Burning Bus News Update: जोधपुर-जयसलमेर हाईवे पर हुई स्लीपर बस आग के बाद परिवहन विभाग ने जांच तेज की। 66 बस चेसिस और बॉडी जब्त, अधिकारियों को सस्पेंड किया गया। पढ़ें 13 दिन पुरानी बस की नई कहानी
जोधपुर: 14 अक्टूबर मंगलवार दोपहर साढ़े तीन बजे जोधपुर जैसलमेर हाईवे पर जिस स्लीपर में आग लगी थी। इस बस का महज 13 दिन पहले ही चित्तोड़गढ़ में रजिस्ट्रेशन हुआ था। परिवहन विभाग के अधिकारियों ने बस की मॉडिफाइड बॉडी को अप्रूव करते हुए रजिस्ट्रेशन किया था। ऐसे में सरकार ने बस की बॉडी अप्रूव करने वाले चित्तौड़गढ़ के कार्यवाहक डीटीओ सुरेंद्र सिंह और सहायक प्रशासनिक अधिकारी चुन्नी लाल को सस्पेंड कर दिया। जांच के दौरान पता चला कि बस को जोधपुर के कारखाने में मॉडिफाई किया गया। ऐसे में परिवहन विभाग की टीम ने जोधपुर के कारखाने में दबिश दी।जोधपुर-जयसलमेर हाईवे पर बस हादसे में सवाल उठे हैं क्योंकि बस नई थी। जिला परिवहन अधिकारी नीरज शाह के अनुसार, बस 21 मई को बनी थी और तीन महीने में इसकी बॉडी तैयार हुई। 1 अक्टूबर को पंजीयन हुआ और 14 अक्टूबर को ही यह हादसे का शिकार हुई।66 बस चेसिस और बॉडी जब्तजोधपुर से जैसलमेर जाने वाली जिस चलती स्लीपर बस में आग लगी थी। उस बस के स्ट्रेक्चर में कई तरह की खामियां थी। मॉडिफाई करने की वजह से बस से बाहर निकलने के रास्ते ही नहीं बचे थे। संकरी गली बना दी गई। ना इमरजेंसी गेट था और ना ही वायरिंग सही थी। इन कमियों के बावजूद चित्तौड़गढ़ के परिवहन अधिकारियों ने स्लीपर बस बॉडी को अप्रूव करते हुए रजिस्ट्रेशन कर दिया। जिस कारखाने में इस बस को मोडिफाई किया गया। उस कारखाने में परिवहन विभाग के अधिकारियों ने दबिश दी। उस वर्कशॉप से 66 गाड़ियों की चेसिस और बॉडी जब्त की गई। साथ ही कारखाना संचालक को निर्देश दिए गए हैं कि अग्रिम आदेश तक किसी भी बस बॉडी और चेसिस में कोई बदलाव नहीं किया जाए।सस्ते के चक्कर में निजी कारखानों में तैयार होती बॉडीकिसी भी कंपनी की बस की खरीद पर पहले केवल चेसिस खरीदी जाती है। चेसिस खरीदने के बाद बस मालिक किसी प्रतिष्ठित कंपनी से बॉडी बनाने के बजाय स्थानीय कारखानों में बॉडी बनवाते हैं। ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि कंपनियों में बॉडी बनाने में खर्चा ज्यादा आता है जबकि स्थानीय कारखानों में सस्ते दामों में चेसिस पर नई बॉडी बना दी जाती है। सस्ते के चक्कर में बस मालिक निर्धारित मापदंडों को ध्यान में रखने के बजाय अपना मुनाफा देखते हैं और ज्यादा से ज्यादा सवारियों के बैठने की व्यवस्था करते हैं। परिवहन विभाग के अधिकारी भी मिलीभगत करके बस की बॉडी को अप्रूव कर देते हैं। जैसलमेर में हादसे की शिकार हुई बस में भी यही लापरवाही सामने आई थी। कई ऑपरेटर नॉन एसी बस को एसी में बदलवा लेते हैं।स्लीपर में होने चाहिए 4 एग्जिट गेटपरिवहन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक स्लीपर बसों में चार एग्जिट गेट होने अनिवार्य है लेकिन ज्यादातर बसों में केवल एक ही एग्जिट गेट बनाया जाता है। पीछे की तरफ बनाए गए इमरजेंसी गेट के स्थान पर भी सीट लगा दी जाती है ताकि ज्यादा यात्रियों को सफर कराया जा सके। हालांकि जैसलमेर में हुए हादसे के बाद परिवहन विभाग ने अभियान चलाया है। जयपुर सहित कई जिलों में स्लीपर बसों की जांच की जा रही है। नियम विरुद्ध संचालन या गलत स्ट्रक्चर से बनी बसों को सीज किया जा रहा है।.
