Jammu Kashmir Pahalgam Terrorist Attack Impact On Tourism Sector; How Is Tourist Guide Adil Hussain Family Now? पहलगाम हमले के बाद टूरिज्म पर निर्भर लोगों का क्या हाल है? हमले के बाद चर्चा में आए जिप लाइन ऑपरेटर मुजम्मिल, टूर गाइड सज्जाद और पोनी चलाने वाले गाइड नजाकत अहमद शाह अब किस हालत में...
आतंकियों से भिड़े आदिल की मां बोलीं- बेटा खोया, दिल में अब भी डर‘22 अप्रैल की घटना के बाद टूरिज्म बिल्कुल ठप पड़ा है। पहले एक पोनी वाला दिन में 3,000-4,000 रुपए कमा लेता था, लेकिन हमले के बाद सब ठप हो गया। हमारी रोजी-रोटी टूरिज्म से ही चलती है। मेरी दो बेटियों की पढ़ाई भी इसी से चलती है।‘पहलगाम में पोनी चलाने वाले गाइड नजाकत अहमद शाह आतंकी हमले के वक्त मौके पर ही मौजूद थे। उन्होंने आतंकी हमले में 11 टूरिस्ट्स की जान बचाई थी। अब पहलगाम हमले को ढाई महीने से ज्यादा बीत चुका है, लेकिन टूरिज्म पटरी पर नहीं आ सका है। हालांकि अमरनाथ यात्रा से थोड़ी-बहुत कमाई जरूर शुरू हुई है, लेकिन टूरिज्म पर निर्भर लोगों के हालात अब भी सुधरे नहीं हैं। उन परिवारों की तकलीफ और भी ज्यादा है, जिन्होंने इन हमलों में अपनों को खो दिया। आतंकी हमले में जान गंवाने वाले कश्मीर के आदिल हुसैन का परिवार अब तक न उन्हें खोने के गम से उबर पाया है और न हमले के खौफ से। आदिल की मां बेबीजान कहती हैं, ‘जब छोटा बेटा घर से घोड़ा लेकर निकलता है तो बस मन में उसकी सलामती की ही फिक्र रहती है।‘ पहलगाम हमले के बाद टूरिज्म पर निर्भर लोगों का क्या हाल है? हमले के बाद चर्चा में आए जिप लाइन ऑपरेटर मुजम्मिल, टूर गाइड सज्जाद और पोनी चलाने वाले गाइड नजाकत अहमद शाह किस हाल में हैं? आतंकियों की गोली लगने से जिन आदिल हुसैन की मौत हुई थी, उनका परिवार कैसी जिंदगी जी रहा है? ये जानने दैनिक भास्कर की टीम ग्राउंड पर पहुंची।बायसरन घाटी में जान गंवाने वालों में खच्चर चलाने वाले गाइड आदिल हुसैन अकेले मुस्लिम थे। आतंकियों ने उन्हें 3 गोलियां मारी थीं। आदिल का घर पहलगाम से करीब 20 किमी दूर अनंतनाग के हापतनार में है। हम आदिल के परिवार का हाल जानने के लिए उनके घर पहुंचे। घर नए सिरे से बनाया जा रहा है।आदिल के पिता सैयद हैदर शाह उसकी याद में स्मारक बनाने की मांग करते हुए कहते हैं, ‘स्मारक आदिल की याद को हमेशा जिंदा रखेगा।‘ परिवार के हाल पर सैयद बताते हैं, ‘आदिल की मां की तबीयत खराब रहती है। वो पहले से थोड़ी कमजोर हैं। आस-पास के लोग दुख बांटने आते-जाते रहते हैं, जिससे थोड़ा सहारा मिलता है।‘ अब आदिल का छोटा भाई नौशाद टूरिस्ट्स के लिए गाड़ी चलाता है। मां बेबीजान उसी सेफ्टी को लेकर परेशान रहती हैं। वे कहती हैं, ‘आदिल के जाने के बाद कुछ ठीक नहीं लगता। मेरी तबीयत भी खराब रहती है। हालांकि अब सुधर रही है। मेरा छोटा बेटा टूरिस्ट्स के लिए गाड़ी चलाता है और भाई का बेटा घोड़ा लेकर जाता है। डर तो बहुत लगता है, लेकिन मजबूरी है। अगर वो काम पर न जाएं तो घर कैसे चलेगा? कमाएगा कौन?‘ वे कहती हैं कि पिछले दो महीने में जिंदगी थोड़ी बेहतर हुई हैं, लेकिन दिल में डर बना रहता है। सब कुछ वैसा नहीं है, जैसा पहले था। आदिल के परिवार में पत्नी, मां, पिता, दो भाई और तीन बहनें हैं। ये अब तक उन्हें खोने के गम से उबर नहीं पाए हैं।