यह लेख बॉलीवुड अभिनेता विनीत कुमार सिंह के साथ एक साक्षात्कार का सारांश प्रस्तुत करता है। उन्होंने अपने सफल करियर के बारे में बात की है, जिसमें उन्होंने 'छावा' फिल्म में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने अभिनय की पद्धति, मेहनताना मांगने के महत्व और प्रेरणा के बारे में भी खुलासा किया है।
बॉलीवुड में 18 साल तक अपने सोलो लीड रोल के लिए इंतजार विनीत कुमार सिंह इसलिए कर पाए क्योंकि उन्होंने बाकियों की तरह ज्यादा बुद्धि नहीं लगाई और कुछ कर गुजरने के लिए दृढ़ निश्चयी रहे। ढाई दशक तक इंडस्ट्री में बने रहकर उन्होंने अपना मेहनताना भी हक से मांगना जान लिया क्योंकि वह कहते हैं कि यहां मांगोगे नहीं तो आपका हिस्सा कोई और ले लेगा। इतने साल के अनुभव के बाद उन्हें यह भी अच्छे से पता चल गया है कि यहां कोई किसी को भूलता नहीं है, बस उसकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। विनीत इन दिनों फिल्म 'द मैच फिक्सिंग' को लेकर चर्चा में हैं। बीते दिनों वह लखनऊ आए तो हमने उनसे ढेर सारी बातें कीं।विक्की कौशल की ' छावा ' में अहम रोलबता दें कि हिस्टोरिकल ड्रामा फिल्म ' छावा ' में विनीत कवि कलश की भूमिका निभाई है। कवि कलश छत्रपति संभाजी महाराज के जिगरी यार थे जिन्होंने आखिर तक उनका साथ नहीं छोड़ा। विनीत ने अपने इस किरदार को बखूबी निभाया है, जिसकी जमकर तारीफ हो रही है। 'मेरी ऐक्टिंग का सारा मेथड खुद को देखने का है'हर ऐक्टर का अपना प्रोसेस है। जरूरी नहीं कि ऐक्टर टीचर की सिखाई चीजों को ही फॉलो करे। असल में, हम व्यक्तिगत रूप से एक-दूसरे से अलग हैं। ऐक्टिंग में समझना जरूरी है कि मेरे साथ क्या काम करता है। मैं जो हूं, उसमें मेरे लिए कौन सा मेथड, किस तरह की ऐक्टिंग, कहां ज्यादा जुड़ाव है, ये सब पहचानना होता है। सबके भीतर एक नजरिया होता है, जो बता देता है कि सही कर रहे या नहीं। वो हर किसी में है। अब किसके लिए कौन सा तरीका काम करेगा, ये उस ऐक्टर पर निर्भर है। मेरा सारा मेथेड खुद को देखने और जज करने वाला है। ऐक्टिंग में आपको सब तरह की पढ़ाई करने के बाद भी खुद का कुछ निकालना पड़ेगा। भीतर की यात्रा करके खोजना पड़ेगा कि आप क्या हो। ऐसा नहीं कि बैंक का लॉकर है, चाभी लगेगी, घुमा दूंगा तो लॉकर खुल जाएगा। यहां ना चाभी है, ना लॉकर है और ना घुमाने वाला। भौतिक कुछ नहीं लेकिन अंदर एक चाभी लगेगी, घुमाने वाले आप ही हो लेकिन फिजिकली आप उसे नहीं घुमाते। वो सब आपके अहसास और विचार में होता है। फिर आप वहां पहुंच पाते हो। कैसे पहुंच पाते हो, ये हर किसी का अपना अलग तरीका है। अगला आदमी आपका गोलगप्पा ले लेता हैअब अपना मेहनताना हक से मांगता हूं। पहले संकुचाता था। दरअसल, मैं बनारस का हूं तो घर में यही सिखाया गया कि तुम अपना खाओ। तुम्हारी रोटी तुम तक आ जाएगी। क्या बार-बार किचन में भागकर आ रहे हो, बैठे रहो अपनी जगह पर। जैसे गोलगप्पा खिलाया जाता है कि आपकी बारी आएगी तो गोलगप्पा मिलेगा। मैंने भी गोलगप्पे के जैसे सब सीखा था। फिर बाद में समझ आया कि मांगोगे नहीं तो