवरों के साथ मुठभेड़ बढ़ रही है. इंसानों और जानवरों के बीच टकराव पर बीबीसी ने लखनऊ यूनिवर्सिटी के वाइल्ड लाइफ़ साइंस की समन्वयक प्रोफेसर अमिता कनौजिया से बात की. उन्होंने कहा, "ये कोई नई बात नहीं है. पहले तो भेड़िए झुंड में रहते हैं और इनका सोशल स्ट्रक्चर बहुत मज़बूत होता है, जिसमें दो से दस जानवर तक रह सकते हैं. ये ब्रीडिंग सीज़न यानि अक्तूबर से पहले सुरक्षित जगह की तलाश करते हैं, फिर अपने बच्चों को वयस्क होने तक पालते हैं और उनको शिकार करना भी सिखाते हैं." इंसानों पर हमला करने को लेकर प्रोफेसर कनौजिया कहती हैं, "ये इंसान की आबादी की तरफ़ फेरल यानि अवारा कुत्तों की तलाश में रहते हैं और गलती से इंसान पर हमला करते हैं. फिर वही आदत बन जाती है." जब उनसे पूछा गया कि क्या ये क्लाइमेट चेंज की वजह से है, तो प्रोफेसर अमिता कनौजिया ने बताया, "क्लाइमेट चेंज एक धीमी प्रक्रिया है. इसका सीधा असर तो नहीं, लेकिन जैसे बाढ़ आना, ये कारण हो सकता है कि भेड़िए आसान भोजन की तलाश में बच्चों को उठा रहे हैं."यूपी: तीन साल पहले बनी टंकी बारिश में गिरी, दो लोगों की मौत"एक भेड़िया प्रतिदिन 10-12 घंटे इलाके में दौड़ता है, और हर एक झुंड का क्षेत्र बहुत बड़ा होता है"मिशिगन प्राकृतिक संसाधन विभाग ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि अमेरिका के ऊपरी प्रायद्वीप में 631 भेड़िये हैं.हैं, "वन्यजीव शिकारी भेड़ियों की जितनी तस्वीरें इकट्ठा करते हैं, उसका मतलब है कि ऊपरी प्रायद्वीप में डीएनआर के अनुमान से ज़्यादा भेड़िये हैं.वन्यजीव जीवविज्ञानी ब्रायन रोएल कहते हैं, "भेड़िये झुंड में वापस आने से पहले कई दिनों तक अलग-अलग जगहों पर घूमते रहते हैं. भेड़िये प्रकृति के सबसे बेहतरीन लंबी दूरी के जॉगर हैं." वे कहते हैं, "एक भेड़िया प्रतिदिन 10-12 घंटे इलाके में दौड़ता है, और हर एक झुंड का क्षेत्र बहुत बड़ा होता है."रॉयल कहते हैं, "भेड़िये पगडंडियों, सड़कों और दो-पथों पर चलते हैं, क्योंकि वहां से गुज़रना आसान होता है, लेकिन ये वही जगहें हैं जहां शिकारी ट्रेल कैमरे लगाते हैं, जिससे भेड़ियों की तस्वीरें लेने की संभावना अधिक होती है. बजाय इसके कि कैमरे घने जंगल और घनी झाड़ियों के बीच लगाए जाएं."रॉएल कहते हैं, "एक ही इलाके में रहने वाले कुछ ज़मीन मालिक भेड़ियों की 40 तस्वीरें खींचते हैं. वे संभवतः चार से पांच भेड़ियों के एक ही झुंड को देखते हैं, ना कि 40 अलग-अलग भेड़ियों को."प्रियंका गांधी पहली बार लड़ेंगी चुनाव, राहुल गांधी ने छोड़ी वायनाड लोकसभा सीट लखनऊ के अकबरनगर के जिन घरों पर चले बुलडोज़र, उनके बदले मिले फ़्लैटों में न बिजली न पानी -ग्राउंड रिपोर्टइंटरनेशनल वुल्फ़ सेंटर के मुताबिक वर्ष 2002 से 2020 तक पूरी दुनिया में भेड़ियों के 489 हमले हुए हैं, जिसमें 78 फीसदी यानी 380 रेबीज़ की वजह से हुए थे. नियाभर में भेड़ियों के हमलों में एक महत्वपूर्ण बात निकल कर आई है. इन हमलों के पीछे रेबीज बड़ा कारण है.इसके अलावा 67 हमले शिकार के लिए किए गए थे. जबकि 42 हमले सुरक्षा या उकसावे की वजह से भेड़ियों ने किया था. इंटरनेशनल वुल्फ़ सेंटर के मुताबिक़, तकरीबन 400 से लेकर 1100 भेड़िए हिमालय की तलहटी में रह रहे हैं. वहीं 4000 से लेकर 6000 भेड़िए उपमहाद्वीप में रह रहे हैं. उत्तर प्रदेश में 1996-97 के दौरान भेड़ियों के हमलों पर सैन फ्रांसिस्को स्थित लाइव जर्नल ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इस रिपोर्ट में कहा गया है, "1 सिंतबर 1996 तक उत्तर प्रदेश में भेड़ियों के हमलों में 33 बच्चे मारे गए थे. वहीं 20बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए थे."के मुताबिक, 1996-97 के दौरान भेड़ियों ने 74 लोगों को अपना निशाना बनाया था, इनमें से ज़्यादातर 10 साल से कम उम्र के बच्चे थे. इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि 1878 में भेड़ियों के हमलों से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था, जब एक साल में 624 लोग भेड़िए का शिकार हुए थे.यूपी में बीजेपी का कमज़ोर प्रदर्शन, योगी की ग़लती या केंद्रीय नेतृत्व की नाकामीयूपी: कानपुर की मॉर्चरी में इतने शव पहुंचे कि कम पड़ गई जगह, एक डॉक्टर की तबीयत हुई ख़राबभेड़ियों के खौफ़ में जी रहे उत्तर प्रदेश के ये गाँव, क्यों बढ़ रहे इंसानों पर हमले- ग्राउंड रिपोर्टयूपीएस कैसे ओल्ड पेंशन स्कीम और नेशनल पेंशन सिस्टम से अलग है? क्या कह रहे एक्सपर्ट और कर्मचारी यूनियन?151 सांसदों और विधायकों के ख़िलाफ़ महिला उत्पीड़न के मामले दर्ज, किस पार्टी से कितने नेता?ग्रेनाडा का पतन: अबू अब्दुल्लाह, वो मुसलमान शासक जिन्होंने ‘जन्नत की चाबी’ ईसाई राजाओं को सौंपी यूपीएस कैसे ओल्ड पेंशन स्कीम और नेशनल पेंशन सिस्टम से अलग है? क्या कह रहे एक्सपर्ट और कर्मचारी यूनियन?असम 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