EVM credibility will only increase with matching of VVPAT slips | चुनाव आयोगवीवीपैट से निकली ज्यादा से ज्यादा पर्चियों का ईवीएम में पड़े वोटों से मिलान करके ही मतदाताओं की नजर में विश्वसनीयता बढ़ा सकता है।
चुनाव आयोग वीवीपैट से निकली ज्यादा से ज्यादा पर्चियों का ईवीएम में पड़े वोटों से मिलान करके ही मतदाताओं की नजर में विश्वसनीयता बढ़ा सकता है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट में विपक्षी पार्टियों की इस मांग का चुनाव आयोग विरोध क्यों कर रहा है? अभी आयोग हर असेंबली में केवल एक बूथ में पड़े मतों का वीवीपैट की पर्चियों से मिलान करने पर राजी है। यह संख्या कुल ईवीएम का एक फीसदी भी नहीं है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उप चुनाव आयुक्त से जोर देकर आग्रह किया कि आयोग को संख्या बढ़ाने पर विचार करना चाहिए, ताकि शुद्धता और विश्वसनीयता बढ़े। जब उप चुनाव आयुक्त ने तर्क दिया कि पर्चियों से मिलान के लिए संख्या बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है तो मुख्य न्यायाधीश नाराज हो गए। तब उन्होंने यह याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के जोर देने पर 2013 में वीवीपैट की शुरुआत हुई। 2014 के चुनाव में 60 फीसदी से अधिक वोट पाने वाली इन पार्टियों की अपील का आयोग की ओर से विरोध करना समझ से परे है। सत्ताधारी दल का इस प्रस्ताव का समर्थन न करना और भी चौंकाने वाला है। विपक्षी दल चाहते हैं कि कम से कम 50 फीसदी मतदान केंद्रों पर पर्चियों और ईवीएम में पड़े वोटों का मिलान हो। यह काफी बड़ी संख्या है, लेकिन रैंडम तौर पर 20 से 30 फीसदी बूथों पर सहमति का फार्मूला निकाला जा सकता है। प्रक्रिया की वजह से परिणाम में 48 घंटे की देरी भी होती है तो कोई नुकसान नहीं है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने आइडिया दिया था। उन्होंने कहा कि किसी भी सीट पर दूसरे स्थान पर रहे प्रत्याशी को पर्चियों के मिलान के लिए उसकी मर्जी से बूथ चुनने की अनुमति दे दी जाए। जैसे कि क्रिकेट में थर्ड अंपायर के पास फैसला भेजा जाता है। दलों को इसके लिए निश्चित मौके तय कर दिए जाने चाहिए।चुनाव आयोग को विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार करने की बजाय अपना ही कोई समाधान पेश करना चाहिए। जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता की बात हो तो संवैधानिक संस्थाओं के बीच किसी तरह का अहम आड़े नहीं आना चाहिए। ईवीएम पूरी तरह सुरक्षित हैं और इनमें गड़बड़ी नहीं की जा सकती। इस बारे में दोनों ही तरह के विचार हैं। सांख्यिकीय तौर पर यह साबित हो चुका है कि पांच फीसदी मशीनों में गड़बड़ी आ जाती है और इसका कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता। कुछ लोगों ने विदेश में निजी कंपनी द्वारा डिजाइन होने वाली ईवीएम चिप में पारदर्शिता को लेकर भी संदेह व्यक्त किया है।आयोग ने संदेहों को दूर करने के लिए आईआईटी जैसे संस्थानों के टॉप एक्सपर्ट का पैनल बनाकर इसके तकनीकी पैरामीटर की भी जांच कराई थी। इस पर बहस हो चुकी हैं कि लेकिन संदेह दूर नहीं हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जर्मनी और अमेरिका जैसे देश बैलेट पेपर पर लौट गए हैं। यह इसलिए संभव हुआ कि इन देशों में सोसायटी के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया अहम है।भारत में भी इस तरह की बहस तो चल रही है पर कोई समाधान दिखाई नहीं देता। फिलहाल तो चुनाव आयोग को पूर्ण पारदर्शिता के लिए वीवीपैट सत्यापन के सैंपल साइज को बढ़ाने की मांग को स्वीकार कर लेना चाहिए। जैसा कि मुख्य न्यायाधीश ने भी कहा कि कोई भी संस्थान कितना भी ऊंचा क्यों न हो उसे खुद में सुधार के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। हम इतने संदेह और अविश्वास के साथ 2019 के चुनावों में जाना मंजूर नहीं कर सकते।.