यहां मिलता नहीं है। अगला आदमी आपका गोलगप्पा ले लेता है। कुछ लोग मेहनत का देना ही भूल जाते। हालांकि, ऐसे सभी नहीं होते। इन सब चीजों का सामना किया। लोगों ने धीरे-धीरे सिखाया लेकिन अब पूरी टीम है। वही सब मैनेज करती है। मैंने जब अपने हाथ में लिया था, तब मैं मांगता था। कहता था, 'काम-वाम तो हो गया, मेरी तरफ से कोई कमी तो नहीं, पैसे कब दोगे अब ये बता दो।' अभी ऐसे भी समझदार और सज्जन लोग होते हैं, जो काम हो जाने के बावजूद पैसे नहीं देते। अब वहां ये भी करना पड़ता है, 'काम को बस सात दिन बचे हैं तो पैसे? पहले बता दो नहीं तो ये सात दिन ना हो पाएगा।' यह कहने में कोई तकल्लुफ नहीं मुझे क्योंकि यही मैंने देखा है। ये आप तय करते कि आपको उसे भूल जाना हैमैं आज भी जमीन से जुड़ा हूं और कुछ नहीं भूला हूं। आप अगर साइकल चलाते हैं और आगे जाकर कार चलाते हैं तो साइकल चलाना क्या भूल जाते हैं? ऐसी 50 चीजें करते हैं फिर भी साइकल चलाना नहीं भूलते। भूलते आप खुद से हैं कि आप क्या थे। आपने ही तय कर लिया कि मुझे ऐसा रहना नहीं है। कोई किसी को नहीं भूलता। जिंदगी में सब प्राथमिकता होती है। बिजी से बिजी आदमी का नाम ले लीजिए, मैं उसके बाद एक नाम बोल देता हूं और उसके लिए तुरंत सब खाली हो जाएगा। भाई मैं तो 'भाईसाहब आप तो हमें भूल गए' कहने की बजाए यह कहता हूं कि 'अब हम आपकी प्राथमिकता में नहीं रहे।' कोई भूलता थोड़ी है, कौन अपना पता भूल जाता है। अगर कोई बीमारी हो गई तो अलग बात। सबको सब याद रहता है। ठंड की वो ठिठुरती रात, जिस वक्त आपको छत ना मिली हो और वहां कोई था आपके साथ, आप उस आदमी को भूल नहीं पाते हैं। ना वो रात भूल पाते हैं। ये आप तय करते हैं कि आपको उस आदमी को भूल जाना है। कम पता होना आपकी ऊर्जा के स्रोत खोलकर रखताकम बुद्धिमान होने के साथ दृढ़ निश्चयी हैं तो आप बड़े से बड़ा काम कर सकते हैं। कम बुद्धिमानी का अर्थ आईक्यू लेवल से नहीं है। मेरा मतलब है कि आपको चीजें कम पता हैं। चीजें जब कम पता होती हैं और आप दृढ़ निश्चयी होते हैं तो रोज कठिन चढ़ाइयां चढ़ जाते हैं। उदाहरण से समझाता हूं कि हर आदमी जब कॉलेज के आसपास होता है तो उसके ख्वाब बड़े होते हैं। फिर क्या हो जाता कि जैसे ही 40 की उम्र पार करता है तो कहने लगता कि नहीं ये काम रहने दो, वो काम करने दो क्योंकि उसको पता चल गया। बस वो उन्हीं को हर्डल मान लेता है। किसी का सपना छोटा नहीं होता। उसे जब पता चल जाता है तो धीरे-धीरे खुद को समेटने लगता है। कई बार जिंदगी में कम पता होना, आपकी ऊर्जा के स्रोत को खोलकर रखता है। मुझे पता होता कि मैं सन 2000 में आऊंगा और 2018 में ‘मुक्काबाज’ मेरी सोलो हीरो लीड होगी, वो भी 18 साल बाद। आप अगर मेरे घर के होते और मैं बताता तो आप बोलते, ‘पागल हो गए हो क्या’। कम बुद्धिमानी से मतलब कि जब आपको कम पता होता है तो आप बड़ी लड़ाइयां लड़ लेते हो। जिनके सफर में बाधाएं होतीं, वो किरदार सबको पसंद आते‘द मैच फिक्सिंग’ किसी खेल की फिक्सिंग से जुड़ी नहीं बल्कि पॉलिटिकल थ्रिलर है। इसमें मेरा किरदार अविनाश पटवर्धन का