परमाणु हथियारों का खतरा

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राजनीति: परमाणु हथियारों का खतरा

राजनीति: परमाणु हथियारों का खतरा जनसत्ता March 6, 2019 3:04 AM विश्व में सत्तर हजार से अधिक परमाणु हथियार हैं। अभिजीत मोहन इन दिनों भारत और पाकिस्तान में तनाव के बीच पाकिस्तान द्वारा बार-बार परमाणु हमले की धमकी से एक बार फिर विश्व समुदाय असहज है। परमाणु हथियारों के औचित्य पर विमर्श शुरू हो गया है। विश्व शांति के लिए परमाणु बमों के बजाय समन्वयवादी विचारों और सद्भाव की जरूरत है। लेकिन सच्चाई यह है कि आज विश्व में सत्तर हजार से अधिक परमाणु हथियार हैं और हर हथियार हिरोशिमा और नागासाकी जैसे किसी भी शहर को एक झटके में मिटा देने में सक्षम है। इन हथियारों के जरिए दुनिया को एक या दो बार नहीं, कई बार मिटाया जा सकता है। आंकड़ों पर गौर करें तो 1945 के बाद से दुनिया में दो हजार से ज्यादा ज्ञात परमाणु परीक्षण हो चुके हैं और इनमें से पिच्यासी फीसद परीक्षण अकेले अमेरिका और रूस ने किए। ये दोनों ही देश विश्व की महाशक्तियां हैं और दुनिया के अधिकांश देश इन्हीं दोनों देशों के खेमे में बंटे हुए हैं। इनमें से अमेरिका ने एक हजार तीन सौ बत्तीस, रूस ने सात सौ पंद्रह, ब्रिटेन ने पैंतालीस, फ्रांस ने दो सौ दस और चीन ने पैंतालीस परीक्षण किए हैं। भारत और पाकिस्तान भी छह परमाणु परीक्षण कर चुके हैं। गौरतलब है कि अमेरिका ने 16 जुलाई, 1945 को मैक्सिको के आल्मागार्दो रेगिस्तान में पहले परमाणु बम का परीक्षण किया और उसके बाद से ही परमाणु युग की शुरुआत हुई। अमेरिका की देखा-देखी सोवियत संघ ने 1949 में, ब्रिटेन ने 1952 में, फ्रांस ने 1958 में और चीन ने 1964 में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। इस बिरादरी में भारत भी सम्मिलित हो गया जब उसने 18 मई, 1974 को पोकरण में अपना पहला भूमिगत परीक्षण किया था। अब हालत यह है कि समूची दुनिया कभी न खत्म होने वाली परमाणु परीक्षणों की दौड़ में शामिल हो गई है। विडंबना यह है कि परमाणु संपन्न देश परमाणु शस्त्र कटौती संधि के बावजूद इन घातक हथियारों में कमी लाने को तैयार नहीं हैं। परमाणु हथियारों के उत्पादन को सीमित करने और उनके प्रयोग व परीक्षण पर रोक लगाने के संबंध में संसार की दो महाशक्तियों के बीच 1967 की परमाणु अप्रसार संधि हुई थी जिसे 12 जून 1968 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारी बहुमत से स्वीकृति प्रदान की और पांच मार्च 1970 से यह प्रभावी हो गई थी। इस संधि के अंतर्गत यह व्यवस्था दी गई कि कोई भी परमाणु संपन्न देश अकेले या मिल कर अपने हथियार किसी भी राष्ट्र को नहीं देंगे। संधि पर हस्ताक्षर करने वाला प्रत्येक राष्ट्र परमाणु हथियारों की होड़ खत्म करने एवं परमाणु निरस्त्रीकरण को प्रभावशाली बनाने के लिए बाध्य होगा। लेकिन यहां उल्लेखनीय तथ्य यह कि इस संधि के प्रारूप पर आपत्ति जताते हुए फ्रांस, इटली, जर्मनी और भारत ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। भारत के अनुसार यह संधि भेदभावपूर्ण, असमानता पर आधारित एकपक्षीय एवं अपूर्ण है। हालांकि भारत को इस नीति के कारण परमाणु क्लब के सदस्यों की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। लेकिन भारत अब भी अपने पुराने तर्क पर कायम है कि परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने और पूर्ण निरस्त्रीकरण के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्षेत्रीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किया जाना चाहिए। भारत के इस तर्क से विश्व के कई देश सहमत हैं। इसलिए कि यह संधि छोटे राष्ट्रों के हितों को सुरक्षित रखने और समयानुकूल परिवर्तन करने में सक्षम नहीं है। इस संधि के द्वारा एक ओर तो यह प्रतिबंध लगाया गया है कि जो राष्ट्र अभी तक परमाणु बम नहीं