पुणे के एक ऑटो चालक देविदास कदम की 8 साल की बेटी रुक्मिणी को मामूली पेट दर्द से गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) जैसी गंभीर बीमारी हो गई है. रुक्मिणी ICU में 13 दिनों से वेंटिलेटर पर है. आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवार के लिए इलाज का खर्च उठाना बेहद मुश्किल है.
पुणे के एक ऑटो रिक्शा चालक देविदास कदम के लिए यह समझ पाना मुश्किल हो रहा है कि उनकी 8 साल की बेटी रुक्मिणी का मामूली पेट दर्द गुइलेन-बैरे सिंड्रोम ( GBS ) जैसी गंभीर बीमारी में कैसे बदल गया. देविदास ने बताया, ‘दो हफ्ते पहले, उसे सिर्फ दो घंटे के लिए पेट दर्द हुआ था. 16 जनवरी को उसे तेज बुखार हुआ और वह बेहोश हो गई. हम तुरंत नजदीकी अस्पताल पहुंचे. डॉक्टरों ने यूरिन और अन्य टेस्ट किए. GBS होने का शक होने पर इलाज शुरू कर दिया. अस्पताल में भर्ती होने के आठवें दिन इस बीमारी की पुष्टि हुई.
उसके बाद कुछ और टेस्ट किए गए.’ रुक्मिणी ICU में 13 दिनों से वेंटिलेटर पर है. कदम ने कहा, ‘उसका शरीर पूरी तरह से लकवाग्रस्त हो गया है, लेकिन उसका दिमाग सक्रिय है. वह लोगों को पहचान सकती है और जो कुछ कहा जाए, उसे समझ सकती है, लेकिन जवाब नहीं दे पा रही है. डॉक्टरों का कहना है कि अगले तीन-चार दिनों तक उसे निगरानी में रखा जाएगा. अगर उसकी हालत वैसी ही रही, तो इलाज का तरीका बदला जाएगा और उसे आठ और इंजेक्शन दिए जाएंगे. डॉक्टरों ने कहा है कि जरूरत पड़ने पर ये इंजेक्शन बाहर से मंगवाने होंगे.’ ‘रुक्मिणी का दिमाग अभी भी सक्रिय’ पहले यूरिन टेस्ट के बाद डॉक्टरों ने बताया कि रुक्मिणी को यूरिन इन्फेक्शन और किडनी में सूजन है. कदम ने कहा, ‘अस्पताल में भर्ती होने के दौरान GBS उसके शरीर में फैलने लगा था. डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू किया, जिससे यह बीमारी गर्दन के ऊपर तक नहीं पहुंची और उसका दिमाग सक्रिय बना हुआ है. GBS के पीछे का कारण अभी तक साफ नहीं है. 13 दिनों से वह डॉक्टरों की निगरानी में है. डॉक्टरों का कहना है कि उसकी हालत बहुत गंभीर है. हर दिन डॉक्टर उसे देखते हैं. वे कहते हैं कि अभी कोई खास प्रगति नहीं हुई है, लेकिन वह स्थिर है और ठीक हो जाएगी.’ आर्थिक संकट से जूझ रहा परिवार चार लोगों के परिवार के इकलौते कमाने वाले देविदास कदम, जिनकी मासिक आय 20,000-25,000 रुपये है, के लिए इलाज का खर्च उठाना बेहद मुश्किल हो रहा है. अब तक वह रुक्मिणी के इलाज पर 3 लाख रुपये खर्च कर चुके हैं. कदम ने बताया, ‘मैंने अपनी पत्नी के गहने बेच दिए, अपनी सारी बचत खत्म कर दी और रिश्तेदारों से पैसे उधार लिए. मेरे पास कोई बीमा नहीं है. मैं उम्मीद करता हूं कि सरकार मदद करे. GBS को सरकारी योजना में शामिल किया गया है, लेकिन सरकार को इसे मुफ्त में इलाज की सुविधा देनी चाहिए, न कि छोटी सी सब्सिडी. डॉक्टर यह नहीं बता रहे कि वह कब तक ठीक हो जाएगी, इसलिए मुझे नहीं पता कि आगे कितना खर्च होगा.’ देविदास ने बताया कि पिछले 14 दिनों से वह काम पर नहीं जा पाए हैं और परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा है
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