Indian Soldiers Memorial: कैनबरा में 2,800 भारतीय सैनिकों की याद में स्मारक बनेगा, मेजर चिंत सिंह की प्रेरक कहानी भारत-ऑस्ट्रेलिया मित्रता और बलिदान की मिसाल है.
Indian Soldiers Memorial : द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान प्रशांत क्षेत्र में अपने प्राणों की आहुति देने वाले भारतीय सैनिकों के लिए ऑस्ट्रेलिया में एक स्मारक बनाने की मांग तेज हो गई है. यह स्मारक कैनबरा में उन 2,800 भारतीय सैनिकों की याद में बनाया जाना है, जिन्होंने पापुआ न्यू गिनी में अपनी जान गंवाई.
लेकिन सवाल यह है कि जब ये सैनिक पापुआ न्यू गिनी में शहीद हुए तो स्मारक ऑस्ट्रेलिया में क्यों बनाया जा रहा है? इसके पीछे मेजर चिंत सिंह और भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों के बीच की एक भूली-बिसरी दोस्ती की कहानी है, जो आज भी प्रेरणा देती है. मेजर चिंत सिंह की कहानी मेजर चिंत सिंह सेकेंड डोगरा रेजिमेंट का हिस्सा थे. उनकी कहानी भारतीय और ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों के बीच युद्धकालीन मित्रता का सबसे प्रेरणादायक उदाहरण है. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सिंगापुर के पतन के बाद लगभग 3,000 भारतीय सैनिकों को जापानी सेना ने बंदी बनाकर पापुआ न्यू गिनी भेज दिया. इनमें से केवल 200 ही जीवित बच पाए. भोजन, दवाइयों और बुनियादी जरूरतों की कमी के बीच इन सैनिकों ने घास, सांप, मेंढक और कीड़े खाकर जिंदा रहने की जंग लड़ी. फिर भी मेजर चिंत सिंह के नेतृत्व में इन सैनिकों ने अनुशासन और सैनिक सम्मान को बनाए रखा. उनकी हिम्मत और नेतृत्व ने कई सैनिकों को सितंबर 1945 तक जीवित रखा, जब उनकी मुक्ति हुई. ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों से पहली मुलाकात 30 सितंबर 1945 को मेजर चिंत सिंह और उनके जीवित सैनिकों की ऑस्ट्रेलियाई सेना से पहली मुलाकात हुई. लेफ्टिनेंट एफओ मॉन्क ने उस पल को याद करते हुए लिखा- मैं आपके और आपके सैनिकों को अंगोरम के तट पर उतरते हुए कभी नहीं भूलूंगा. यह दृश्य जीवन भर मेरे साथ रहेगा. हालांकि मेजर सिंह और उनके सैनिक कुपोषण के कारण कमजोर थे, फिर भी उन्होंने पूरे सैन्य अनुशासन के साथ खुद को पेश किया. उन्हें वेवाक ले जाया गया, जहां 15वीं ऑस्ट्रेलियाई फील्ड एम्बुलेंस ने उनकी देखभाल की. ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों ने न केवल उनका इलाज किया, बल्कि उनके लिए घर पर पत्र लिखे और उनकी रिकवरी के दौरान साथी बनकर उनका हौसला बढ़ाया. दुखद हादसा और गहराती दोस्ती मुक्ति के कुछ हफ्तों बाद 16 नवंबर 1945 को रबौल के पास एक विमान हादसे में 10 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई. मेजर सिंह ऑस्ट्रेलियाई युद्ध अपराध आयोग के लिए गवाही देने के कारण रुके थे, इस हादसे से गहरे दुखी हुए. इस दौरान उन्होंने 30वीं इन्फैंट्री बटालियन के कैप्टन ब्रूस जैसे ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों के साथ समय बिताया, जिससे उनकी दोस्ती और गहरी हो गई. जनवरी 1946 में मेजर सिंह ने 6वीं ऑस्ट्रेलियाई डिवीजन को एक विदाई पत्र लिखा- आपके डिवीजन के हर व्यक्ति ने जो सहानुभूति, प्यार और स्नेह दिखाया वह हमेशा हमारे साथ रहेगा… उम्मीद है कि आपके देश और भारत की दोस्ती हमेशा बनी रहेगी. यह पत्र आज ऑस्ट्रेलियाई युद्ध स्मारक में संरक्षित है और यह उस कठिन समय में बनी दोस्ती का प्रतीक है. सम्मान और स्थायी विरासत मेजर चिंत सिंह को जापानी आत्मसमर्पण के ध्वज पर हस्ताक्षर करने का सम्मान मिला, जो आज कैनबरा के ऑस्ट्रेलियाई युद्ध स्मारक में प्रदर्शित है. 1947 में वे युद्ध अपराध आयोग में फिर से गवाही देने ऑस्ट्रेलिया लौटे और पूर्व सहयोगियों व उनके परिवारों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. 1970 में युद्ध की 25वीं वर्षगांठ पर उन्हें रिटर्न्ड एंड सर्विसेज लीग के निमंत्रण पर ऑस्ट्रेलिया बुलाया गया. इस दौरान उन्होंने पुराने युद्ध क्षेत्रों का दौरा किया और अपनी दोस्ती को फिर से जीवंत किया. 1971 में RSL ने अंगोरम में उन 2,800 भारतीय सैनिकों की याद में एक स्मारक बनाया, जो कभी वापस नहीं लौटे. हालांकि यह स्मारक बाद में बाढ़ में नष्ट हो गया, लेकिन यह उनके बलिदान की पहचान थी. कैनबरा में स्मारक की मांग हाल के वर्षों में मेजर चिंत सिंह के बेटे नरिंदर परमार ने 2022 में कैनबरा में एक स्थायी स्मारक बनाने का प्रस्ताव रखा. यह स्मारक न केवल उन 2,800 भारतीय सैनिकों के बलिदान को सम्मान देगा, बल्कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच युद्ध के दौरान बनी दोस्ती को भी याद रखेगा. ऑस्ट्रेलियाई लोगों के लिए ‘मेटशिप’ एक गहरा मूल्य है और मेजर सिंह और उनके सैनिकों के लिए यह एक जीवंत हकीकत थी. जैसे-जैसे भारत और ऑस्ट्रेलिया हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने संबंधों को मजबूत कर रहे हैं, मेजर चिंत सिंह और उनके सैनिकों की कहानी हमें याद दिलाती है कि दोनों देशों का रिश्ता केवल कूटनीति पर नहीं, बल्कि साझा बलिदान, हिम्मत और मानवता पर भी आधारित है. यह स्मारक न केवल भारतीय सैनिकों के बलिदान को सम्मान देगा, बल्कि ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली भारतीय प्रवासी आबादी के लिए भी एक ऐतिहासिक सेतु बनेगा.
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