क्या कश्मीर में लोगों तक बाक़ी भारत की खब़रें पहुंच पा रही हैं?
मैं बिल्कुल ठीक हूं, घर में भी सब ठीक हैं. ठंड तो दिल्ली में भी है पर यहां का माहौल काफ़ी गर्म है. मैं नहीं जानती कि तुम्हें सीएए और एनआरसी के बारे में कितना पता है पर जिस तरीक़े से मैं इन दोनों चीज़ों को समझती हूं, वो तुम्हें बताती हूं.
तो सीएए में अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के जो रिफ़्यूजी भारत में हैं, उन्हें नागरिकता दी जाएगी. लेकिन सिर्फ़ हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख समुदाय के लोगों को. वहाँ के मुसलमानों को इसके ज़रिए नागरिकता नहीं मिलेगी. दूसरा, एनआरसी में नोटबंदी की तरह पब्लिक को लाइन में खड़ा कर दिया जाएगा क्योंकि हमें ये साबित करना होगा कि हम इस देश के नागरिक हैं और उसके लिए हमें अपने पूर्वजों के वोटर लिस्ट में होने के सबूत तक देने होंगे. मुझे लगता है कि ऐसे सबूत बहुत कम लोगों के पास ही हैं. उन्हें जुटाने के लिए जनता को फिर लाइन में लगना पड़ेगा. जिनको ये नहीं मिल पाएगी उनकी नागरिकता सस्पेंड कर दी जाएगी और उन्हें बैंक अकाउंट्स, सरकारी सब्सिडी, सरकारी नौकरियां नहीं मिल पाएंगी. मुझे लगता है ये काफ़ी ग़लत है. इसीलिए यहां विरोध प्रदर्शन चल रहा है.मैं अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाके में चल रहे विरोध प्रदर्शन में गई थी. शाहीन बाग़ में पिछले 26 दिनों से बहुत सारी औरतें इस ऐक्ट के विरोध में धरने पर बैठी हैं. ये औरतें यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर या ऐक्टिविस्ट्स नहीं, बिल्कुल घरेलू, पर्दे में रहने वाली औरतें हैं जो विरोध करने सड़कों पर उतर आई हैं. शाहीन बाग़ का प्रदर्शन और सुंदर तब हो जाता है जब वहां पांच साल के बच्चों से लेकर 80-90 साल की औरतें तक देखने को मिलती हैं. तुमने 'दबंग दादियों' के बारे में सुना है क्या? ये वो नब्बे साल की दादियां हैं जो वहां के प्रदर्शनकारियों की ढाल बनी हुई हैं. वो अपने बच्चों के लिए ये लड़ाई लड़ रही हैं ताकि वो आराम से अपनी ज़िंदगी जी सकें. दुआ, शाहीन बाग़ के लोगों का जोश देखकर मैं बस इतना कहूंगी कि लोग इस लड़ाई को लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. लड़ाई जो हम अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. शाहीन बाग़ का पूरा धरना औरतों का है. क्या कश्मीर में भी औरतों के नेतृत्व वाले ऐसे प्रदर्शन होते हैं? क्या शाहीन बाग़ का प्रदर्शन कश्मीर की औरतों को रास्ता दिखा पाएगा? पाँच जनवरी को जब मैं शाहीन बाग़ से घर लौटी तो इंटरनेट पर ख़बर आई कि जेएनयू के छात्रों पर कुछ नक़ाबपोश गुंडों ने यूनिवर्सिटी में घुसकर हमला किया. जेएनयू भारत की टॉप यूनिवर्सिटी में से एक है. यहां पर फ़ीस काफ़ी कम है जिसकी वजह से ग्रामीण इलाक़ों से आने वाले बच्चों को सस्ती शिक्षा मिल पाती है. एक महीने पहले यूनिवर्सिटी ने फ़ीस बढ़ा दी. जहां बच्चे बीस रुपए दिया करते थे, अब उनको डेढ़ सौ रुपए देने पड़ेंगे.पाँच जनवरी को जब वहां प्रदर्शन चल रहा था तो कुछ नक़ाबपोश गुंडों ने आकर हमला कर दिया जिसमें जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आइशी घोष पर जान लेवा हमला हुआ. उन्हें लोहे की रॉड से सिर पर मारा गया और बाद में उन्हीं पर एफ़आईआर कर दी गई क्योंकि यूनिवर्सिटी बस इस आंदोलन को ख़त्म करना चाहती है. जेएनयू की हिंसा के एक हफ़्ते बाद तक भी उन नक़ाबपोश गुंडों का कोई अता-पता नहीं है. मेरा मानना है कि हिंसा चाहे किसी ओर से भी हो, वो ग़लत है और हम ऐसी हिंसा बर्दाश्त नहीं करेंगे. तुमने अपने पिछले पत्र में लिखा था कि तुमने सुना है कि दिल्ली में ऐसे नारे लग रहे हैं कि,"चले थे कश्मीर को भारत बनाने, पूरे भारत को ही कश्मीर बना दिया". तुम्हारी बात 100 फ़ीसदी सही है. इस आंदोलन के दौरान पूरी दिल्ली, कश्मीर का अनुभव कर रही है. जैसे इंटरनेट, फ़ोन बंद होना, धारा 144 लगाया जाना, प्रदर्शन में पत्थरबाज़ी और लाठीचार्ज होना. इसलिए मैं यह कह सकती हूं की आज मैं कश्मीर और कश्मीर में रहने वाले लोगों के हालात बहुत अच्छे से समझ रही हूं. अंत में यही कहूंगी कि किसी शायर ने कहा है,"किसके रोके रुका है सवेरा, रात भर का है मेहमान अंधेरा", और इन अंधेरों के बीच छात्र और नौजवानों का आंदोलित होना सु-प्रभात का संकेत है.दोनों के बीच दो साल पहले लिखे ख़त पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में बड़ी हो रही 17 साल की दुआ भट और दिल्ली की 18 साल की सौम्या सागरिका ने एक-दूसरे की अलग ज़िंदगियों को समझने के लिए चिट्ठियों के ज़रिए दोस्ती की.फिर पिछले साल अगस्त में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के साथ-साथ वहां कई सारी बंदिशें लागू कर दी गईं. संपर्क करना मुहाल हो गया. पांच महीने बाद जब इनमें कुछ ढील दी गई ख़तों का सिलसिला फिर शुरू हुआ. दोनों के बीच दिसंबर से फ़रवरी के दौरान लिखे गए छह ख़तों में से यह तीसरा ख़त है. इस चिट्ठी में लिखी बातें सौम्या की अपनी राय और समझ हैं जिनमें बीबीसी ने कोई फ़ेरबदल नहीं किया है.
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