जाने-अनजाने में शेख हसीना ने खुद ही ल‍िख डाली बांग्‍लादेश वापसी की कहानी, क्‍या 2013 का वह एग्रीमेंट जो बन ...

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जाने-अनजाने में शेख हसीना ने खुद ही ल‍िख डाली बांग्‍लादेश वापसी की कहानी, क्‍या 2013 का वह एग्रीमेंट जो बन ...
क्‍या शेख हसीना का प्रत्‍यर्पणभारत-बांग्‍लादेश प्रत्‍यर्पण संध‍िबांग्‍लादेश खबर
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Sheikh Hasina Extradition News:बांग्लादेश शेख हसीना के प्रत्यर्पण का अनुरोध करने के लिए 2013 की संधि का सहारा ले सकता है.

नई द‍िल्‍ली. जब से बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को अपने देश में बड़े पैमाने पर विरोध का सामना करना पड़ा तो उनको इस्‍तीफा देते ही अपना देश छोड़ द‍िया. उन्‍होंने कई जगह शरण मांगी पर जब कहीं से मदद नहीं म‍िली तो उन्‍होंने हेलीकॉप्‍टर से भारत में लैंड क‍िया और तब से भारत में क‍िसी सुरक्ष‍ित स्‍थान रह रही हैं.

