जानिए, 'मदर्स डे' पर इन पुलिस ऑफ़िसर मांओं से कैसे बनाते हैं काम और परिवार में संतुलन...– News18 हिंदी

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पिछले कुछ सालों में समाज तेज़ी से बदला है और बदली है मां भी.

जानिए, 'मदर्स डे' पर इन पुलिस ऑफ़िसर मांओं से कैसे बनाते हैं काम और परिवार में संतुलन.May 12, 2019, 3:01 PM ISTMay 12, 2019, 3:01 PM IST पिछले कुछ सालों में समाज तेज़ी से बदला है और बदली है मां भी. आज की वर्किंग वूमन की दुनिया भी अलग है और चुनौतियां भी.

जानिए, 'मदर्स डे' पर इन पुलिस ऑफ़िसर मांओं से कैसे बनाते हैं काम और परिवार में संतुलन...May 12, 2019, 3:01 PM ISTMay 12, 2019, 3:01 PM IST पिछले कुछ सालों में समाज तेज़ी से बदला है और बदली है मां भी. आज की वर्किंग वूमन की दुनिया भी अलग है और चुनौतियां भी. हालांकि काम और परिवार में संतुलन बनाने की चुनौती सबके लिए है. लेकिन महिलाओं और ख़ासकर मां के लिए यह ज़्यादा बड़ी है. महिलाओं के लिए सबसे मुश्किल कामों में से एक पुलिस की नौकरी करने वाली महिला अफ़सर यह संतुलन कैसे बनाती हैं, बच्चों को कैसे संभालती हैं, कैसे समझाती हैं? यह समझने के लिए हमने बात की उत्तराखंड की चार पुलिस ऑफ़िसर्स से. आप भी पढ़िए उनकी कहानी, उनकी ही ज़ुबानी और खुद ही अंदाज़ा लगाइए कि यह कितना मुश्किल है....निवेदिता कुकरेती करीब दो साल से राजधानी की पुलिस व्यवस्था की ज़िम्मेदारी संभाल रही हैं. उनके परिवार में पति नवीन कुमार और सात साल का बेटा है. नवीन बिज़नेसमैन हैं और निवेदिता के देहरादून का एसएसपी बनने के बाद से साथ ही रहते हैं ताकि बेटे के मां या पापा कोई न कोई मौजूद रहे. लेकिन राजधानी का एसएसपी होने की वजह से मां को तो कुछ कीमत चुकानी ही पड़ती है. निवेदिता कहती हैं... मां के रूप में आप उतना समय नहीं दे पाते हैं जितना बच्चा डिमांड करता है. काफ़ी दिन बीत जाते हैं जब बच्चा आपको हमेशा सोते हुए ही मिलता है. सुबह जब आप उठते हैं तो या तो वह स्कूल जा चुका होता है या जब आप आते हैं तो वह सो चुका होता है.शुरुआत में जब राजधानी की पुलिस की ज़िम्मेदारी संभाली थी तो उसे लगता था कि मम्मी टाइम नहीं देती है, लेकिन फिर जब बात की तो समझ आ गया कि यह भी ज़रूरी काम है जो मम्मी को करना है. फिर हम लोगों के बीच यह अंडरस्टैंडिंग भी थी कि मम्मी-पापा में से एक को बच्चे को समय देना होगा. इसीलिए उसके पापा ने अपना बेस यहां शिफ़्ट किया, हालांकि बिज़नेस बाहर ही है. अब वह बेटे को समय दे रहे हैं. बेटे ने मसूरी में बर्फ़ देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो रात की गश्त में पुलिस व्यवस्था चेक करती हुईं निवेदिता कुकरेती उसे लेकर रात 11 बजे मसूरी पहुंचीं. काम भी हुआ और बेटे की इच्छा भी पूरी.काम और परिवार के बीच में बैलेंस किसी भी जॉब में बनाना पड़ता है. जो प्राइवेट सेक्टर में हैं उनके सामने भी यह दुविधा है और जो सरकारी नौकरी में हैं उनके सामने भी यह दुविधा है. यह दुविधा सिर्फ़ महिलाओं के लिए नहीं है यह तो पुरुषों के लिए भी है. जिन बच्चों की मां वर्किंग होती हैं वह महिला की इज़्ज़त करना भी सीखते हैं. वह देखते कि मां खुद आ रही हैं, खुद जा रही हैं, खुद काम कर रही हैं. इसके अलावा उन्हें महिला-पुरुष के बीच समानता की सीख अनचाहे ही मिलती है. मम्मी-पापा दोनों मिलकर काम करते दिखते हैं, कभी मम्मी तैयार करती हैं, कभी पापा तैयार करते हैं. बच्चा यह चीज़ सीखता है कि सबको घर के काम में बराबर भागीदारी करनी चाहिए.