है, जो आर्मी इंटेलिजेंस अफसर है। वह अपनी असली पहचान छिपाकर फील्ड में काम करता है। मुझे इसमें एक में ही कई सारे किरदार करने का मौका मिला। वो जब यूनिफॉर्म पहनता तो उसका उठना, बैठना, चलना, सोचना बिल्कुल आर्मी अफसर जैसा हो जाता है। वह जब फील्ड में काम करता तो पहचान में नहीं आता। बिल्कुल लो प्रोफाइल रहता है। इसमें कई सारी चीजें ऐसी होती हैं, जिसकी वजह इस किरदार की जिंदगी उथल-पुथल हो जाती है। आर्मी अफसर के अलावा वह एक पारिवारिक इंसान भी है। बहुत सारी चीजें पहले ही हैं। हालांकि, घटनाएं घटनी जब शुरू होती हैं, जिसकी वजह से चीजें इस किरदार के ऊपर आती हैं तो पूरे परिवार की जिंदगी बिगड़ जाती है। अलग तरह के आरोप लगते हैं। मालेगांव ब्लास्ट के आसपास चीजें शुरू होती हैं। यह किरदार जटिल है। इसमें कई शेड्स हैं। एक ऐक्टर के तौर पर मेरे लिए यह एक चैलेंज था। मैं चाहता भी था कि कुछ नया करने को मिले क्योंकि वो कैरेक्टर अच्छे लगते हैं, जिनके सफर में बाधाएं खूब होती हैं। ऑन स्क्रीन वो ऑडियंस को कहीं ना कहीं पसंद आते हैं। आर्मी अफसर का करंट ही अलग होता हैमैं जहां रहता था, वहां आर्मी वाले लोग थे। मैं जहां पढ़ा उदय प्रताप कॉलेज, वहां एनसीसी की बहुत अच्छी यूनिट थी। उस वक्त अलग स्तर की परेड हुआ करती थी। वहां मैंने बहुत से ऐसे लोगों को देखा। कुछ मेरे दोस्त डिफेंस में भी हैं। कहीं ना कहीं वर्दी मन को आकर्षित करती रही। उसको पहने आर्मी अफसर का उठना, बैठना, बात करना, यहां तक कि हाथ मिलाना भी अलग होता है। कह सकते हैं कि उनका करंट ही अलग है। मैं असल जिंदगी में जो चाहता था, उसे रील लाइफ में ऐक्टर के तौर पर करने का मौका मिला। ऐक्टर को यही तो वरदान मिला है कि वो एक जिंदगी में कई जिंदगी जी पाता है। इसके साथ सेट पर कर्नल अहलूवालिया सर रहते थे। वह आर्मी के रिटायर्ड कर्नल हैं। मैं जब भी यूनिफॉर्म का सीन करता तो पहले उनके पास जाता था। वह पूरा स्कैन करते थे। कैप, उसका ऐंगल, बैचेज, यूनिफॉर्म एकदम करेक्ट हैं। वह यह तक देखते थे कि इंडोर सीन है तो कितनी दूरी पर पहला सैल्यूट मारेंगे। सारी डिटेलिंग पर वह ध्यान देते थे। इस तरीके से पूरी फिल्म की। इसे आर्मी पर्सनल्स ने देखी, जिसके बाद सभी ने कहा कि हमें कुछ ऐसा नहीं दिखा, जिसके बारे में हम कुछ टीका-टिप्पणी कर सकें। वक्त मिला तो महाकुंभ में डुबकी लगाने जरूर आऊंगामहाकुंभ अपने आप में अद्भुत घड़ी और नक्षत्र होता है। तपस्या करने वाले लोग जो हिमालय में हैं, वो भी नीचे आते हैं। एक पुण्य नक्षत्र में ये चीज आती हैं। कुंभ में मैंने बॉम्बे टॉकीज शूट की है। उसके साथ तो मेरी गहरी यादें हैं। मेरी वहां जाने के लिए बात हुई है क्योंकि कई शूट चल रहे हैं। अगर वक्त हुआ तो मैं डुबकी लगाने जरूर जाऊंगा। मेरी हालिया फिल्मों में ' छावा ', 'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव', 'जाट' है सनी देओल सर के साथ, एक मेरा शो है 'रंगीन', जिसे कबीर खान ने प्रोड्यूस किया, एक फिल्म है निशांची, जो अनुराग कश्यप डायरेक्ट कर रहे हैं। इसकी शूटिंग मैं अभी लखनऊ से करके गया हूं। एक चार कहानियों का बंच है, जिसमें एक मेरी कहानी होगी। इसे आशीष आर्यन ने डायरेक्ट की है।.