आदिल के परिवार को सरकार ने 16 लाख रुपए की आर्थिक मदद दी और आदिल की पत्नी को सरकारी नौकरी मिली है। हालांकि सैयद, बहू को सरकारी नौकरी मिलने से खुश नहीं हैं। वे कहते हैं, ‘आदिल की शादी को 6 साल हो चुके हैं, लेकिन उसकी पत्नी पिछले 5 साल से मायके में ही रह रही है क्योंकि उनके रिश्ते अच्छे नहीं थे। इसलिए हम चाहते थे कि नौकरी हमारे छोटे बेटे को मिले। मैंने एलजी से कहा है कि हमारी रोजी-रोटी का ख्याल रखा जाए।‘ आदिल के घर से 3-4 मकान छोड़कर ही उनकी पत्नी गुलनाज रहती हैं। उन्हें फिशिंग डिपार्टमेंट में सरकारी नौकरी मिली है। गुलनाज बताती हैं, ‘अभी 10 दिन पहले ही 21 जून को नौकरी जॉइन की है। सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक ड्यूटी होती है। अभी सब ठीक चल रहा है, कोई दिक्कत नहीं है। हालांकि उनका ससुराल वालों से ज्यादा कॉन्टैक्ट नहीं है।‘टूरिज्म ठप होने से मायूस, बोले- सरकार से कोई मदद नहीं, सिर्फ शाबाशी मिली गाइड और पोनी चलाने वाले नजाकत फिलहाल अमरनाथ यात्रा में खच्चर चला रहे हैं। 22 अप्रैल की घटना के बाद से टूरिज्म काफी कम हुआ है। बाकी लोगों की तरह ही नजाकत की जिंदगी पर भी इसका गहरा असर हुआ है। वे कहते हैं, ‘मेरी दो बेटियों की पढ़ाई और रोजी-रोटी इसी से चलती है। हमले के बाद टूरिज्म थम गया। अब तो हम सब बिल्कुल खाली हो चुके हैं।‘ नजाकत ने आतंकी हमले में जिन 11 लोगों की जान बचाई थी, वे आज भी कॉन्टैक्ट में हैं। वे बताते हैं, उनमें चार परिवार छत्तीसगढ़ के थे। लकी भैया आज भी हर रोज फोन करते हैं। वे कहते हैं कि फिर कश्मीर आएंगे।हालांकि नजाकत सरकार की तरफ से कोई मदद न मिलने से नाखुश भी हैं। वे कहते हैं कि सिर्फ हैदराबाद की एक फाउंडेशन ने मदद के नाम पर 50,000 रुपए का चेक दिया। इसके अलावा कोई मदद नहीं मिली। हालांकि CM उमर अब्दुल्ला ने उन्हें अवॉर्ड देने की बात कही है। नजाकत की तरह सज्जाद अहमद भट्ट ने भी कई लोगों की जान बचाई थी। सज्जाद ने हमले में घायल टूरिस्ट्स को पीठ पर लादकर सेफ जगह पहुंचाया था। हमने सज्जाद से कॉन्टैक्ट करने की कोशिश की, लेकिन वे अमरनाथ यात्रा में घोड़ा लेकर गए हैं इसलिए उनसे कॉन्टैक्ट नहीं हो सका।हमले के वक्त अल्ला-हू-अकबर के नारे लगाने वाले मुजम्मिल काफी चर्चा में आए थे। उन्हें राष्ट्रीय जांच एजेंसी NIA ने कई बार पूछताछ के लिए बुलाया था। पहलगाम में ही जामिया मस्जिद के पास मुजम्मिल का घर है। हम उनके घर पहुंचे तो वहां कोई नहीं मिला। पास की दुकान में बैठे कुछ लोगों ने बताया कि मुजम्मिल और उनके पिता घोड़ा लेकर अमरनाथ यात्रा में गए हैं।अल्ला-हू-अकबर का नारा लगाने पर मीडिया ने मुजम्मिल को विलेन बना दिया, जबकि अब NIA ने भी उसे बरी कर दिया है।पहलगाम में 3 जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा जारी है। इसके चलते सड़कों पर सुरक्षाबलों के साथ अमरनाथ यात्रियों की भारी भीड़ जरूर दिख जाएगी। हालांकि दुकानें, होटल और रेस्टोरेंट खाली पड़े हैं। बायसरन घाटी और बाकी टूरिस्ट प्लेस को अमरनाथ यात्रा तक बंद कर दिया गया है। सुरक्षा इंतजामों के चलते टूरिस्ट्स का पहलगाम आना मना है। पहलगाम की सड़कों पर अमरनाथ यात्रियों की अच्छी-खासी भीड़ है। इनकी वजह से रौनक तो है, लेकिन दुकानें