पुलिस ऑफ़िसर होने के नाते एक बड़ी चुनौती यह भी आती है कि फ़ोन पर हम ज़्यादातर अपराध पर ही चर्चा कर रहे होते हैं. बच्चे ये सारी बातें सुन रहे होते हैं. आपको एक बात बताऊं तो समझ आएगा... मेरे पति ने सोचा कि मदर्स डे पर बेटे की तरफ़ से मेरे लिए कुछ गिफ़्ट लिया जाए. बेटे ने सुना तो कहा, ‘पापा मत खरीदिए, चोरी हो जाएगी और फिर रिपोर्ट लिखानी पड़ जाएगी.’श्वेता चौबे ने हाल ही में राजधानी देहरादून में एसपी सिटी का काम संभाला है. उनके पति मणिकांत मिश्रा भी पुलिस सेवा में ही हैं और अभी देहरादून में एसपी इंटेलिजेंस के रूप में तैनात हैं. दो बच्चे हैं, बेटी मान्या 12 साल की है और बेटा 6 साल का अद्वैत. दोनों पुलिस ऑफ़िसर अपना काम भी कर पाएं और बच्चों का ध्यान भी रखा जा सके, इसलिए श्वेता और मणिकांत बारी-बारी से बच्चों के के साथ रहते हैं. श्वेता हंसते हुए कहती हैं कि उन्होंने रोटेशन में ड्यूटी लगा रखी है दोनों की. फिर संजीदगी से कहती हैं कि वह बैकबोन हैं, उनके सपोर्ट के बिना नहीं हो पाएगा. इसके अलावा कोशिश यह भी रहती है कि बच्चों के पास मम्मी या पापा में से कोई रहे, उनके साथ टाइम बिताए. पुलिसकर्मी, पुलिस ऑफ़िसर के लिए बड़ी चुनौती यह भी होती है कि काम का तनाव घर में आए, बच्चों तक न पहुंचे. इसके लिए बैलेंस बनाकर रखना होता है. इसमें दिक्कत ये होती है कि बच्चे यह उम्मीद करते हैं कि अब मम्मी घर आ गई हैं तो फिर वह समय हमें दें. लेकिन यह भी नहीं हो पाता. फ़ोन लगातार बजता रहता है, कभी-कभी तो तुरंत बाहर भी निकलना पड़ता है. जन्मदिन या किसी त्योहार में तो बच्चे उम्मीद करते हैं कि मां घर पर रहे क्योंकि बाकी वर्किंग वीमेन भी त्योहार के दिन घर पर रहती हैं. लेकिन यहां तो त्योहार के दिन एक्स्ट्रा ड्यूटी हो जाती है.बच्चे भी समझने लगे हैं अब. जब मैं रात को 12-1 बजे निकलती हूं तो मेरा बेटा कहता है, ‘ओहो ये चोर कितना परेशान करते हैं न आपको, आपको रात-दिन जाना पड़ता है.’ बच्चे यह समझ गए हैं कि पेरेंट्स की ऐसी जॉब है कि उन्हें रात-दिन कभी भी जाना पड़ सकता है. ऐसा भी होता है कि वर्किंग वीमेन के बच्चे थोड़े इंडिपेंडेट होने लगते हैं. उन्हें यह अहसास रहता है कि यह काम हमें खुद ही कर लेने हैं, मम्मी का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है.जब केदारनाथ आपदा आई थी तो बेटा करीब 6 महीने का था. मेरी मैटरनिटी लीव तब ख़त्म ही हुई थी. तब मैं पुलिस हेडक्वार्टर में एडिशनल एसपी डिज़ास्टर और ह्यूमन राइट्स के रूप में काम कर रही थी और पूरे कंट्रोल रूम का प्रभार मेरे पास था. छह महीने के बच्चे को मां की ज़रूरत सबसे ज़्यादा होती है. लेकिन उस समय ज़्यादातर समय कंट्रोल रूम में ही बीतता था, क्योंकि लोग बहुत परेशान थे. उनके परिजन केदारनाथ में लापता हो गए थे. तो उनकी व्यथा सुनना, उन्हें समझाना, फिर ऊपर काम कर रहीं रेस्क्यू टीमों से कोओर्डिनेट करना होता था. उस समय मेरी मां साथ थीं. वह कहती थीं कि तुम्हारा इतना छोटा बच्चा है उसका ख़्याल नहीं आता? तो मैं कहती थी कि उसके साथ तो तुम हो, लेकिन जिनके बच्चे, परिजन केदारनाथ में खो गए हैं उनके लिए हम ही हैं.न, यह ख़्याल कभी नहीं आया. बच्चों और काम के बीच एडजस्ट ऐसे भी किया है कि बेटी छोटी थी तो हम उसे गश्त में भी ले जाते थे.कुछ समय पहले तक हरिद्वार की एसपी रहीं ममता वोहरा अब पुलिस मुख्यालय में एसपी, लॉ एंड ऑर्डर, के रूप में काम कर रही हैं. उनके पति अनिल वोहरा फ़िल्म मेकर हैं और 10 साल का बेटा है. सास साथ रहती हैं और ममता उनका शुक्रिया अदा करते हुए कहती हैं कि उनके बिना ज़िंदगी बहुत मुश्किल होती, क्योंकि उनका और उनके पति का बाहर आना-जाना लगा ही रहता है.