चुनाव आयोग वीवीपैट से निकली ज्यादा से ज्यादा पर्चियों का ईवीएम में पड़े वोटों से मिलान करके ही मतदाताओं की नजर में विश्वसनीयता बढ़ा सकता है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट में विपक्षी पार्टियों की इस मांग का चुनाव आयोग विरोध क्यों कर रहा है? अभी आयोग हर असेंबली में केवल एक बूथ में पड़े मतों का वीवीपैट की पर्चियों से मिलान करने पर राजी है। यह संख्या कुल ईवीएम का एक फीसदी भी नहीं है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उप चुनाव आयुक्त से जोर देकर आग्रह किया कि आयोग को संख्या बढ़ाने पर विचार करना चाहिए, ताकि शुद्धता और विश्वसनीयता बढ़े। जब उप चुनाव आयुक्त ने तर्क दिया कि पर्चियों से मिलान के लिए संख्या बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है तो मुख्य न्यायाधीश नाराज हो गए। तब उन्होंने यह याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के जोर देने पर 2013 में वीवीपैट की शुरुआत हुई। 2014 के चुनाव में 60 फीसदी से अधिक वोट पाने वाली इन पार्टियों की अपील का आयोग की ओर से विरोध करना समझ से परे है। सत्ताधारी दल का इस प्रस्ताव का समर्थन न करना और भी चौंकाने वाला है। विपक्षी दल चाहते हैं कि कम से कम 50 फीसदी मतदान केंद्रों पर पर्चियों और ईवीएम में पड़े वोटों का मिलान हो। यह काफी बड़ी संख्या है, लेकिन रैंडम तौर पर 20 से 30 फीसदी बूथों पर सहमति का फार्मूला निकाला जा सकता है। प्रक्रिया की वजह से परिणाम में 48 घंटे की देरी भी होती है तो कोई नुकसान नहीं है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने आइडिया दिया था। उन्होंने कहा कि किसी भी सीट पर दूसरे स्थान पर रहे प्रत्याशी को पर्चियों के मिलान के लिए उसकी मर्जी से बूथ चुनने की अनुमति दे दी जाए। जैसे कि क्रिकेट में थर्ड अंपायर के पास फैसला भेजा जाता है। दलों को इसके लिए निश्चित मौके तय कर दिए जाने चाहिए।चुनाव आयोग को विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार करने की बजाय अपना ही कोई समाधान पेश करना चाहिए। जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता की बात हो तो संवैधानिक संस्थाओं के बीच किसी तरह का अहम आड़े नहीं आना चाहिए। ईवीएम पूरी तरह सुरक्षित हैं और इनमें गड़बड़ी नहीं की जा सकती। इस बारे में दोनों ही तरह के विचार हैं। सांख्यिकीय तौर पर यह साबित हो चुका है कि पांच फीसदी मशीनों में गड़बड़ी आ जाती है और इसका कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता। कुछ लोगों ने विदेश में निजी कंपनी द्वारा डिजाइन होने वाली ईवीएम चिप में पारदर्शिता को लेकर भी संदेह व्यक्त किया है।आयोग ने संदेहों को दूर करने के लिए आईआईटी जैसे संस्थानों के टॉप एक्सपर्ट का पैनल बनाकर इसके तकनीकी पैरामीटर की भी जांच कराई थी। इस पर बहस हो चुकी हैं कि लेकिन संदेह दूर नहीं हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जर्मनी और अमेरिका जैसे देश बैलेट पेपर पर लौट गए हैं। यह इसलिए संभव हुआ कि इन देशों में सोसायटी के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया अहम है।भारत में भी इस तरह की बहस तो चल रही है पर कोई समाधान दिखाई नहीं देता। फिलहाल तो चुनाव आयोग को पूर्ण पारदर्शिता के लिए वीवीपैट सत्यापन के सैंपल साइज को बढ़ाने की मांग को स्वीकार कर लेना चाहिए। जैसा कि मुख्य न्यायाधीश ने भी कहा कि कोई भी संस्थान कितना भी ऊंचा क्यों न हो उसे खुद में सुधार के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। हम इतने संदेह और अविश्वास के साथ 2019 के चुनावों में जाना मंजूर नहीं कर सकते।
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