जोधपुर: 14 अक्टूबर मंगलवार दोपहर साढ़े तीन बजे जोधपुर जैसलमेर हाईवे पर जिस स्लीपर में आग लगी थी। इस बस का महज 13 दिन पहले ही चित्तोड़गढ़ में रजिस्ट्रेशन हुआ था। परिवहन विभाग के अधिकारियों ने बस की मॉडिफाइड बॉडी को अप्रूव करते हुए रजिस्ट्रेशन किया था। ऐसे में सरकार ने बस की बॉडी अप्रूव करने वाले चित्तौड़गढ़ के कार्यवाहक डीटीओ सुरेंद्र सिंह और सहायक प्रशासनिक अधिकारी चुन्नी लाल को सस्पेंड कर दिया। जांच के दौरान पता चला कि बस को जोधपुर के कारखाने में मॉडिफाई किया गया। ऐसे में परिवहन विभाग की टीम ने जोधपुर के कारखाने में दबिश दी।जोधपुर-जयसलमेर हाईवे पर बस हादसे में सवाल उठे हैं क्योंकि बस नई थी। जिला परिवहन अधिकारी नीरज शाह के अनुसार, बस 21 मई को बनी थी और तीन महीने में इसकी बॉडी तैयार हुई। 1 अक्टूबर को पंजीयन हुआ और 14 अक्टूबर को ही यह हादसे का शिकार हुई।66 बस चेसिस और बॉडी जब्तजोधपुर से जैसलमेर जाने वाली जिस चलती स्लीपर बस में आग लगी थी। उस बस के स्ट्रेक्चर में कई तरह की खामियां थी। मॉडिफाई करने की वजह से बस से बाहर निकलने के रास्ते ही नहीं बचे थे। संकरी गली बना दी गई। ना इमरजेंसी गेट था और ना ही वायरिंग सही थी। इन कमियों के बावजूद चित्तौड़गढ़ के परिवहन अधिकारियों ने स्लीपर बस बॉडी को अप्रूव करते हुए रजिस्ट्रेशन कर दिया। जिस कारखाने में इस बस को मोडिफाई किया गया। उस कारखाने में परिवहन विभाग के अधिकारियों ने दबिश दी। उस वर्कशॉप से 66 गाड़ियों की चेसिस और बॉडी जब्त की गई। साथ ही कारखाना संचालक को निर्देश दिए गए हैं कि अग्रिम आदेश तक किसी भी बस बॉडी और चेसिस में कोई बदलाव नहीं किया जाए।सस्ते के चक्कर में निजी कारखानों में तैयार होती बॉडीकिसी भी कंपनी की बस की खरीद पर पहले केवल चेसिस खरीदी जाती है। चेसिस खरीदने के बाद बस मालिक किसी प्रतिष्ठित कंपनी से बॉडी बनाने के बजाय स्थानीय कारखानों में बॉडी बनवाते हैं। ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि कंपनियों में बॉडी बनाने में खर्चा ज्यादा आता है जबकि स्थानीय कारखानों में सस्ते दामों में चेसिस पर नई बॉडी बना दी जाती है। सस्ते के चक्कर में बस मालिक निर्धारित मापदंडों को ध्यान में रखने के बजाय अपना मुनाफा देखते हैं और ज्यादा से ज्यादा सवारियों के बैठने की व्यवस्था करते हैं। परिवहन विभाग के अधिकारी भी मिलीभगत करके बस की बॉडी को अप्रूव कर देते हैं। जैसलमेर में हादसे की शिकार हुई बस में भी यही लापरवाही सामने आई थी। कई ऑपरेटर नॉन एसी बस को एसी में बदलवा लेते हैं।स्लीपर में होने चाहिए 4 एग्जिट गेटपरिवहन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक स्लीपर बसों में चार एग्जिट गेट होने अनिवार्य है लेकिन ज्यादातर बसों में केवल एक ही एग्जिट गेट बनाया जाता है। पीछे की तरफ बनाए गए इमरजेंसी गेट के स्थान पर भी सीट लगा दी जाती है ताकि ज्यादा यात्रियों को सफर कराया जा सके। हालांकि जैसलमेर में हुए हादसे के बाद परिवहन विभाग ने अभियान चलाया है। जयपुर सहित कई जिलों में स्लीपर बसों की जांच की जा रही है। नियम विरुद्ध संचालन या गलत स्ट्रक्चर से बनी बसों को सीज किया जा रहा है।
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