बॉलीवुड में 18 साल तक अपने सोलो लीड रोल के लिए इंतजार विनीत कुमार सिंह इसलिए कर पाए क्योंकि उन्होंने बाकियों की तरह ज्यादा बुद्धि नहीं लगाई और कुछ कर गुजरने के लिए दृढ़ निश्चयी रहे। ढाई दशक तक इंडस्ट्री में बने रहकर उन्होंने अपना मेहनताना भी हक से मांगना जान लिया क्योंकि वह कहते हैं कि यहां मांगोगे नहीं तो आपका हिस्सा कोई और ले लेगा। इतने साल के अनुभव के बाद उन्हें यह भी अच्छे से पता चल गया है कि यहां कोई किसी को भूलता नहीं है, बस उसकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। विनीत इन दिनों फिल्म 'द मैच फिक्सिंग' को लेकर चर्चा में हैं। बीते दिनों वह लखनऊ आए तो हमने उनसे ढेर सारी बातें कीं।विक्की कौशल की 'छावा' में अहम रोलबता दें कि हिस्टोरिकल ड्रामा फिल्म 'छावा' में विनीत कवि कलश की भूमिका निभाई है। कवि कलश छत्रपति संभाजी महाराज के जिगरी यार थे जिन्होंने आखिर तक उनका साथ नहीं छोड़ा। विनीत ने अपने इस किरदार को बखूबी निभाया है, जिसकी जमकर तारीफ हो रही है। 'मेरी ऐक्टिंग का सारा मेथड खुद को देखने का है'हर ऐक्टर का अपना प्रोसेस है। जरूरी नहीं कि ऐक्टर टीचर की सिखाई चीजों को ही फॉलो करे। असल में, हम व्यक्तिगत रूप से एक-दूसरे से अलग हैं। ऐक्टिंग में समझना जरूरी है कि मेरे साथ क्या काम करता है। मैं जो हूं, उसमें मेरे लिए कौन सा मेथड, किस तरह की ऐक्टिंग, कहां ज्यादा जुड़ाव है, ये सब पहचानना होता है। सबके भीतर एक नजरिया होता है, जो बता देता है कि सही कर रहे या नहीं। वो हर किसी में है। अब किसके लिए कौन सा तरीका काम करेगा, ये उस ऐक्टर पर निर्भर है। मेरा सारा मेथेड खुद को देखने और जज करने वाला है। ऐक्टिंग में आपको सब तरह की पढ़ाई करने के बाद भी खुद का कुछ निकालना पड़ेगा। भीतर की यात्रा करके खोजना पड़ेगा कि आप क्या हो। ऐसा नहीं कि बैंक का लॉकर है, चाभी लगेगी, घुमा दूंगा तो लॉकर खुल जाएगा। यहां ना चाभी है, ना लॉकर है और ना घुमाने वाला। भौतिक कुछ नहीं लेकिन अंदर एक चाभी लगेगी, घुमाने वाले आप ही हो लेकिन फिजिकली आप उसे नहीं घुमाते। वो सब आपके अहसास और विचार में होता है। फिर आप वहां पहुंच पाते हो। कैसे पहुंच पाते हो, ये हर किसी का अपना अलग तरीका है। अगला आदमी आपका गोलगप्पा ले लेता हैअब अपना मेहनताना हक से मांगता हूं। पहले संकुचाता था। दरअसल, मैं बनारस का हूं तो घर में यही सिखाया गया कि तुम अपना खाओ। तुम्हारी रोटी तुम तक आ जाएगी। क्या बार-बार किचन में भागकर आ रहे हो, बैठे रहो अपनी जगह पर। जैसे गोलगप्पा खिलाया जाता है कि आपकी बारी आएगी तो गोलगप्पा मिलेगा। मैंने भी गोलगप्पे के जैसे सब सीखा था। फिर बाद में समझ आया कि मांगोगे नहीं तो यहां मिलता नहीं है। अगला आदमी आपका गोलगप्पा ले लेता है। कुछ लोग मेहनत का देना ही भूल जाते। हालांकि, ऐसे सभी नहीं होते। इन सब चीजों का सामना किया। लोगों ने धीरे-धीरे सिखाया लेकिन अब पूरी टीम है। वही सब मैनेज करती