भारत के कई पड़ोसी देशों में सत्ता परिवर्तन के बाद ऐसी सरकारें आई हैं जिनका भारत के प्रति रवैया उतना दोस्ताना नहीं है जितना कभी हुआ करता था.
बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के प्रमुख महोम्मद यूनुस, श्रीलंका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति दिसानायके और मालदीव के राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू.बांग्लादेश सरकार के चीफ़ एडवाइज़र मोहम्मद यूनुस न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली के सेशन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से मिले हैं.
जो बाइडन के कार्यालय की ओर से जारी एक प्रेस नोट में दोनों नेताओं के बीच दिखी गर्मजोशी पर रोशनी डाली है. अमेरिका ने कहा है कि उसे बांग्लादेश के पुनर्निमाण के लिए ‘और कोशिश’ करनी होगी. अगस्त में चले विरोध प्रदर्शनों के बाद बांग्लादेश की प्रधानमंत्री को देश छोड़ना पड़ा था और वे भारत आ गई थीं. उसके बाद से बांग्लादेश में एक अंतरिम सरकार अस्तित्व में आई है. मोहम्मद यूनुस इसी सरकार के प्रमुख हैं. न्यूयॉर्क में यूनुस और बाइडन के बीच गर्मजोशी नरेंद्र मोदी सरकार के लिए चिंता का सबब हो सकती है.बांग्लादेश भारत के उन पड़ोसी देशों में से एक है जहां हाल के वर्षों में सत्ता में परिवर्तन हुए हैं. पड़ोसी देशों में हुए इन सत्ता परिवर्तनों के कारण भारत के उनके साथ संबंध अस्थिर-से हैं. पिछले हफ़्ते श्रीलंका ने वामपंथी झुकाव वाले अनुरा दिसानायके को राष्ट्रपति चुना. साल 2023 में नेपाल, 2021 में म्यांमार, 2023 में मालदीव और 2021 में अफ़ग़ानिस्तान में भी सत्ता परिवर्तन हुआ है.साल 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद उनकी सरकार ने 'नेबरहुड फ़र्स्ट' पॉलिसी शुरू की थी. इस नीति का उद्देश्य भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को बेहतर बनाना था.श्रीलंका में वामपंथी अनुरा कुमारा दिसानायके का राष्ट्रपति बनना भारत के लिए कैसा रहेगामालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने अपने चुनावी अभिायन में 'इंडिया आउट' का नारा दिया था.हाल के दिनों में भारत का अपने कई पड़ोसियों के साथ टकराव हुआ है. मालदीव में राष्ट्रपति चुने गए मोहम्मद मुइज़्ज़ू ‘इंडिया आउट’ के नारे पर चुनाव जीते थे. उसके बाद मुइज़्ज़ू ने दशकों से चली आ रही एक परंपरा तोड़ी थी. इस परंपरा के तहत मालदीव में सत्ता संभालने के बाद हर राष्ट्रपति सबसे पहले भारत का दौरा करता आया है. लेकिन मुइज़्ज़ू ने पहले दौरे के लिए तुर्की को चुना. इस साल की शुरुआत में चीन के दौरे के बाद मुइज़्ज़ू ने भारत से मालदीव में मौजूद भारतीय सैनिकों को वापस बुलाने के लिए कहा था. भारत ने उनका अनुरोध मानते हुए अपने सैनिक वापस बुला लिए थे. लेकिन जुलाई में मुइज़्ज़ू के रवैये में थोड़ा परिवर्तन देखा गया.कुछ इसी तरह साल 2020 में भारत और नेपाल के बीच रिश्तों में भी खटास आई. तब नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा था कि भारत नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है. लेकिन साल 2024 में ओली एक बार फिर नेपाल के पीएम चुने गए हैं और अब दोनों देशों के बीच संबंध धीरे-धीरे पटरी पर आ रहे हैं. पिछले हफ़्ते संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली के दौरान ओली और मोदी ने द्विपक्षीय वार्ताएं की हैं. दोनों देशों ने इस बातचती को सकारात्मक बताया है. पीएम मोदी ने कहा है कि भारत और नेपाल के बीच रिश्ते बहुत मज़बूत हैं और वे इन संबंधों को और रफ़्तार देने की दिशा में बढ़ रहे हैं. भारत ने तालिबान को अब तक अफ़ग़ानिस्तान के वैध सरकार के रूप में स्वीकार नहीं किया है. हालांकि भारत उन 15 देशों की सूची में शामिल है जो अफ़गानिस्तान में कूटनयिक मौजूदगी रखते हैं.मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद भारत बैकफ़ुट पर आ गया था. भारत के शेख़ हसीना की सरकार के साथ बहुत अच्छे संबंध थे. लेकिन जब हसीना के ख़िलाफ़ बांग्लादेश में प्रदर्शन शुरू हुए तो वहां के लोगों ने भारत को शक की नज़र से देखना शुरू कर दिया. पीएम मोदी और यूनुस, दोनों ने ही एक साथ काम करने की इच्छा ज़ाहिर की है लेकिन इसकी दिशा क्या होगी ये फ़िलहाल तय नहीं है.पांच अगस्त को बांग्लादेश की पीएम शेख़ हसीना के देश छोड़ने के बाद उनके कार्यालय पर प्रदर्शनकारियों ने धावा बोल दिया था. कई जानकारों का मानना है कि अमेरिकी और रूस जैसे बड़े मुल्कों के साथ संबंध बेहतर करने के क्रम में भारत ने अपने पड़ोसी देशों से रिश्तों को तरजीह नहीं दी है. वरिष्ठ पत्रकार और 'द हिंदू' की डिप्लोमेटिक संपादक सुहासिनी हैदर कहती हैं, “अपने पड़ोसियों के साथ संंबंध भारत के लिए कभी भी आसान नहीं रहे हैं. बीते 10 वर्षों में सरकार ने नेबरहुड फ़र्स्ट की बात की है लेकिन इसपर कोई कार्रवाई नहीं की है. इस क्षेत्र पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है. इसलिए भारत को ये उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि ये देश उसके बारे में अच्छा अनुभव करें.” सुहासिनी हैदर का कहना है, “भारत को इस मुग़ालते में नहीं रहना चाहिए कि पड़ोसी देशों की सरकारें उसकी विदेश नीति से हमेशा सहमत ही होंगी. भारत अपने पड़ोसियों पर अपनी विदेश नीति नहीं थोप सकता. सरकार लगातार बदल रहे पड़ोस से यही सबक सीख रहा है.” लेकिन बांग्लादेश में भारत की हाई कमिश्नर रहीं वीना सिकरी कहती हैं कि देश की 'नेबरहुड फ़र्स्ट' पॉलिसी काफ़ी गतिशील है. वीना सीकरी का कहना है, “ये नीति काफ़ी उत्तरदायी और लचीली है. हम किसी भी स्थिति से तालमेल बिठा सकते हैं. इसकी सबसे अच्छी मिसाल है कि कैसे भारत ने मालदीव में मुइज़्ज़ू की 'इंडिया आउट' नीति से निपटा. धीरे धीरे ये सही हुआ." "जब श्रीलंका बड़े आर्थिक संकट का सामना कर रहा था, तब भारत ने वित्तीय मदद की. बांग्लादेश में भी भारत ने कहा है कि वह अंतरिम सरकार के साथ काम करना चाहता है." उन्होंने कहा, "यह एक बड़ा संकेत है कि नेबरहुड फ़र्स्ट पॉलिसी अब विकसित और परिपक्व हो गई है. पिछले कुछ वर्षों में इसका इम्तिहान हुआ है और ये उस परीक्षा पर खरी उतरी है.”शुरुआती तल्ख़ी के बाद मालदीव सरकार ने भारत के साथ रिश्तों को सुधारने की पहल की है. जानकार ये भी कहते हैं कि भारत के पड़ोसियों के साथ संबंध कई वजहों से प्रभावित होते हैं. इनमें इन देशों में होने वाले घेरलू परिवर्तन और उनका लोकतंत्रीकरण शामिल है. दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, “इस बात में कोई शक नहीं है कि इन देशों में हुए सत्ता परिवर्तन ने भारत की विदेश नीति की चुनौतियों को बढ़ा दिया है." "लेकिन हमें ये समझना होगा कि इन परिवर्तनों का कारण भारत नही हैं. पड़ोसी देशों में हुए बदलावों का कारण उनकी घेरलू नीतियां हैं.” स्वर्ण सिंह कहते हैं कि अमेरिका के तो बस दो ही बड़े पड़ोसी हैं - मेक्सिको और कनाडा. लेकिन भारत पाकिस्तान के अलावा भी कई छोटे-छोटे देशों से घिरा हुआ है. स्वर्ण सिंह कहते हैं, "इससे ‘स्मॉल स्टेट सिंड्रोम’ की स्थिति पैदा हो जाती है. इसमें पड़ोसियों को लगता है कि भारत उन्हें आँखें दिखा रहा है. जैसे-जैसे इन छोटे देशों में लोकतंत्र मज़बूत होगा वैसे-वैसे भारत के सामने डटकर खड़ा होना इन देशों की पहचान का हिस्सा बन जाएगा." "मिसाल के तौर पर भूटान और भारत के बीच संबंध हमेशा बेहतरीन रहे हैं. लेकिन जब वहां चुनाव होते हैं तो भारत विरोधी नारे लगते हैं.” नेपाल, बांग्लादेश और मालदीव जैसे सभी छोटे देशों ने खुद को चीन और भारत, दोनों से ही ‘बराबर दूरी’ की नीति अपना ली है. विशेषज्ञों का कहना है कि इन दोनों देशों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए इन सभी देशों को जो संतुलन बनाना चाहिए, वह अक्सर उन्हें कर्ज़े, भोजन और पानी जैसे बुनियादी संसाधनों की कमी, जैसी मुसीबत भरे हालात में धकेलता है.