और होटल अब भी खाली हैं। पंजाब के जालंधर से आने वाले सनी पहलगाम के मेन मार्केट में शॉल की दुकान पर काम करते हैं। वे 12 साल से यहीं काम कर रहे हैं। सनी बताते हैं, ‘अमरनाथ यात्रा की वजह से टूरिस्ट रोके गए हैं, इससे धंधा कम हुआ है। हमले के बाद से अब थोड़े बहुत लोग आने लगे थे, लेकिन वापस धंधा धीमा पड़ गया है। दिन में बस 3,000-4,000 रुपए की कमाई हो रही है, जबकि हमले से पहले 10,000-15,000 रुपए से ज्यादा की कमाई हो जाती थी।‘ सनी अगले साल हालात सुधरने की उम्मीद करते हैं। उन्हीं की तरह स्नेहा भी जालंधर से पहलगाम काम करने आती हैं। स्नेहा सड़क किनारे कश्मीर और पहलगाम लिखे चाबी के छल्ले बनाती हैं। वे बताती हैं कि हर सीजन यहां आने पर अच्छी कमाई होती थी, लेकिन इस बार सब हल्का है। अमरनाथ यात्री भी गाहे-बगाहे ही सामान खरीदते हैं। हर साल सीजन में जालंधर की रहने वाली स्नेहा पहलगाम में काम करने आती है। वो इस साल भी आई हैं, लेकिन इस बार ज्यादा कमाई नहीं हो रही है।उमर पहलगाम में कश्मीर की फेमस शॉल बेचते हैं। उनकी बाजार में दो दुकानें हैं, जिस पर 5 लोग काम करते हैं। उमर बताते हैं, ‘पहलगाम में सिर्फ मुसलमानों का नहीं बाकी सभी धर्मों का भी रोजगार है। उनकी दुकान पर भी सभी धर्मों के लोग काम करते हैं। हमले के बाद काम ठप हो गया, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि टूरिस्ट जल्द ही कश्मीर लौटेंगे।‘मार्केट के अलावा पहलगाम में होटल, रिसॉर्ट और रेस्टोरेंट भी खाली पड़े हैं। पहलगाम में फेमस असल रिसॉर्ट में भी सन्नाटा है। रिसॉर्ट के जनरल मैनेजर मुदस्सिर कहते हैं कि 50% डिस्काउंट के बाद भी कमरे खाली हैं। मार्केट के हाल पर वे कहते हैं, 'हमले के दिन भी सारी प्री-बुकिंग्स फुल थीं, लेकिन इसके बाद 80-90% बुकिंग्स कैंसिल हो गईं। हमें पूरा पैसा रिफंड करना पड़ा।'अमरनाथ यात्रा के प्रभाव पर वे बताते हैं, 'यात्रा शुरू होने से थोड़ी उम्मीद जगी थी, लेकिन यात्री बजट होटल्स पसंद करते हैं। हमने 50-65% डिस्काउंट शुरू किया है। पहले 10,000 रुपए का कमरा अब 5,000 और 5,000 का 2,500 में उठा रहे हैं। फिर भी टूरिस्ट्स का फुटफॉल बहुत कम है।' मुदस्सिर कहते हैं कि हमले का असर सिर्फ होटलों पर नहीं, बल्कि घोड़ा वालों, टैक्सी ड्राइवरों, दुकानदारों और स्ट्रीट वेंडर्स पर भी पड़ा है। सबकी रोजी-रोटी प्रभावित हुई है। हम चाहते हैं कि पहलगाम में फिर से वही पुरानी रौनक दिखे।रेस्टोरेंट वाले भी यही हाल बताते हैं। आसिफ पहलगाम में पिछले 15 सालों से ‘ओल्ड स्टैंडर्ड’ नाम का होटल चला रहे हैं। हम शाम के खाने के वक्त रेस्टोरेंट पहुंचे, तब भी खाली मिला। आसिफ कहते हैं, ‘पहले टूरिस्ट और लोकल दोनों तरह के कस्टमर आते थे। हमले के बाद सब बंद हो गया। ऐसा पहली बार हुआ है कि पहलगाम में टूरिज्म इतना प्रभावित हुआ। 15 साल में ऐसा कभी नहीं देखा। पहले दिन में 30,000-50,000 रुपए का कारोबार होता था। अब मुश्किल से 5,000 से 10,000 रुपए का कारोबार हो पाता है।