दिल्ली में भाजपा का 27 साल का वनवास समाप्त हो गया है। प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा ने राजधानी में वापसी की है। आम आदमी पार्टी (आप) का किला ढह गया है।
राजधानी दिल्ली में भाजपा का 27 साल का वनवास समाप्त हो चुका है। प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा ने राजधानी में वापसी की है। बीते 10 साल से दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी का किला ढह गया। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, सरकार में नंबर दो रहे पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन समेत कई मंत्री और पार्टी के दिग्गज नेताओं ने अपनी सीट गंवाई। वहीं सीएम आतिशी हारते-हारते जीतीं हैं। आखिरी राउंड में बनी बढ़त से वह भाजपा के रमेश बिधूड़ी से मामूली अंतर से जीतीं। ग्रेटर कैलाश से चुनाव लड़ रहे कैबिनेट मंत्री सौरभ भारद्वाज भी हार गए हैं। इस चुनाव में बीते 10 साल से दिल्ली की सत्ता पर आसीन आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा है। 2020 के चुनाव में जहां पार्टी के 62 विधायक थे अब उनकी संख्या घटकर 22 रह गई। वहीं आठ सीटों पर विपक्ष की भूमिका निभा रही भाजपा को दिल्ली की जनता का खूब आशीर्वाद मिला। भाजपा को इस चुनाव में 70 सीटों में से 48 सीटों पर जीत मिली हैं। दिल्ली में सरकार बनाने के लिए 36 सीटों की जरूरत होती है। ऐसे में भाजपा को बहुमत से अधिक 12 सीटें मिली। आइए जानते हैं भाजपा की जीत की रणनीति कैसे कारगर साबित हुई? लोकसभा नतीजों के बाद भाजपा ने पकड़ी जीत की रफ्तार लोकसभा चुनाव में अकेले स्पष्ट बहुमत न आने से राजनीतिक गलियारों में माना जाने लगा था कि भाजपा के विजयरथ में बाधाएं आएंगी। आप समेत विपक्षी दल इसे लेकर अति आत्मविश्वास में आ गए। वहीं, भाजपा ने जमीनी मेहनत से हरियाणा, महाराष्ट्र और अब दिल्ली में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। पीएम मोदी की लोकप्रियता को कम आंकने वालों को इन नतीजों से झटका लगा है। धारणाएं सुधारने में महारत, वेतन आयोग व आयकर छूट से लाभ केंद्र में सरकार और नगर निगमों पर नियंत्रण के बावजूद दिल्ली की सत्ता के लिए भाजपा का संघर्ष ऐतिहासिक रहा। भाजपा ने बनी धारणाएं सुधारने की महारत से आप को पटखनी दी। धार्मिक ध्रुवीकरण से दूरी बनाई, पूरा चुनाव केजरीवाल व आप के भ्रष्टाचार मुद्दे पर लड़ा। शराब व शीशमहल की काट आप को नहीं मिली। इसी दौरान, केंद्र ने 8वें वेतन आयोग की घोषणा की। बजट में मध्य वर्ग को आयकर छूट की घोषणा से भाजपा ने जीत की ओर दौड़ लगा दी। आम चुनाव के बाद कमजोर कांग्रेस कांग्रेस ने आम चुनाव में 99 सीटें जीत भाजपा को बहुमत से तो रोक दिया, पर उसके बाद लगातार नीचे जा रही है। हरियाणा, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर में उम्मीद से कम प्रदर्शन किया। अब दिल्ली में भी हार की हैट्रिक लगाई। मुस्लिमों का समर्थन ही पर्याप्त नहीं दिल्ली चुनाव में भाजपा ने हिंदुत्व पर अधिक जोर नहीं दिया, तो मुसलमानों को आकर्षित करने की भी कोशिश नहीं की। नतीजों से लगता है कि मुस्लिमों ने आप के नरम हिंदुत्व को नजरअंदाज किया और भाजपा को भी वोट दिया। लेकिन आप या किसी भी पार्टी के लिए दिल्ली में चुनाव जीतने के लिए सिर्फ मुसलमानों का समर्थन ही पर्याप्त नहीं है। आप का सत्ता विरोधी लहर को नजरअंदाज करना पड़ा भारी सत्ता विरोधी लहर के कारण 2024 चुनावों के लिए सुपर ईयर था। मतदाताओं के असंतोष के कारण ब्रिटेन से अमेरिका तक कई देशों में सत्तारूढ़ दलों का पतन हुआ है। लगातार दस साल में सत्ता पर काबिज आप इसे समझ नहीं सकी। उसे यमुना की सफाई, यूरोपियन स्टैंडर्ड की सड़कें और 24 घंटे साफ पानी जैसे वादे पूरे न करना भारी पड़ा। मतदान के ऐन मौके पर जहरीली यमुना का दांव भी उल्टा पड़ गया। संघ का समर्थन भाजपा का असली पावरबैंक, 5,000 से अधिक बैठकें आम चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद संघ-भाजपा के बीच समन्वय की कमी की बातें सामने आईं। लेकिन संघ ने हरियाणा व महाराष्ट्र में भाजपा का पूरा साथ देकर साबित कर दिया कि संघ असली पावरबैंक है। संघ कार्यकर्ताओं ने 5,000 से अधिक नुक्कड़ और ड्राइंग रूम बैठकें कीं। संघ पार्टी को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों के लिए अपने वादों को अनुकूलित करने वाले हाइपरलोकल अभियान लाने में मदद करता है। मोदी है तो मुमकिन है.
.का अचूक नुस्खा मोदी है तो मुमकिन है-का जादू फिर चला। पीएम का ताबड़तोड़ प्रचार जीत का प्रमुख कारण बना। मोदी का आप को आपदा बताना, शीशमहल पर निशाना साधने का मतदाताओं पर असर पड़ा। आप के कल्याणकारी कार्यक्रम जारी रखने का भरोसा दिया और महिलाओं व दलितों के लिए अलग घोषणाएं भी कीं। बिहार में भाजपा पर भारी नहीं पड़ेंगे नीतीश अब अगला विधानसभा चुनाव साल के अंत में बिहार में होना है। बजट में बिहार के लिए की गई घोषणाओं और दिल्ली की जीत को जोड़कर देखें, तो अब बिहार में भाजपा पर नीतीश कुमार के भारी पड़ने और रुख बदलने का असर नहीं होगा। मुफ्त रेवड़ियां जरूरी, पर जीत के लिए काफी नहीं नतीजों ने साबित कर दिया-मुफ्त रेवड़ियां चुनाव जीतने के लिए जरूरी हो सकती हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली, तीनों चुनावों में राज्य सरकारों के कल्याणकारी कार्यक्रमों पर बहुत अधिक ध्यान दिया गया। इन मुफ्त रेवड़ियों ने महाराष्ट्र और झारखंड सरकारों को सत्ता वापसी मदद की, लेकिन दिल्ली में यह विफल रहा। इससे पहले, बीआरएस और वाईएसआरसीपी भी मुफ्त रेवड़ियों पर दांव लगाने के बावजूद हार गई थी। विपक्षी गठबंधन में न कोई तालमेल, न साझा एजेंडा कांग्रेस के लगातार गिरते प्रदर्शन के साथ ही इस पर भी मुहर लग गई कि विपक्षी गठबंधन-इंडिया में न कोई तालमेल है, न नेता और न ही कोई साझा एजेंडा। आप और कांग्रेस एक-दूसरे पर निशाना साध रहे थे। गठबंधन में बिखराव इसके अस्तित्व पर सवाल उठा रहा है।
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