बिल्कुल आ जाता है, और कहां जाएगा? आ ही जाता है. ऐसा भी होता है कि आप घर पर हैं और कोई कॉल आ जाता है, जो स्ट्रेस कॉल होता है, जिस पर तुरंत एक्शन लेना होता है तो भी मूड ख़राब हो जाता है. बाद में अहसास होता है कि इसे हैंडल करने की ज़रूरत है. लेकिन शुरुआत में तो गुस्सा आ ही जाता है.ऐसा ख़्याल कभी नहीं आया, बल्कि अच्छा लगता है. आम पब्लिक के दिमाग में पुलिस की दो तरह की इमेज होती है- एक निगेटिव इमेज होती है या दूसरा पावर अट्रैक्ट करती है. लेकिन इसके अलावा पुलिस की बड़ी भूमिका होती है. हम लोग फ़र्स्ट रिस्पांडर होते हैं. हम लोगों को इमिडिएट हेल्प दे सकते हैं, इमिडिएट जस्टिस दिला सकते हैं. हमारे पास ऐसी बहुत सारी फ़ैसिलिटीज़ हैं जिनसे हम लोगों की हेल्प कर सकते हैं, इसी काम के लिए हम हैं.करता है. ऐसा भी होता है कि जन्मदिन में, त्योहारों में नहीं पहुंच पाए. लेकिन सबसे ज़्यादा तकलीफ़देह होता है जब बच्चा बीमार हो. एक बार बेटे को तेज फ़ीवर था और बहुत ज़रूरी ड्यूटी थी. ऐसे में बेटे को वैसे ही छोड़कर जाना पड़ रहा था और उसमें पता नहीं था कि आप कब आएंगे. ऐसे मौके तकलीफ़देह होते हैं. ऐसे मौके पर बच्चे को मां की ज़रूरत होती है. लेकिन बतौर पुलिस अधिकारी जॉब भी बहुत अर्जेंट होती है.देहरादून के डालनवाला इलाक़े की सीओ जया बलूनी संयुक्त परिवार में रहती हैं. उनके परिवार में पति, बेटा, बेटी के साथ ही सास-ससुर और देवर भी हैं. पति राजीव बलूनी होमगार्ड्स में असिस्टेंट कमांडेंट हैं. बेटा सव्यसाची 9 साल का है और बेटी सान्वी 4 साल की. जया कहती हैं कि पुलिस की जॉब ऐसी है जो आपका 100% अटेंशन मांगती है. कई बार ऐसा लगता है कि बच्चे नेगलेक्ट हो रहे हैं. बच्चे उम्मीद करते हैं कि मां उनके साथ टाइम बिताए. ख़ासतौर पर फ़ेस्टिवल्स और बर्थडे में. कई बार ऐसा हुआ कि बर्थडे था और मैं लास्ट मिनट में केक काटने के टाइम पर पहुंची. अब तो बच्चे भी समझने लगे हैं कि मम्मी का काम ही ऐसा है, तो जाते-जाते बस यही कहते हैं कि जल्दी आना.बेटा जब सवा साल का था तब मैं मुरादबाद में ट्रेनिंग में थी. उन दिनों वीडियो कॉलिंग शुरु ही हुई थी. घर पर वीडियो कॉल की तो देखा कि बेटे की आंख के ऊपर चोट लगी हुई थी. पूछा तो पता चला कि सीढ़ी से गिर गया था और पांच टांके भी आए हैं. मुझे किसी ने इसलिए नहीं बताया कि ट्रेनिंग में छुट्टी मिलनी मुश्किल थी और वे मुझे चिंता में नहीं डालना चाहते थे. मैं दो-तीन महीने से उससे मिल भी नहीं पाई थी तो मुझे रोना आ गया. मैं अपने ट्रेनिंग इंचार्ज के पास गई और उनसे छुट्टी के लिए रिक्वेस्ट की. उन्होंने कहा कि अगले महीने देखना. मुझसे रुका नहीं जा रहा था. खैर, उन्होंने किसी तरह परमिशन दी और रात को मुझे 12.30 बजे की ट्रेन मिली और मैं सुबह देहरादून आ गई. बेटे को देखकर मुझे शांति मिली और रात को ही लौट गई.परिवार को देखती हूं तो कई बार ऐसा लगता है 10 से 5 वाली नौकरी होती तो अच्छा होता. कई बार तो ऐसा लगता है कि हाउस वाइफ़ ही होती. जब बच्चे पूरी तरह नेगलेक्ट हो रहे होते हैं तो बहुत बुरा लगता है. अभी चुनाव का टाइम था तो कई दिन तक बच्चों से बात भी नहीं हो पाई. जब तक मैं पहुंचती थी वे सो चुके होते थे. सुबह जब तक मैं उठती थी वे स्कूल जा चुके होते थे. इसी दौरान बेटे ने कहा, ‘मम्मा मैं आपको 3 दिन बाद देख रहा हूं’ जबकि मैं यहीं घर पर रह रही थी.

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