‘पहलगाम में नुनवान बेसकैंप से चंदनवाड़ी 48 किलोमीटर दूर है। यहां जाने के लिए ज्यादातर यात्री टैक्सी लेते हैं। हमने पहलगाम टैक्सी एसोसिएशन के वाइस प्रेसिडेंट इम्तियाज अहमद रैना से बात की। वे बताते हैं कि अभी ज्यादातर अमरनाथ यात्री ही आ रहे हैं, टूरिस्ट कम हैं। इसलिए पहले की तरह कमाई तो नहीं होती, लेकिन हालात सुधर रहे हैं। इम्तियाज कहते हैं, ‘हमले के बाद टैक्सी स्टैंड पर गाड़ियां खड़ी रहीं, कोई काम नहीं था। अब यात्रा शुरू होने से ड्राइवरों की कमाई फिर शुरू हो गई है। स्थिति पहले से बेहतर है, लेकिन हमले से पहले जैसी कमाई अभी नहीं हो पा रही। जाम काफी रहता है इसलिए एक ड्राइवर दिन में एक ट्रिप लगाता है, सुबह की गाड़ियां ही दो ट्रिप कर पाती हैं।‘ पहलगाम के टूरिस्ट टैक्सी स्टैंड की तस्वीर। यहां अमरनाथ यात्रा शुरू होने के बाद से काम-धंधा पटरी पर लौट रहा है।घोड़े वालों को भी अमरनाथ यात्रा से वापस रोजगार मिला है। उनकी शिकायत है कि इस बार के नियमों के चलते उनकी कमाई पहले जैसी नहीं हो पा रही। मोहम्मद शमी बचपन से ही पहलगाम में रह रहे हैं। महज 13-14 साल की उम्र से ही घोड़ा चलाना शुरू कर दिया था। घोड़े वालों की कमाई को लेकर वे बताते हैं, ‘दो महीने से बैठे हैं, काम न के बराबर है। रोजी-रोटी ऊपर वाले के भरोसे चल रही है।‘ पहलगाम में खेतीबाड़ी नहीं होती, हमारा रोजगार टूरिज्म पर ही निर्भर है। पहले हम घोड़े लेकर भसरामणी, स्विट्जरलैंड, कश्मीर वैली, बेताब वैली जैसी जगहों पर जाते थे, लेकिन अब ये सभी जगहें बंद हैं। अमरनाथ यात्रा के असर पर शमी कहते हैं, ‘पहले यात्रा में एक आदमी दो घोड़े ले जा सकता था, अब एक की ही इजाजत है। इससे कमाई नहीं हो पाती। 30 दिन में पूरी यात्रा करके एक घोड़े से 30 हजार कमाई होती है, लेकिन घोड़े के खाने से लेकर किराए का खर्च ही 20 हजार आ जाता है।‘पहलगाम के हालात के बाद अब हमले की जांच पर बात कर लेते हैं। 22 अप्रैल बायसरन घाटी में हुए आतंकी हमले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी और कश्मीर पुलिस कर रही है। NIA ने क्राइम सीन को रीक्रिएट किया और चश्मदीदों के बयान, वीडियो फुटेज, और तकनीकी सबूतों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया है। अब तक 2800 से ज्यादा लोगों से पूछताछ की है। इनमें स्थानीय गाइड, दुकानदार, घुड़सवार, मजदूर और चश्मदीद शामिल हैं। सुरक्षा बल हमले से पहले की घटनाओं को जोड़ने, ओवर ग्राउंड वर्कर्स या लॉजिस्टिक में मदद करने वालों की पहचान करने पर फोकस कर रहे हैं। 22 अप्रैल को दो संदिग्ध परवेज अहमद जोथर और बशीर अहमद जोथर को गिरफ्तार किया गया है। इन पर आतंकियों को खाना, ठिकाना और दूसरी मदद देने का आरोप है। इन्हें 23 जून को जम्मू की विशेष अदालत में पेश किया गया, जहां से पुलिस हिरासत में भेजा गया है। इसके अलावा 20 ओवर ग्राउंड वर्कर्स की पहचान हुई है। वहीं 600 से ज्यादा जगहों पर छापेमारी की गई। NIA ने मीडिया से अफवाहों से बचने की अपील करते हुए कहा कि जांच पूरी होने पर ही सारी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी।कश्मीर की हरी-भरी बायसरन घाटी, उसकी खूबसूरती को निहारते टूरिस्ट, गोलियां, चीखें, बचने-बचाने की कोशिशें और 26 कत्ल, 22 अप्रैल को हुए पहलगाम अटैक की कहानी बस इतनी ही है, लेकिन असर इतना बड़ा कि भारत-पाकिस्तान जंग के मुहाने पर खड़े हो गए। पहलगाम में तीन आतंकी आए और हमेशा का दर्द देकर चले गए। इस स्टोरी में पढ़िए, देखिए और सुनिए पहलगाम हमले कीबिहार के 18 जिलों में बारिश का यलो अलर्ट11 जिलों में बारिश हुईयमुनानगर में हथिनीकुंड बैराज में फंसी सात भैंस, पांच मरीआगरा की सड़क पर दौड़ा करंट, VIDEO.