वहीं अब बांग्‍लादेश में उनके प्रत्यर्पण की मांग जोर पकड़ रही हैं. पर उनका प्रत्‍यर्पण हो सकता है या नहीं. इसको लेकर समझे सारा गण‍ित… शेख हसीना को बांग्‍लादेश प्रत्‍यार्प‍ित करने की मांग ने तब ठोस कानूनी रूप ले लिया. जब बांग्लादेश के अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण के मुख्य अभियोजक ने बताया क‍ि शेख हसीना को वापस लाने की कानूनी प्रक्र‍िया शुरू हो गई है. आपको बता दें क‍ि आईसीटी की स्‍थापना शेख हसीना सरकार ने फ‍िर से 2010 में की थी. हसीना के खिलाफ नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध करने के लिए ICT के तहत शिकायतें दर्ज की गई हैं. हसीना पर हत्या और यातना से लेकर लोगों को जबरन गायब करने तक के कई अन्य अपराधों के भी केस दर्ज किए गए हैं. बांग्‍लादेश के साथ क्‍या है प्रत्‍यर्पण कानून? इस संबंध में, यदि बांग्लादेश भारत से हसीना के प्रत्यर्पण के लिए औपचारिक अनुरोध करता है, तो नई दिल्ली के पास क्या कानूनी विकल्प हैं? भारत के 1962 के प्रत्यर्पण अधिनियम के अलावा, मौजूदा मुख्य कानून में भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि है, जिस पर शेख हसीना सरकार ने साल 2013 में खुद हस्ताक्षर किए थे. 1962 के प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 12 भारत के प्रत्यर्पण कानून बांग्लादेश के साथ है. क्‍या है 2013 की संध‍ि में? बांग्लादेश हसीना के प्रत्यर्पण का अनुरोध करने के लिए 2013 की संधि का सहारा ले सकता है. संधि का अनुच्छेद 1 बांग्लादेश और भारत को न केवल अपने क्षेत्रों में उन व्यक्तियों को प्रत्यर्पित करने के लिए बाध्य करता है, जो दूसरे देश के क्षेत्रों में प्रत्यर्पण योग्य अपराध करने का दोषी पाए गए हैं. बल्कि यह उन व्यक्तियों पर भी लागू होता है, जिन पर अपराध करने का आरोप लगाया गया है. इस प्रकार, हसीना को तब भी प्रत्यर्पित किया जा सकता है, जब उन्हें बांग्लादेशी अदालतों में दोषी साबित होना बाकी हो. उन पर इन अपराधों का आरोप लगाना भारत से उनके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को शुरू करने के लिए पर्याप्त है. साल 2016 की संधि को समाप्‍त कर द‍िया गया इसके अलावा, भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि के अनुच्छेद 10 के तहत, प्रत्यर्पण की मांग करने के लिए अनुरोध करने वाले राज्य को स‍िर्फ आरोपी के ख‍िलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट पेश करना पर्याप्त है. इस अनुरोध में उस देश को आरोपी के ख‍िलाफ साक्ष्य साझा करने की कोई आवश्यकता नहीं है. यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि साल 2016 संधि में किए गए संशोधन के कारण है. मूल संधि के तहत अनुरोध करने वाले देश को भारत के साथ गिरफ्तारी वारंट के साथ साक्ष्य साझा करने की आवश्यकता थी. आरोपी के प्रत्यर्पण में तेजी लाने के लिए अपराध के साक्ष्य साझा करने की आवश्यकता को 2016 में समाप्त कर दिया गया था. क्‍या भारत हसीना को प्रत्‍यार्प‍ित कर सकता है? इस प्रकार, यदि बांग्लादेश ऐसा अनुरोध करता है तो भारत शेख हसीना को प्रत्यर्पित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है. हालांकि, भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि में किसी व्यक्ति को प्रत्यर्पित करने के लिए कुछ अपवादों का उल्लेख किया गया है. सबसे पहले, अनुच्छेद 6 में प्रावधान है कि यदि अपराध राजनीतिक प्रकृति का है तो प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है. 1962 के प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 31 में भी इस राजनीतिक अपवाद का प्रावधान है. तो, क्या भारत हसीना के प्रत्यर्पण को अस्वीकार करने के लिए इन प्रावधानों पर भरोसा कर सकता है? इसका उत्तर है नहीं, क्योंकि संधि के अनुच्छेद 6 में विशेष रूप से हत्या और अन्य अपराधों जैसे नरसंहार और मानवता के विरुद्ध अपराधों को राजनीतिक अपराधों से बाहर रखा गया है, जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय कानून मान्यता देता है. दूसरा, अनुच्छेद 7 अनुरोधित राज्य को प्रत्यर्पण अनुरोध को अस्वीकार करने की अनुमति देता है, यदि उस व्यक्ति पर प्रत्यर्पण अपराध के लिए उसकी अदालतों में मुकदमा चलाया जाएगा. यह प्रावधान भी हसीना पर लागू नहीं होगा, क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह दर्शाता हो कि उसे भारतीय अदालतों में मुकदमे का सामना करना पड़ेगा. तीसरा, संधि के अनुच्छेद 8 में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता है, यदि वह अनुरोध करने वाले देश को संतुष्ट करता है कि सभी परिस्थितियों को देखते हुए, उसे प्रत्यर्पित करना अन्यायपूर्ण या दमनकारी होगा, क्योंकि उसके खिलाफ आरोप न्याय के हित में सद्भावनापूर्वक नहीं लगाया गया है. यही सिद्धांत 1962 के प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 29 में भी साब‍ित होता है. यह प्रावधान हसीना के मामले में भी लागू हो सकता है, जिन परिस्थितियों में उन्हें सत्ता से बेदखल किया गया और इस तथ्य को देखते हुए कि उनके राजनीतिक विरोधी बांग्लादेश में मामले चला रहे हैं और उनके खून के प्यासे हैं, यह तर्क दिया जा सकता है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप प्रतिशोध और राजनीतिक दुश्मनी से प्रेरित हैं. अगर उन्हें बांग्लादेश वापस भेजा जाता है, तो यकीनन उनके साथ निष्पक्ष सुनवाई न होने का बहुत जोखिम है. इस प्रकार, उनका प्रत्यर्पण दमनकारी और अन्यायपूर्ण होगा. यह व्याख्या बांग्लादेशी पक्ष को स्वीकार्य नहीं हो सकती है, जो दावा करेगा कि हसीना को उनके निरंकुश शासन के लिए जवाबदेह ठहराना न्याय के हित में है. भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि किसी बाध्यकारी न्यायिक तंत्र का प्रावधान नहीं करती है. इस प्रकार, दोनों पक्ष अनुच्छेद 8 की अपनी कानूनी व्याख्याओं पर अड़े रह सकते हैं, बिना किसी विवाद निपटान निकाय के यह तय किए कि किसकी व्याख्या सही है. भारत के पास क्‍या व‍िकल्‍प भारत के पास एक और कानूनी विकल्प है, जो एक अंत‍िम विकल्प होगा. संधि का अनुच्छेद 21 भारत को किसी भी समय नोटिस देकर इस संधि को समाप्त करने का अधिकार देता है. नोटिस की तिथि के छह महीने बाद संधि प्रभावी नहीं होगी. संधि में ऐसा कुछ भी नहीं है जो कहता हो कि समाप्ति से पहले प्राप्त प्रत्यर्पण अनुरोधों को संधि समाप्त होने के बाद अनुरोध करने वाले देश द्वारा संसाधित किया जाना होगा. भारत इस विकल्प का प्रयोग करेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत हसीना को कितना महत्व देता है, जो नई दिल्ली की मित्र रही हैं. जबकि नई दिल्ली हसीना के साथ खड़ा होना चाहेगी, संधि को एकतरफा समाप्त करने से ढाका के साथ उसके संबंध खराब हो सकते हैं, जिसे भारत कई तरह के रणनीतिक और कूटनीतिक संबंधों के लिए बर्दाश्त नहीं कर सकता. आखिरकार, हसीना के प्रत्यर्पण का निर्णय राजनीति से जुड़ा है, कानून से नहीं लेकिन भारत जो भी निर्णय ले, उसे अपनी राजनीतिक जरूरतों को पूरा करने और अपने निर्णय को उचित ठहराने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून की भाषा का कुशलतापूर्वक उपयोग करना चाहिए.

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