है। मैंने जब अपने हाथ में लिया था, तब मैं मांगता था। कहता था, 'काम-वाम तो हो गया, मेरी तरफ से कोई कमी तो नहीं, पैसे कब दोगे अब ये बता दो।' अभी ऐसे भी समझदार और सज्जन लोग होते हैं, जो काम हो जाने के बावजूद पैसे नहीं देते। अब वहां ये भी करना पड़ता है, 'काम को बस सात दिन बचे हैं तो पैसे? पहले बता दो नहीं तो ये सात दिन ना हो पाएगा।' यह कहने में कोई तकल्लुफ नहीं मुझे क्योंकि यही मैंने देखा है। ये आप तय करते कि आपको उसे भूल जाना हैमैं आज भी जमीन से जुड़ा हूं और कुछ नहीं भूला हूं। आप अगर साइकल चलाते हैं और आगे जाकर कार चलाते हैं तो साइकल चलाना क्या भूल जाते हैं? ऐसी 50 चीजें करते हैं फिर भी साइकल चलाना नहीं भूलते। भूलते आप खुद से हैं कि आप क्या थे। आपने ही तय कर लिया कि मुझे ऐसा रहना नहीं है। कोई किसी को नहीं भूलता। जिंदगी में सब प्राथमिकता होती है। बिजी से बिजी आदमी का नाम ले लीजिए, मैं उसके बाद एक नाम बोल देता हूं और उसके लिए तुरंत सब खाली हो जाएगा। भाई मैं तो 'भाईसाहब आप तो हमें भूल गए' कहने की बजाए यह कहता हूं कि 'अब हम आपकी प्राथमिकता में नहीं रहे।' कोई भूलता थोड़ी है, कौन अपना पता भूल जाता है। अगर कोई बीमारी हो गई तो अलग बात। सबको सब याद रहता है। ठंड की वो ठिठुरती रात, जिस वक्त आपको छत ना मिली हो और वहां कोई था आपके साथ, आप उस आदमी को भूल नहीं पाते हैं। ना वो रात भूल पाते हैं। ये आप तय करते हैं कि आपको उस आदमी को भूल जाना है। कम पता होना आपकी ऊर्जा के स्रोत खोलकर रखताकम बुद्धिमान होने के साथ दृढ़ निश्चयी हैं तो आप बड़े से बड़ा काम कर सकते हैं। कम बुद्धिमानी का अर्थ आईक्यू लेवल से नहीं है। मेरा मतलब है कि आपको चीजें कम पता हैं। चीजें जब कम पता होती हैं और आप दृढ़ निश्चयी होते हैं तो रोज कठिन चढ़ाइयां चढ़ जाते हैं। उदाहरण से समझाता हूं कि हर आदमी जब कॉलेज के आसपास होता है तो उसके ख्वाब बड़े होते हैं। फिर क्या हो जाता कि जैसे ही 40 की उम्र पार करता है तो कहने लगता कि नहीं ये काम रहने दो, वो काम करने दो क्योंकि उसको पता चल गया। बस वो उन्हीं को हर्डल मान लेता है। किसी का सपना छोटा नहीं होता। उसे जब पता चल जाता है तो धीरे-धीरे खुद को समेटने लगता है। कई बार जिंदगी में कम पता होना, आपकी ऊर्जा के स्रोत को खोलकर रखता है। मुझे पता होता कि मैं सन 2000 में आऊंगा और 2018 में ‘मुक्काबाज’ मेरी सोलो हीरो लीड होगी, वो भी 18 साल बाद। आप अगर मेरे घर के होते और मैं बताता तो आप बोलते, ‘पागल हो गए हो क्या’। कम बुद्धिमानी से मतलब कि जब आपको कम पता होता है तो आप बड़ी लड़ाइयां लड़ लेते हो। जिनके सफर में बाधाएं होतीं, वो किरदार सबको पसंद आते‘द मैच फिक्सिंग’ किसी खेल की फिक्सिंग से जुड़ी नहीं बल्कि पॉलिटिकल थ्रिलर है। इसमें मेरा किरदार अविनाश पटवर्धन का है, जो आर्मी इंटेलिजेंस अफसर है। वह अपनी असली पहचान छिपाकर फील्ड में काम करता है। मुझे इसमें एक में ही कई सारे किरदार करने का मौका मिला। वो जब यूनिफॉर्म पहनता तो उसका उठना, बैठना, चलना, सोचना बिल्कुल आर्मी अफसर