भारत अपने किसी पड़ोसी देश के घरेलू बदलाव को प्रभावित नहीं कर सकता लेकिन बांग्लादेश जैसे कुछ मामलों में भारत ने दूरदर्शिता की कमी भी दिखाई है. सुहासिनी हैदर कहती हैं, “पड़ोस में प्रतिकूल सत्ता परिवर्तन ये बताते हैं कि मोदी सरकार सिर्फ़ द्विपक्षीय वार्ताओं के ज़रिए क्षेत्रीय भू-राजनीति में परिवर्तन नहीं ला सकती." "भारत अमेरिका जैसे ग्लोबल प्लेयर के साथ लगातार बात करता रहता है लेकिन उसे अपने पड़ोस पर भी ध्यान देना चाहिए. बांग्लादेश में स्थिति ख़ास तौर पर गंभीर थी क्योंकि वहाँ भारत के उच्चायोग के अलावा देश में चार वाणिज्य दूतावास भी हैं. इसके बावजूद भारत वहां के हालात का सही आकलन नहीं कर पाया.” सुहासिनी हैदर के मुताबिक “बांग्लादेश में भारत सिर्फ़ एक पक्ष के संपर्क में रहा और उसने देश के भीतर विपक्ष को नज़रअंदाज़ किया. अब भारत इसी ग़लती की क़ीमत अदा कर रहा है.” हैदर कहती हैं कि इसके विपरीत श्रीलंका में भारत की राजनीतिक हालात को बेहतर तरीक़े से हैंडल किया क्योंकि पीएम मोदी ने अनुरा दिसानायके को राष्ट्रपति बनने से पहले ही भारत बुलाया था. वे कहती हैं, “लेकिन कई पड़ोसी देशों में भारतीयों की परियोजनाएं भी हैं, जैसे श्रीलंका में अदानी का प्रोजेक्ट है. भारत को ये समझना होगा कि अगर वो ऐसी परियोजना की हिमायत करता है तो इसके अपने परिणाम होंगे.”पाकिस्तान के विदेश मंत्री के बयान को कई लोग भारत के पक्ष में क्यों मान रहे हैं?इमेज कैप्शन,जानकार कहते हैं कि पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के बारे में भारत को काफ़ी धैर्य रखना होगा. वीना सीकरी कहती हैं, “मैं तो कहूँगी कि भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंध सकारात्मक हैं और हमारी विदेश नीति इनसे हर हाल में निपट सकती है." "दुनिया भर में सरकारें बदलती हैं लेकिन हमें ऐसी प्रतिक्रिया देनी है जो भारत की साख़ को सहेज सके. हमारी विदेश नीति को इन परिवर्तनों से दो चार होना होगा.” सुहासिनी हैदर कहती हैं कि भारत को ये अहसास होना चाहिए कि उसकी घेरलू नीतियां भी पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्रभावित करती हैं. उनका कहना है, “भारत को आस-पड़ोस में एक लीडर के तौर पर देखा जाता है- विचार और आकांक्षाओं का नेतृत्व करने वाला देश. इसलिए सीएए जैसी भारत की नीतियों का असर पड़ोसियों पर भी पड़ता है." "जब सीएए की घोषणा हुई थी तब बांग्लादेश में भी प्रदर्शन हुए थे. हालांकि शेख़ हसीना की सरकार ने सीएए को स्वीकार किया था लेकिन इससे भारत की छवि पर असर पड़ा था. क्योंकि बांग्लादेश के लोगों ने सीएए का विरोध किया." "सिर्फ़ सत्तारूढ़ लोगों के ही संपर्क में रहना काफ़ी नहीं है, इन देशों के आम लोगों का दिल भी जीतना होता है.”वे कहते हैं, “भारत ने नेपाल में ओली और बांग्लादेश में यूनुस के मामले में काफ़ी धैर्य का परिचय दिया है. उथल-पुथल वाले हालात में भी भारत ने संयम से काम लिया है. भारत को ये मालूम है कि पड़ोसियों के साथ उसके ख़राब रिश्ते उसे नुकसान पहुँचा सकते हैं क्योंकि ऐसी स्थिति में चीन को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिलता है. ”शेख़ हसीना के बांग्लादेश छोड़ने के बाद भारत के भारी-भरकम निवेश का क्या होगा?श्रीलंका: मोदी-अडानी विवाद में राजपक्षे के बाद अब अडानी ने दी सफाईप्लॉट आवंटन मामले में कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया और उनकी पत्नी पर एफ़आईआर दर्जआधे म्यांमार पर कब्ज़ा कर चुके हथियारबंद गठबंधन में कौन शामिल, चीन का क्या रोल?आधे म्यांमार पर कब्ज़ा कर चुके हथियारबंद गठबंधन में कौन शामिल, चीन का क्या रोल?सऊदी अरब की महिला जो सेक्स ग़ुलामी से भागकर ऑस्ट्रेलिया आईं और फिर हुईं लापता
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