Japan Rice Crisis: जापान में चावल की कीमत हो गई डबल, समझिए यह मुद्दा कैसे प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा की सरकार के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गया है.
Japan Rice Crisis: जापान में आजकल चावल का संकट चल रहा है. शुक्रवार, 23 मई को जारी महंगाई के आंकड़ों से पता चला कि पिछले महीने चावल की कीमतें एक साल पहले की तुलना में 98 प्रतिशत अधिक थीं. यानी लगभग दो गुना.
खास बात यह है कि चावल के चक्कर में ही जापान के कृषि मंत्री की कुर्सी तक चली गई है. चलिए समझिए कि चावल की कीमत में तेज वृद्धि के पीछे कौन-कौन से फैक्टर हैं और यह कैसे प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा की सरकार के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गया है.फैक्टर नंबर 1- चावल की कमीविशेषज्ञों का कहना है कि चावल की कीमतों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण इसकी सप्लाई कमी है. चावल जापान का ऐसा स्टेपल फूड है जो सदियों से जापानी संस्कृति में गहराई से समाया हुआ है.{ai=d.createElement;ai.defer=true;ai.async=true;ai.src=v.location.protocol+o;d.head.appendChild;});टोक्यो के एक सुपरमार्केट में बिक्री के लिए रखे चावल के बैगचावल की किल्लत के पीछे के कारकों में 2023 में रिकॉर्ड भीषण गर्मी शामिल है, जिससे फसल प्रभावित हुई. दूसरी तरफ 2024 में मांग में वृद्धि हुई, कुछ हद तक बड़े पैमाने पर भूकंप की चेतावनी के बाद लोगों ने घबराहट में खरीदारी की. भले उस स्तर का भूकंप नहीं आया लेकिन बड़े स्तर पर खरीदारी की वजह से खुले बाजार में चावल की किल्लत जरूर होने लगी.इसकी एक वजह जापान में बाहर से आ रहे पर्यटकों के शौक को भी बताया जा रहा है. माना जा रहा है कि इन पर्यटकों के बीच सुशी और चावल का उपयोग करने वाले दूसरे डिश का क्रेच अभूतपूर्व ढ़ंग से बढ़ा है. इसके साथ ही कुछ वितरकों द्वारा चावल की जमाखोरी का भी आरोप लगाया गया है.फैक्टर नंबर 2- कम होती खेतीसालों से जापान में चावल की खपत में गिरावट देखी गई थी. तो वहां की सरकार ने ऐसी नीति बनाई कि चावल की जगह अन्य फसलों को उगाने पर जोर रहे. साथ ही, जापान की बढ़ती आबादी के अनुरूप, कई चावल किसान बूढ़े हो गए हैं और उनके बच्चे खेती का यह काम संभालना नहीं चाहते हैं.कृषि मंत्रालय के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत व्यक्तिगत फार्म 60 से अधिक उम्र के किसानों द्वारा चलाए जाते हैं, और 70 प्रतिशत के पास कोई उत्तराधिकारी नहीं है. चावल के खेतों के लिए उपयोग की जाने वाली भूमि की मात्रा 2024 में घटकर 2.3 मिलियन हेक्टेयर रह गई, जो 1961 में 3.4 मिलियन हेक्टेयर के उच्चतम स्तर से बहुत कम है.90 साल से अधिक पुराने टोक्यो चावल खुदरा विक्रेता के तीसरी पीढ़ी के मास्टर टाडाओ कोइके ने कहा, "जापानी अधिकारियों ने लंबे समय से इस बात पर ध्यान केंद्रित किया है कि बाजार नियंत्रण के नाम पर चावल उत्पादन के पैमाने को कैसे कम किया जाए, और उन्होंने इस पर ध्यान केंद्रित नहीं किया है कि चावल की खपत कैसे बढ़ाई जाए."कोइके ने एएफपी को बताया, "अब हम सभी पेबैक से निपट रहे हैं."फैक्टर नंबर 3- स्टॉक में कमीसरकार ने फरवरी में अपने कुछ आपातकालीन भंडार की नीलामी शुरू की. पहले आपदाओं के दौरान इनका उपयोग किया जाता था लेकिन अब चावल की सप्लाई के कम होने की वजह से इसका इस्तेमाल किया जा रहा है. 1995 में स्टोर बनने के बाद यह पहली बार है कि रिजर्व के चावल को बेचने के पीछे की वजह सप्लाई चेन की समस्याएं हैं.लेकिन लेटेस्ट डेटा से पता चलता है, इस कदम का अब तक बहुत कम प्रभाव पड़ा है. उत्सुनोमिया यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर मासायुकी ओगावा ने कहा कि ऐसा इसलिए है क्योंकि रिजर्व में "मिश्रित चावल" होते है, न कि किसी विशेष क्षेत्र या किस्म के अधिक लोकप्रिय ब्रांडेड अनाज.ओगावा ने एएफपी को बताया, "औसत कीमतों के संदर्भ में, ब्रांड-नेम वाले चावल की कीमत इतनी बढ़ गई है कि रिजर्व वाले चावल के आने से भी औसत मूल्य में बहुत कमी नहीं आई है. रिजर्व चावल जारी होने पर भी सुपरमार्केट में खुदरा कीमतों में गिरावट आना मुश्किल हो गया है."फैक्टर नंबर 4- राजनीतिक संकटसालों की स्थिरता या गिरती कीमतों के बाद जापान की जनता को महंगाई की डायन सता रही है और वह सरकार के लिए जनता के समर्थन को प्रभावित कर रही है. जापान में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने दशकों तक लगभग बिना रुके शासन किया है, लेकिन उसने पिछले साल अपना बहुमत खो दिया और उसे गठबंधन बनाना पड़ा.जापान के कृषि मंत्री ताकू ईटो को इस्तीफा देना पड़ाइतना ही नहीं पिछले विकेंड में जापान के कृषि मंत्री ताकू ईटो ने एक ऐसा बयान दे दिया कि जनता भड़क गई और उन्हें अपने पद से इस्तीफा तक देना पड़ा. ताकू ईटो ने एक कार्यक्रम में कहा कि उन्होंने "खुद से कभी चावल नहीं खरीदा क्योंकि मेरे समर्थक मुझे इतना दान देते हैं".बवाल के बीच ईटो को इस्तीफा देना पड़ा लेकिन सिर्फ इतना भर से प्रधान मंत्री शिगेरु इशिबा की परेशानी खत्म होती नहीं दिख रही है. इस मामले ने मतदाताओं के बीच यह भावना पैदा कर दी होगी कि एलडीपी जनता से कट चुकी है. राहत की बात यह है कि कैपिटल इकोनॉमिक्स में मार्सेल थिएलियंट ने कहा है कि साप्ताहिक चावल की कीमतें स्थिर होने के संकेत दिखा रही हैं, इसलिए चावल की महंगाई जल्द ही फिर से नरम होनी शुरू होनी चाहिए.यह भी पढ़ें: अच्छी नींद के लिए मुंह पर टेप लगाकर सोने का चल रहा ट्रेंड- समझिए यह क्यों खतरनाक है
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