जैसा हो जाता है। वह जब फील्ड में काम करता तो पहचान में नहीं आता। बिल्कुल लो प्रोफाइल रहता है। इसमें कई सारी चीजें ऐसी होती हैं, जिसकी वजह इस किरदार की जिंदगी उथल-पुथल हो जाती है। आर्मी अफसर के अलावा वह एक पारिवारिक इंसान भी है। बहुत सारी चीजें पहले ही हैं। हालांकि, घटनाएं घटनी जब शुरू होती हैं, जिसकी वजह से चीजें इस किरदार के ऊपर आती हैं तो पूरे परिवार की जिंदगी बिगड़ जाती है। अलग तरह के आरोप लगते हैं। मालेगांव ब्लास्ट के आसपास चीजें शुरू होती हैं। यह किरदार जटिल है। इसमें कई शेड्स हैं। एक ऐक्टर के तौर पर मेरे लिए यह एक चैलेंज था। मैं चाहता भी था कि कुछ नया करने को मिले क्योंकि वो कैरेक्टर अच्छे लगते हैं, जिनके सफर में बाधाएं खूब होती हैं। ऑन स्क्रीन वो ऑडियंस को कहीं ना कहीं पसंद आते हैं। आर्मी अफसर का करंट ही अलग होता हैमैं जहां रहता था, वहां आर्मी वाले लोग थे। मैं जहां पढ़ा उदय प्रताप कॉलेज, वहां एनसीसी की बहुत अच्छी यूनिट थी। उस वक्त अलग स्तर की परेड हुआ करती थी। वहां मैंने बहुत से ऐसे लोगों को देखा। कुछ मेरे दोस्त डिफेंस में भी हैं। कहीं ना कहीं वर्दी मन को आकर्षित करती रही। उसको पहने आर्मी अफसर का उठना, बैठना, बात करना, यहां तक कि हाथ मिलाना भी अलग होता है। कह सकते हैं कि उनका करंट ही अलग है। मैं असल जिंदगी में जो चाहता था, उसे रील लाइफ में ऐक्टर के तौर पर करने का मौका मिला। ऐक्टर को यही तो वरदान मिला है कि वो एक जिंदगी में कई जिंदगी जी पाता है। इसके साथ सेट पर कर्नल अहलूवालिया सर रहते थे। वह आर्मी के रिटायर्ड कर्नल हैं। मैं जब भी यूनिफॉर्म का सीन करता तो पहले उनके पास जाता था। वह पूरा स्कैन करते थे। कैप, उसका ऐंगल, बैचेज, यूनिफॉर्म एकदम करेक्ट हैं। वह यह तक देखते थे कि इंडोर सीन है तो कितनी दूरी पर पहला सैल्यूट मारेंगे। सारी डिटेलिंग पर वह ध्यान देते थे। इस तरीके से पूरी फिल्म की। इसे आर्मी पर्सनल्स ने देखी, जिसके बाद सभी ने कहा कि हमें कुछ ऐसा नहीं दिखा, जिसके बारे में हम कुछ टीका-टिप्पणी कर सकें। वक्त मिला तो महाकुंभ में डुबकी लगाने जरूर आऊंगामहाकुंभ अपने आप में अद्भुत घड़ी और नक्षत्र होता है। तपस्या करने वाले लोग जो हिमालय में हैं, वो भी नीचे आते हैं। एक पुण्य नक्षत्र में ये चीज आती हैं। कुंभ में मैंने बॉम्बे टॉकीज शूट की है। उसके साथ तो मेरी गहरी यादें हैं। मेरी वहां जाने के लिए बात हुई है क्योंकि कई शूट चल रहे हैं। अगर वक्त हुआ तो मैं डुबकी लगाने जरूर जाऊंगा। मेरी हालिया फिल्मों में 'छावा', 'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव', 'जाट' है सनी देओल सर के साथ, एक मेरा शो है 'रंगीन', जिसे कबीर खान ने प्रोड्यूस किया, एक फिल्म है निशांची, जो अनुराग कश्यप डायरेक्ट कर रहे हैं। इसकी शूटिंग मैं अभी लखनऊ से करके गया हूं। एक चार कहानियों का बंच है, जिसमें एक मेरी कहानी होगी। इसे आशीष आर्यन ने डायरेक्ट की है।
बॉलीवुड विनित कुमार सिंह छावा अभिनय मेहनताना प्रेरणा
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