आतंकियों से भिड़े आदिल की मां बोलीं- बेटा खोया, दिल में अब भी डर‘22 अप्रैल की घटना के बाद टूरिज्म बिल्कुल ठप पड़ा है। पहले एक पोनी वाला दिन में 3,000-4,000 रुपए कमा लेता था, लेकिन हमले के बाद सब ठप हो गया। हमारी रोजी-रोटी टूरिज्म से ही चलती है। मेरी दो बेटियों की पढ़ाई भी इसी से चलती है।‘पहलगाम में पोनी चलाने वाले गाइड नजाकत अहमद शाह आतंकी हमले के वक्त मौके पर ही मौजूद थे। उन्होंने आतंकी हमले में 11 टूरिस्ट्स की जान बचाई थी। अब पहलगाम हमले को ढाई महीने से ज्यादा बीत चुका है, लेकिन टूरिज्म पटरी पर नहीं आ सका है। हालांकि अमरनाथ यात्रा से थोड़ी-बहुत कमाई जरूर शुरू हुई है, लेकिन टूरिज्म पर निर्भर लोगों के हालात अब भी सुधरे नहीं हैं। उन परिवारों की तकलीफ और भी ज्यादा है, जिन्होंने इन हमलों में अपनों को खो दिया। आतंकी हमले में जान गंवाने वाले कश्मीर के आदिल हुसैन का परिवार अब तक न उन्हें खोने के गम से उबर पाया है और न हमले के खौफ से। आदिल की मां बेबीजान कहती हैं, ‘जब छोटा बेटा घर से घोड़ा लेकर निकलता है तो बस मन में उसकी सलामती की ही फिक्र रहती है।‘ पहलगाम हमले के बाद टूरिज्म पर निर्भर लोगों का क्या हाल है? हमले के बाद चर्चा में आए जिप लाइन ऑपरेटर मुजम्मिल, टूर गाइड सज्जाद और पोनी चलाने वाले गाइड नजाकत अहमद शाह किस हाल में हैं? आतंकियों की गोली लगने से जिन आदिल हुसैन की मौत हुई थी, उनका परिवार कैसी जिंदगी जी रहा है? ये जानने दैनिक भास्कर की टीम ग्राउंड पर पहुंची।बायसरन घाटी में जान गंवाने वालों में खच्चर चलाने वाले गाइड आदिल हुसैन अकेले मुस्लिम थे। आतंकियों ने उन्हें 3 गोलियां मारी थीं। आदिल का घर पहलगाम से करीब 20 किमी दूर अनंतनाग के हापतनार में है। हम आदिल के परिवार का हाल जानने के लिए उनके घर पहुंचे। घर नए सिरे से बनाया जा रहा है।आदिल के पिता सैयद हैदर शाह उसकी याद में स्मारक बनाने की मांग करते हुए कहते हैं, ‘स्मारक आदिल की याद को हमेशा जिंदा रखेगा।‘ परिवार के हाल पर सैयद बताते हैं, ‘आदिल की मां की तबीयत खराब रहती है। वो पहले से थोड़ी कमजोर हैं। आस-पास के लोग दुख बांटने आते-जाते रहते हैं, जिससे थोड़ा सहारा मिलता है।‘ अब आदिल का छोटा भाई नौशाद टूरिस्ट्स के लिए गाड़ी चलाता है। मां बेबीजान उसी सेफ्टी को लेकर परेशान रहती हैं। वे कहती हैं, ‘आदिल के जाने के बाद कुछ ठीक नहीं लगता। मेरी तबीयत भी खराब रहती है। हालांकि अब सुधर रही है। मेरा छोटा बेटा टूरिस्ट्स के लिए गाड़ी चलाता है और भाई का बेटा घोड़ा लेकर जाता है। डर तो बहुत लगता है, लेकिन मजबूरी है। अगर वो काम पर न जाएं तो घर कैसे चलेगा? कमाएगा कौन?‘ वे कहती हैं कि पिछले दो महीने में जिंदगी थोड़ी बेहतर हुई हैं, लेकिन दिल में डर बना रहता है। सब कुछ वैसा नहीं है, जैसा पहले था। आदिल के परिवार में पत्नी, मां, पिता, दो भाई और तीन बहनें हैं। ये अब तक उन्हें खोने के गम से उबर नहीं पाए हैं।