डीयू ने एससी, एसटी, पीडब्ल्यूबीडी और महिलाओं को आवेदन शुल्क में दी जा रही छूट ख़त्म की

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दिल्ली विश्वविद्यालय ने सहायक प्रोफेसर के पदों के लिए आवेदन करने वाले अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति , विकलांगता से ग्रसित व्यक्ति और महिला उम्मीदवारों को आवेदन शुल्क में छूट देने की नीति वापस ले ली है.

की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस नीति परिवर्तन की शिक्षा जगत के कुछ हिस्सों में कड़ी आलोचना हो रही है. कई मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षकों और शिक्षाविदों ने इस फैसले को ‘अनुचित’ बताया है. 10 जून को दौलत राम कॉलेज द्वारा जारी एक सर्कुलर के मुताबिक, अब अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क 2,000 रुपये कर दिया गया है, जो पहले 500 रुपये था — यानी चार गुना बढ़ोतरी. अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के उम्मीदवारों के लिए भी शुल्क 500 रुपये से बढ़ाकर 1,500 रुपये कर दिया गया है. वहीं, एससी/एसटी उम्मीदवारों को अब 1,000 रुपये देना होगा, जबकि पहले इन्हें कोई शुल्क नहीं देना पड़ता था. पीडब्लूबीडी उम्मीदवारों के लिए शुल्क 500 पीडब्लूबीडी तय किया गया है. शिक्षकों ने दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ और विश्वविद्यालय की शैक्षणिक तथा कार्यकारी परिषद के सदस्यों से इस फैसले में हस्तक्षेप करने और इसे वापस लेने की मांग की है. उनका कहना है कि यह बढ़ोतरी भेदभावपूर्ण है और इससे हाशिये पर मौजूद समुदायों से आने वाले उम्मीदवारों के आवेदन करने की संभावना प्रभावित हो सकती है. सर्कुलर में यह भी साफ़ किया गया है कि गलत शुल्क के साथ भेजे गए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे और किसी भी परिस्थिति में शुल्क वापस नहीं किया जाएगा. आवेदकों को ऑनलाइन फॉर्म भरना होगा और सभी ज़रूरी दस्तावेज़ तथा भुगतान डिजिटल माध्यम से करना होगा. जहां डीयू विभाग फैकल्टी भर्ती के विज्ञापन केंद्रीय रूप से जारी करते हैं, वहीं दौलत राम जैसे कुछ कॉलेजों को विश्वविद्यालय के नियमों का पालन करते हुए अपने स्वयं के नोटिस जारी करने की अनुमति होती है. विश्वविद्यालय की ओर से इस आलोचना पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है.पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय ने स्नातक में प्रवेश के लिए फॉर्म निकाला, जिसमें ‘मुस्लिम’ को मातृभाषा के रूप में सूचीबद्ध किया गया, जो कि एक गलत वर्गीकरण है. इस ग़लती को लेकर लोगों में नाराज़गी इसलिए भी और बढ़ गई क्योंकि फॉर्म में उर्दू को शामिल नहीं गया था, जबकि यह संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल एक मान्यता प्राप्त भाषा है. विशेषज्ञों के अनुसार यह भाषा और धर्म को आपस में गलत ढंग से जोड़ने वाली, भ्रामक और असंवैधानिक गलती है., ‘यह सिर्फ एक क्लेरिकल गलती नहीं है. यह एक गहरी सांप्रदायिक मानसिकता को दर्शाता है, जो एक पूरे समुदाय को केवल धार्मिक पहचान में समेट देता है और उसकी भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचान को नज़रअंदाज़ कर देता है. मुस्लिम कोई भाषा नहीं है. मुसलमान भी वही भाषाएं बोलते हैं जो उनके क्षेत्र के अन्य लोग बोलते हैं — जैसे हिंदी, पंजाबी, बंगाली, मलयालम, तमिल या उर्दू.’, ‘यह दुखद है कि दिल्ली विश्वविद्यालय जैसा एक प्रतिष्ठित संस्थान ऐसी गलतियां कर रहा है. इन्हें तुरंत सुधारा जाना चाहिए. हमें विविधताओं और बहुभाषिकता को स्वीकार करना और सम्मान देना चाहिए.’बल्कि फॉर्म में कथित तौर पर ‘बिहारी’, ‘च*****’, ‘मज़दूर’, ‘देहाती’, ‘मोची’, और ‘कुर्मी’ जैसे शब्दों को भी भाषा के कॉलम में डाला गया था — जबकि ये या तो जातिसूचक या क्षेत्रीय पहचान हैं, न कि भाषाएं. कुछ समय बाद जब सोशल मीडिया पर फॉर्म का स्क्रीनशॉट वायरल हुआ, और छात्रों व शिक्षकों ने तुरंत सुधार और माफी की मांग की, तब विश्वविद्यालय की तरफ से सफाई आई. विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा है कि ‘मातृभाषा’ वाले खंड में कुछ गलत प्रविष्टियां ‘क्लेरिकल मिस्टेक’ के चलते शामिल हो गईं.ने बताया कि यह गलती तुरंत सुधारी गई और भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए कदम उठाए जाएंगे.लिखा है, ‘कोई शर्म नहीं, कोई माफ़ी नहीं! क्या आप दिल्ली विश्वविद्यालय जैसी यूनिवर्सिटी में ऐसी ‘लापरवाही’ सहन कर सकते हैं? लेकिन आजकल ‘शर्म’ तो जैसे बीते ज़माने की बात हो गई है.’बंद हो गया भारत का सबसे महंगा साहित्यिक पुरस्कार ‘जेसीबी प्राइज़ फॉर लिटरेचर’जम्मू-कश्मीर: पुलिस ने पहलगाम में एक हिरासत के लिए फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल की पुष्टि की

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