बना सके हैं, वे भविष्य में भी नहीं बनाएंगे। जबकि दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से परमाणु शक्ति-विहीन राष्ट्रों को परमाणु शक्ति-संपन्न राष्ट्र द्वारा परमाणु हमले के समय जो गारंटी दी गई है, वह अपर्याप्त है। इसके अलावा परमाणु संधि करने वाले राष्ट्रों के पास ऐसा कोई मापदंड नहीं है जिससे सैनिक कार्यों एवं असैनिक कार्यों में स्पष्ट रूप से विभाजन किया जा सके ताकि यह शंका न रहे कि असैनिक कार्यों में किए गए परमाणु प्रयोग सैनिक कार्यों में प्रयुक्त हो सकेंगे। भारत हमेशा से परमाणु हथियारों के निषेध का पक्षधर रहा है। उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु प्रसार को रोकने के लिए बड़ी भूमिका निभाई है। 1963 में आंशिक परमाणु परीक्षण निषेध संधि को अंतिम रूप प्रदान करने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दिसंबर 1993 में भारत ने अमेरिका के साथ मिल कर व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि का ब्योरा संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किया था। सच तो यह है कि भारत हमेशा ही परमाणु शक्ति का उपयोग लोगों के जीवन स्तर को सुधारने व आर्थिक खुशहाली के लिए करने का पक्षधर रहा है, न कि हथियारों के उपयोग का। भारत के परमाणु विकास कार्यक्रम पर गौर करें तो स्पष्ट है कि वह हमेशा परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग का पक्षधर और परमाणु शस्त्र नियंत्रण व निरस्त्रीकरण का समर्थक रहा है। उसने परमाणु शक्तिसंपन्न राष्ट्रों के परमाणु हथियारों के परीक्षण को लेकर जैसा विरोध किया, वैसा किसी दूसरे राष्ट्र ने नहीं किया। जहां तक भारत की परमाणु नीति की उत्पत्ति व विकास का सवाल है तो उसका मूल आधार सामाजिक व आर्थिक है। इसलिए कि परमाणु ऊर्जा के अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण के संबंध में नीति निर्धारण के लिए भारत ने दो बातों पर खासतौर से जोर दिया। एक, इस नए ऊर्जा स्रोत के आर्थिक उपयोग की सभी को स्वतंत्रता हो, और दूसरा इसको निरस्त्रीकरण से जोड़ा जाए। भारत निरस्त्रीकरण और शस्त्र नियंत्रण को एक-दूसरे का पर्याय मानता है। शस्त्र नियंत्रण निरस्त्रीकरण का अनिवार्य अंग है। दोनों का मूल मकसद अंतरराष्ट्रीय समाज में हिंसा व शक्ति के प्रयोग को रोकना व सीमित करना है। जून, 1982 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में निरस्त्रीकरण पर पांच सूत्रीय ठोस कार्यक्रम प्रस्तुत किया जिसकी चौतरफा सराहना हुई। अक्सर भारत की परमाणु नीति को 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षण से जोड़ते हुए उसे संदेह की परिधि में रखा जाता है। लेकिन यह उचित नहीं है। वैश्विक समुदाय को समझना होगा कि यह भारत की आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति और आत्मसुरक्षा के लिए बेहद आवश्यक था। इसलिए और भी कि चीन ने 1964 में परमाणु विस्फोट कर सामरिक असंतुलन पैदा कर दिया था। निस्संदेह आज भारत की परमाणु नीति का उद्देश्य अब ऊर्जा उत्पादन तक सीमित न रह कर शस्त्र उत्पादन से भी जुड़ गया है। लेकिन इसमें कोई बुराई नहीं है। इसलिए कि शीतयुद्धोत्तर युग में संघर्ष में आई कमी के बावजूद दक्षिण एशिया में शांति के युग का प्रारंभ नहीं हुआ है। वैश्विक शक्तियों के हस्तक्षेप, विशेषकर अमेरिका की नीतियों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होना, मध्य एशियाई गणराज्यों की उत्पत्ति, पाकिस्तान में आंतरिक अशांति, अफगानिस्तान की समस्या से किसी भी समय स्थिति नाजुक बन सकती है। हालांकि भारत का परमाणु कार्यक्रम किसी देश को धमकी देने नहीं बल्कि रचनात्मक विकास और मानवता के कल्याण के लिए है। भारत वैश्विक शांति के लिए प्रतिबद्ध है और अपने पड़ोसियों से भी यही अपेक्षा रखता है। Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए 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राजनीति: परमाणु हथियारों का खतरा जनसत्ता March 6, 2019 3:04 AM विश्व में सत्तर हजार से अधिक परमाणु हथियार हैं। अभिजीत मोहन इन दिनों भारत और पाकिस्तान में तनाव के बीच पाकिस्तान द्वारा बार-बार परमाणु हमले की धमकी से एक बार फिर विश्व समुदाय असहज है। परमाणु हथियारों के औचित्य पर विमर्श शुरू हो गया है। विश्व शांति के लिए परमाणु बमों के बजाय समन्वयवादी विचारों और सद्भाव की जरूरत है। लेकिन सच्चाई यह है कि आज विश्व में सत्तर हजार से अधिक परमाणु हथियार हैं और हर हथियार हिरोशिमा और नागासाकी जैसे किसी भी शहर को एक झटके में मिटा देने में सक्षम है। इन हथियारों के जरिए दुनिया को एक या दो बार नहीं, कई बार मिटाया जा सकता है। आंकड़ों पर गौर करें तो 1945 के बाद से दुनिया में दो हजार से ज्यादा ज्ञात परमाणु परीक्षण हो चुके हैं और इनमें से पिच्यासी फीसद परीक्षण अकेले अमेरिका और रूस ने किए। ये दोनों ही देश विश्व की महाशक्तियां हैं और दुनिया के अधिकांश देश इन्हीं दोनों देशों के खेमे में बंटे हुए हैं। इनमें से अमेरिका ने एक हजार तीन सौ बत्तीस, रूस ने सात सौ पंद्रह, ब्रिटेन ने पैंतालीस, फ्रांस ने दो सौ दस और चीन ने पैंतालीस परीक्षण किए हैं। भारत और पाकिस्तान भी छह परमाणु परीक्षण कर चुके हैं। गौरतलब है कि अमेरिका ने 16 जुलाई, 1945 को मैक्सिको के आल्मागार्दो रेगिस्तान में पहले परमाणु बम का परीक्षण किया और उसके बाद से ही परमाणु युग की शुरुआत हुई। अमेरिका की देखा-देखी सोवियत संघ ने 1949 में, ब्रिटेन ने 1952 में, फ्रांस ने 1958 में और चीन ने 1964 में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। इस बिरादरी में भारत भी सम्मिलित हो गया जब उसने 18 मई, 1974 को पोकरण में अपना पहला भूमिगत परीक्षण किया था। अब हालत यह है कि समूची दुनिया कभी न खत्म होने वाली परमाणु परीक्षणों की दौड़ में शामिल हो गई है। विडंबना यह है कि परमाणु संपन्न देश परमाणु शस्त्र कटौती संधि के बावजूद इन घातक हथियारों में कमी लाने को तैयार नहीं हैं। परमाणु हथियारों के उत्पादन को सीमित करने और उनके प्रयोग व परीक्षण पर रोक लगाने के संबंध में संसार की दो महाशक्तियों के बीच 1967 की परमाणु अप्रसार संधि हुई थी जिसे 12 जून 1968 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारी बहुमत से स्वीकृति प्रदान की और पांच मार्च 1970 से यह प्रभावी हो गई थी। इस संधि के अंतर्गत यह व्यवस्था दी गई कि कोई भी परमाणु संपन्न देश अकेले या मिल कर अपने हथियार किसी भी राष्ट्र को नहीं देंगे। संधि पर हस्ताक्षर करने वाला प्रत्येक राष्ट्र परमाणु हथियारों की होड़ खत्म करने एवं परमाणु निरस्त्रीकरण को प्रभावशाली बनाने के लिए बाध्य होगा। लेकिन यहां उल्लेखनीय तथ्य यह कि इस संधि के प्रारूप पर आपत्ति जताते हुए फ्रांस, इटली, जर्मनी और भारत ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। भारत के अनुसार यह संधि भेदभावपूर्ण, असमानता पर आधारित एकपक्षीय एवं अपूर्ण है। हालांकि भारत को इस नीति के कारण परमाणु क्लब के सदस्यों की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। लेकिन भारत अब भी अपने पुराने तर्क पर कायम है कि परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने और पूर्ण निरस्त्रीकरण के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्षेत्रीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किया जाना चाहिए। भारत के इस तर्क से विश्व के कई देश सहमत हैं। इसलिए कि यह संधि छोटे राष्ट्रों के हितों को सुरक्षित रखने और समयानुकूल परिवर्तन करने में सक्षम नहीं है। इस संधि के द्वारा एक ओर तो यह प्रतिबंध लगाया गया है कि जो राष्ट्र अभी तक परमाणु बम नहीं बना सके हैं, वे भविष्य में भी नहीं बनाएंगे। जबकि दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से परमाणु शक्ति-विहीन राष्ट्रों को परमाणु शक्ति-संपन्न राष्ट्र द्वारा परमाणु हमले के समय जो गारंटी दी गई है, वह अपर्याप्त है। इसके अलावा परमाणु संधि करने वाले राष्ट्रों के पास ऐसा कोई मापदंड नहीं है जिससे सैनिक कार्यों एवं असैनिक कार्यों में स्पष्ट रूप से विभाजन किया जा सके ताकि यह शंका न रहे कि असैनिक कार्यों में किए गए परमाणु प्रयोग सैनिक कार्यों में प्रयुक्त हो सकेंगे। भारत हमेशा से परमाणु हथियारों के निषेध का पक्षधर रहा है। उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु प्रसार को रोकने के लिए बड़ी भूमिका निभाई है। 1963 में आंशिक परमाणु परीक्षण निषेध संधि को अंतिम रूप प्रदान करने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दिसंबर 1993 में भारत ने अमेरिका के साथ मिल कर व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि का ब्योरा संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किया था। सच तो यह है कि भारत हमेशा ही परमाणु शक्ति का उपयोग लोगों के जीवन स्तर को सुधारने व आर्थिक खुशहाली के लिए करने का पक्षधर रहा है, न कि हथियारों के उपयोग का। भारत के परमाणु विकास कार्यक्रम पर गौर करें तो स्पष्ट है कि वह हमेशा परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग का पक्षधर और परमाणु शस्त्र नियंत्रण व निरस्त्रीकरण का समर्थक रहा है। उसने परमाणु शक्तिसंपन्न राष्ट्रों के परमाणु हथियारों के परीक्षण को लेकर जैसा विरोध किया, वैसा किसी दूसरे राष्ट्र ने नहीं किया। जहां तक भारत की परमाणु नीति की उत्पत्ति व विकास का सवाल है तो उसका मूल आधार सामाजिक व आर्थिक है। इसलिए कि परमाणु ऊर्जा के अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण के संबंध में नीति निर्धारण के लिए भारत ने दो बातों पर खासतौर से जोर दिया। एक, इस नए ऊर्जा स्रोत के आर्थिक उपयोग की सभी को स्वतंत्रता हो, और दूसरा इसको निरस्त्रीकरण से जोड़ा जाए। भारत निरस्त्रीकरण और शस्त्र नियंत्रण को एक-दूसरे का पर्याय मानता है। शस्त्र नियंत्रण निरस्त्रीकरण का अनिवार्य अंग है। दोनों का मूल मकसद अंतरराष्ट्रीय समाज में हिंसा व शक्ति के प्रयोग को रोकना व सीमित करना है। जून, 1982 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में निरस्त्रीकरण पर पांच सूत्रीय ठोस कार्यक्रम प्रस्तुत किया जिसकी चौतरफा सराहना हुई। अक्सर भारत की परमाणु नीति को 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षण से जोड़ते हुए उसे संदेह की परिधि में रखा जाता है। लेकिन यह उचित नहीं है। वैश्विक समुदाय को समझना होगा कि यह भारत की आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति और आत्मसुरक्षा के लिए बेहद आवश्यक था। इसलिए और भी कि चीन ने 1964 में परमाणु विस्फोट कर सामरिक असंतुलन पैदा कर दिया था। निस्संदेह आज भारत की परमाणु नीति का उद्देश्य अब ऊर्जा उत्पादन तक सीमित न रह कर शस्त्र उत्पादन से भी जुड़ गया है। लेकिन इसमें कोई बुराई नहीं है। इसलिए कि शीतयुद्धोत्तर युग में संघर्ष में आई कमी के बावजूद दक्षिण एशिया में शांति के युग का प्रारंभ नहीं हुआ है। वैश्विक शक्तियों के हस्तक्षेप, विशेषकर अमेरिका की नीतियों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होना, मध्य एशियाई गणराज्यों की उत्पत्ति, पाकिस्तान में आंतरिक अशांति, अफगानिस्तान की समस्या से किसी भी समय स्थिति नाजुक बन सकती है। हालांकि भारत का परमाणु कार्यक्रम किसी देश को धमकी देने नहीं बल्कि रचनात्मक विकास और मानवता के कल्याण के लिए है। भारत वैश्विक शांति के लिए प्रतिबद्ध है और अपने पड़ोसियों से भी यही अपेक्षा रखता है। Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए 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