आदिल के परिवार को सरकार ने 16 लाख रुपए की आर्थिक मदद दी और आदिल की पत्नी को सरकारी नौकरी मिली है। हालांकि सैयद, बहू को सरकारी नौकरी मिलने से खुश नहीं हैं। वे कहते हैं, ‘आदिल की शादी को 6 साल हो चुके हैं, लेकिन उसकी पत्नी पिछले 5 साल से मायके में ही रह रही है क्योंकि उनके रिश्ते अच्छे नहीं थे। इसलिए हम चाहते थे कि नौकरी हमारे छोटे बेटे को मिले। मैंने एलजी से कहा है कि हमारी रोजी-रोटी का ख्याल रखा जाए।‘ आदिल के घर से 3-4 मकान छोड़कर ही उनकी पत्नी गुलनाज रहती हैं। उन्हें फिशिंग डिपार्टमेंट में सरकारी नौकरी मिली है। गुलनाज बताती हैं, ‘अभी 10 दिन पहले ही 21 जून को नौकरी जॉइन की है। सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक ड्यूटी होती है। अभी सब ठीक चल रहा है, कोई दिक्कत नहीं है। हालांकि उनका ससुराल वालों से ज्यादा कॉन्टैक्ट नहीं है।‘टूरिज्म ठप होने से मायूस, बोले- सरकार से कोई मदद नहीं, सिर्फ शाबाशी मिली गाइड और पोनी चलाने वाले नजाकत फिलहाल अमरनाथ यात्रा में खच्चर चला रहे हैं। 22 अप्रैल की घटना के बाद से टूरिज्म काफी कम हुआ है। बाकी लोगों की तरह ही नजाकत की जिंदगी पर भी इसका गहरा असर हुआ है। वे कहते हैं, ‘मेरी दो बेटियों की पढ़ाई और रोजी-रोटी इसी से चलती है। हमले के बाद टूरिज्म थम गया। अब तो हम सब बिल्कुल खाली हो चुके हैं।‘ नजाकत ने आतंकी हमले में जिन 11 लोगों की जान बचाई थी, वे आज भी कॉन्टैक्ट में हैं। वे बताते हैं, उनमें चार परिवार छत्तीसगढ़ के थे। लकी भैया आज भी हर रोज फोन करते हैं। वे कहते हैं कि फिर कश्मीर आएंगे।हालांकि नजाकत सरकार की तरफ से कोई मदद न मिलने से नाखुश भी हैं। वे कहते हैं कि सिर्फ हैदराबाद की एक फाउंडेशन ने मदद के नाम पर 50,000 रुपए का चेक दिया। इसके अलावा कोई मदद नहीं मिली। हालांकि CM उमर अब्दुल्ला ने उन्हें अवॉर्ड देने की बात कही है। नजाकत की तरह सज्जाद अहमद भट्ट ने भी कई लोगों की जान बचाई थी। सज्जाद ने हमले में घायल टूरिस्ट्स को पीठ पर लादकर सेफ जगह पहुंचाया था। हमने सज्जाद से कॉन्टैक्ट करने की कोशिश की, लेकिन वे अमरनाथ यात्रा में घोड़ा लेकर गए हैं इसलिए उनसे कॉन्टैक्ट नहीं हो सका।हमले के वक्त अल्ला-हू-अकबर के नारे लगाने वाले मुजम्मिल काफी चर्चा में आए थे। उन्हें राष्ट्रीय जांच एजेंसी NIA ने कई बार पूछताछ के लिए बुलाया था। पहलगाम में ही जामिया मस्जिद के पास मुजम्मिल का घर है। हम उनके घर पहुंचे तो वहां कोई नहीं मिला। पास की दुकान में बैठे कुछ लोगों ने बताया कि मुजम्मिल और उनके पिता घोड़ा लेकर अमरनाथ यात्रा में गए हैं।अल्ला-हू-अकबर का नारा लगाने पर मीडिया ने मुजम्मिल को विलेन बना दिया, जबकि अब NIA ने भी उसे बरी कर दिया है।पहलगाम में 3 जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा जारी है। इसके चलते सड़कों पर सुरक्षाबलों के साथ अमरनाथ यात्रियों की भारी भीड़ जरूर दिख जाएगी। हालांकि दुकानें, होटल और रेस्टोरेंट खाली पड़े हैं। बायसरन घाटी और बाकी टूरिस्ट प्लेस को अमरनाथ यात्रा तक बंद कर दिया गया है। सुरक्षा इंतजामों के चलते टूरिस्ट्स का पहलगाम आना मना है। पहलगाम की सड़कों पर अमरनाथ यात्रियों की अच्छी-खासी भीड़ है। इनकी वजह से रौनक तो है, लेकिन दुकानें और होटल अब भी खाली हैं। पंजाब के जालंधर से आने वाले सनी पहलगाम के मेन मार्केट में शॉल की दुकान पर काम करते हैं। वे 12 साल से यहीं काम कर रहे हैं। सनी बताते हैं, ‘अमरनाथ यात्रा की वजह से टूरिस्ट रोके गए हैं, इससे धंधा कम हुआ है। हमले के बाद से अब थोड़े बहुत लोग आने लगे थे, लेकिन वापस धंधा धीमा पड़ गया है। दिन में बस 3,000-4,000 रुपए की कमाई हो रही है, जबकि हमले से पहले 10,000-15,000 रुपए से ज्यादा की कमाई हो जाती थी।