जन्मकुंडली के नौवें घर को भाग्य स्थान और धर्म स्थान भी कहा जाता है। नवम भाव द्वारा भाग्य की समृद्धि का विचार किया जाता है। प्रभु कृपा प्राप्ति का भी स्थान जन्मकुण्डली के नौवें घर को माना गया है। धर्म और भाग्य का सीधा सम्बन्ध होने से भाग्य, धार्मिक व्यक्ति का हमेशा साथ देता...
जन्मकुंडली के नवम भाव से मुख्यतः भाग्य का विचार किया जाता है, व्यक्ति की जन्मकुण्डली में आयु के बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण नवम भाव को माना गया है, क्योंकि मनुष्य जन्म प्राप्त कर इस जीवन में भोगे जाने वाले सभी सुखों एवं दुखों की सूचना यही भाग्य का भाव देता है। ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार पिछले जन्म में किए गए कर्मों के फल पकने पर इस जन्म में उसी कर्मफल को भाग्य कहते हैं।भाग्य को प्रारब्ध कर्म भी कहा जाता है। नवम भाव का विस्तृत अध्ययन करने पर भाग्य कैसा है, भाग्योदय कब होगा, सुख-सम्पति भाग्य के बल से कब मिलेगी, पिता के साथ सम्बन्ध कैसा रहेगा, इत्यादि प्रश्नों को बड़ी सरलता के साथ जाना जा सकता है। नवम भाव के स्वामी को ज्योतिष की शब्दावली में नवमेश अथवा भाग्येश कहा जाता है। भाग्येश की शुभ एवं बलवान स्थिति व्यक्ति के भाग्य को मजबूत करती है। यदि कोई पाप ग्रह नीच राशि में स्थित या शत्रु राशि में स्थित अथवा अस्त होकर भाग्य भाव में बैठे, तो व्यक्ति के यश, धन और धर्म की हानि होती है। नवम भाव से कुछ विद्वान व्यक्ति के पिता के बारे में भविष्यवाणी करते हैं, वहीं कुछ विद्वानों के अनुसार माता का भाव चतुर्थ होने के कारण, उससे सप्तम, यानी दशम भाव को पिता का भाव मानते हैं। वैदिक ज्योतिष में नवम भाव को गुरु के साथ पिता का भाव भी मानते हैं। जहां अष्टम भाव विदेश यात्रा का है, वहीं नवम भाव अपने ही देश में लम्बी यात्रा का है। नवम भाव के स्वामी की दशा, अन्तर्दशा में यात्राओं का योग बनता है। नवम भाव की ज्योतिषीय गणना से स्पष्ट है कि प्रभु कृपा के पात्र धार्मिक व्यक्ति ही हुआ करते हैं। इस भाव का स्वामी बलवान होकर तथा शुभ ग्रह युक्त अथवा शुभ ग्रह दृष्ट होकर जिस शुभ भाव में स्थित हो जाता है, मनुष्य को अचानक दैवयोग से, प्रभु कृपा से उस घर द्वारा प्रदर्शित वस्तु की प्राप्ति होती है। जैसे नवम भाव का स्वामी बलवान होकर दशम कर्म स्थान में बैठ जाए तो जीवन में उच्च पद, प्रतिष्ठा व सम्मान प्राप्त होता है।.
जन्मकुंडली के नवम भाव से मुख्यतः भाग्य का विचार किया जाता है, व्यक्ति की जन्मकुण्डली में आयु के बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण नवम भाव को माना गया है, क्योंकि मनुष्य जन्म प्राप्त कर इस जीवन में भोगे जाने वाले सभी सुखों एवं दुखों की सूचना यही भाग्य का भाव देता है। ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार पिछले जन्म में किए गए कर्मों के फल पकने पर इस जन्म में उसी कर्मफल को भाग्य कहते हैं।भाग्य को प्रारब्ध कर्म भी कहा जाता है। नवम भाव का विस्तृत अध्ययन करने पर भाग्य कैसा है, भाग्योदय कब होगा, सुख-सम्पति भाग्य के बल से कब मिलेगी, पिता के साथ सम्बन्ध कैसा रहेगा, इत्यादि प्रश्नों को बड़ी सरलता के साथ जाना जा सकता है। नवम भाव के स्वामी को ज्योतिष की शब्दावली में नवमेश अथवा भाग्येश कहा जाता है। भाग्येश की शुभ एवं बलवान स्थिति व्यक्ति के भाग्य को मजबूत करती है। यदि कोई पाप ग्रह नीच राशि में स्थित या शत्रु राशि में स्थित अथवा अस्त होकर भाग्य भाव में बैठे, तो व्यक्ति के यश, धन और धर्म की हानि होती है। नवम भाव से कुछ विद्वान व्यक्ति के पिता के बारे में भविष्यवाणी करते हैं, वहीं कुछ विद्वानों के अनुसार माता का भाव चतुर्थ होने के कारण, उससे सप्तम, यानी दशम भाव को पिता का भाव मानते हैं। वैदिक ज्योतिष में नवम भाव को गुरु के साथ पिता का भाव भी मानते हैं। जहां अष्टम भाव विदेश यात्रा का है, वहीं नवम भाव अपने ही देश में लम्बी यात्रा का है। नवम भाव के स्वामी की दशा, अन्तर्दशा में यात्राओं का योग बनता है। नवम भाव की ज्योतिषीय गणना से स्पष्ट है कि प्रभु कृपा के पात्र धार्मिक व्यक्ति ही हुआ करते हैं। इस भाव का स्वामी बलवान होकर तथा शुभ ग्रह युक्त अथवा शुभ ग्रह दृष्ट होकर जिस शुभ भाव में स्थित हो जाता है, मनुष्य को अचानक दैवयोग से, प्रभु कृपा से उस घर द्वारा प्रदर्शित वस्तु की प्राप्ति होती है। जैसे नवम भाव का स्वामी बलवान होकर दशम कर्म स्थान में बैठ जाए तो जीवन में उच्च पद, प्रतिष्ठा व सम्मान प्राप्त होता है।
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