‘ सनी अगले साल हालात सुधरने की उम्मीद करते हैं। उन्हीं की तरह स्नेहा भी जालंधर से पहलगाम काम करने आती हैं। स्नेहा सड़क किनारे कश्मीर और पहलगाम लिखे चाबी के छल्ले बनाती हैं। वे बताती हैं कि हर सीजन यहां आने पर अच्छी कमाई होती थी, लेकिन इस बार सब हल्का है। अमरनाथ यात्री भी गाहे-बगाहे ही सामान खरीदते हैं। हर साल सीजन में जालंधर की रहने वाली स्नेहा पहलगाम में काम करने आती है। वो इस साल भी आई हैं, लेकिन इस बार ज्यादा कमाई नहीं हो रही है।उमर पहलगाम में कश्मीर की फेमस शॉल बेचते हैं। उनकी बाजार में दो दुकानें हैं, जिस पर 5 लोग काम करते हैं। उमर बताते हैं, ‘पहलगाम में सिर्फ मुसलमानों का नहीं बाकी सभी धर्मों का भी रोजगार है। उनकी दुकान पर भी सभी धर्मों के लोग काम करते हैं। हमले के बाद काम ठप हो गया, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि टूरिस्ट जल्द ही कश्मीर लौटेंगे।‘मार्केट के अलावा पहलगाम में होटल, रिसॉर्ट और रेस्टोरेंट भी खाली पड़े हैं। पहलगाम में फेमस असल रिसॉर्ट में भी सन्नाटा है। रिसॉर्ट के जनरल मैनेजर मुदस्सिर कहते हैं कि 50% डिस्काउंट के बाद भी कमरे खाली हैं। मार्केट के हाल पर वे कहते हैं, 'हमले के दिन भी सारी प्री-बुकिंग्स फुल थीं, लेकिन इसके बाद 80-90% बुकिंग्स कैंसिल हो गईं। हमें पूरा पैसा रिफंड करना पड़ा।'अमरनाथ यात्रा के प्रभाव पर वे बताते हैं, 'यात्रा शुरू होने से थोड़ी उम्मीद जगी थी, लेकिन यात्री बजट होटल्स पसंद करते हैं। हमने 50-65% डिस्काउंट शुरू किया है। पहले 10,000 रुपए का कमरा अब 5,000 और 5,000 का 2,500 में उठा रहे हैं। फिर भी टूरिस्ट्स का फुटफॉल बहुत कम है।' मुदस्सिर कहते हैं कि हमले का असर सिर्फ होटलों पर नहीं, बल्कि घोड़ा वालों, टैक्सी ड्राइवरों, दुकानदारों और स्ट्रीट वेंडर्स पर भी पड़ा है। सबकी रोजी-रोटी प्रभावित हुई है। हम चाहते हैं कि पहलगाम में फिर से वही पुरानी रौनक दिखे।रेस्टोरेंट वाले भी यही हाल बताते हैं। आसिफ पहलगाम में पिछले 15 सालों से ‘ओल्ड स्टैंडर्ड’ नाम का होटल चला रहे हैं। हम शाम के खाने के वक्त रेस्टोरेंट पहुंचे, तब भी खाली मिला। आसिफ कहते हैं, ‘पहले टूरिस्ट और लोकल दोनों तरह के कस्टमर आते थे। हमले के बाद सब बंद हो गया। ऐसा पहली बार हुआ है कि पहलगाम में टूरिज्म इतना प्रभावित हुआ। 15 साल में ऐसा कभी नहीं देखा। पहले दिन में 30,000-50,000 रुपए का कारोबार होता था। अब मुश्किल से 5,000 से 10,000 रुपए का कारोबार हो पाता है।‘पहलगाम में नुनवान बेसकैंप से चंदनवाड़ी 48 किलोमीटर दूर है। यहां जाने के लिए ज्यादातर यात्री टैक्सी लेते हैं। हमने पहलगाम टैक्सी एसोसिएशन के वाइस प्रेसिडेंट इम्तियाज अहमद रैना से बात की। वे बताते हैं कि अभी ज्यादातर अमरनाथ यात्री ही आ रहे हैं, टूरिस्ट कम हैं। इसलिए पहले की तरह कमाई तो नहीं होती, लेकिन हालात सुधर रहे हैं। इम्तियाज कहते हैं, ‘हमले के बाद टैक्सी स्टैंड पर गाड़ियां खड़ी रहीं, कोई काम नहीं था। अब यात्रा शुरू होने से ड्राइवरों की कमाई फिर शुरू हो गई है। स्थिति पहले से बेहतर है, लेकिन हमले से पहले जैसी कमाई अभी नहीं हो पा रही। जाम काफी रहता है इसलिए एक ड्राइवर दिन में एक ट्रिप लगाता है, सुबह की गाड़ियां ही दो ट्रिप कर पाती हैं।‘ पहलगाम के टूरिस्ट टैक्सी स्टैंड की तस्वीर। यहां अमरनाथ यात्रा शुरू होने के बाद से काम-धंधा पटरी पर लौट रहा है।घोड़े वालों को भी अमरनाथ यात्रा से वापस रोजगार मिला है। उनकी शिकायत है कि इस बार के नियमों के चलते उनकी कमाई पहले जैसी नहीं हो पा रही। मोहम्मद शमी बचपन से ही पहलगाम में रह रहे हैं। महज 13-14 साल की उम्र से ही घोड़ा चलाना शुरू कर दिया था। घोड़े वालों की कमाई को लेकर वे बताते हैं, ‘दो महीने से बैठे हैं, काम न के बराबर है। रोजी-रोटी ऊपर वाले के भरोसे चल रही है।‘ पहलगाम में खेतीबाड़ी नहीं होती, हमारा रोजगार टूरिज्म पर ही निर्भर है। पहले हम घोड़े लेकर भसरामणी, स्विट्जरलैंड, कश्मीर वैली, बेताब वैली जैसी जगहों पर जाते थे, लेकिन अब ये सभी जगहें बंद हैं। अमरनाथ यात्रा के असर पर शमी कहते हैं, ‘पहले यात्रा में एक आदमी दो घोड़े ले जा सकता था, अब एक की ही इजाजत है। इससे कमाई नहीं हो पाती। 30 दिन में पूरी यात्रा करके एक घोड़े से 30 हजार कमाई होती है, लेकिन घोड़े के खाने से लेकर किराए का खर्च ही 20 हजार आ जाता है।‘पहलगाम के हालात के बाद अब हमले की जांच पर बात कर लेते हैं। 22 अप्रैल बायसरन घाटी में हुए आतंकी हमले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी और कश्मीर पुलिस कर रही है। NIA ने क्राइम सीन को रीक्रिएट किया और चश्मदीदों के बयान, वीडियो फुटेज, और तकनीकी सबूतों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया है। अब तक 2800 से ज्यादा लोगों से पूछताछ की है। इनमें स्थानीय गाइड, दुकानदार, घुड़सवार, मजदूर और चश्मदीद शामिल हैं। सुरक्षा बल हमले से पहले की घटनाओं को जोड़ने, ओवर ग्राउंड वर्कर्स या लॉजिस्टिक में मदद करने वालों की पहचान करने पर फोकस कर रहे हैं। 22 अप्रैल को दो संदिग्ध परवेज अहमद जोथर और बशीर अहमद जोथर को गिरफ्तार किया गया है। इन पर आतंकियों को खाना, ठिकाना और दूसरी मदद देने का आरोप है। इन्हें 23 जून को जम्मू की विशेष अदालत में पेश किया गया, जहां से पुलिस हिरासत में भेजा गया है। इसके अलावा 20 ओवर ग्राउंड वर्कर्स की पहचान हुई है। वहीं 600 से ज्यादा जगहों पर छापेमारी की गई। NIA ने मीडिया से अफवाहों से बचने की अपील करते हुए कहा कि जांच पूरी होने पर ही सारी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी।कश्मीर की हरी-भरी बायसरन घाटी, उसकी खूबसूरती को निहारते टूरिस्ट, गोलियां, चीखें, बचने-बचाने की कोशिशें और 26 कत्ल, 22 अप्रैल को हुए पहलगाम अटैक की कहानी बस इतनी ही है, लेकिन असर इतना बड़ा कि भारत-पाकिस्तान जंग के मुहाने पर खड़े हो गए। पहलगाम में तीन आतंकी आए और हमेशा का दर्द देकर चले गए। इस स्टोरी में पढ़िए, देखिए और सुनिए पहलगाम हमले कीबिहार के 18 जिलों में बारिश का यलो अलर्ट11 जिलों में बारिश हुईयमुनानगर में हथिनीकुंड बैराज में फंसी सात भैंस, पांच मरीआगरा की सड़क पर दौड़ा करंट, VIDEO
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