शेख हसीना के शासन में बांग्लादेश के जो हिंदू खुद को थोड़ा-बहुत सुरक्षित महसूस करते थे वे फिलहाल असहाय-निरुपाय दिख रहे हैं। चिंता की बात यह है कि सेना उनकी रक्षा को उतनी तत्पर नहीं दिख रही जितना उसे दिखना चाहिए। भारत को बांग्लादेश के हिंदुओं को बचाने के लिए कुछ करना होगा अन्यथा उनका वैसा ही बुरा हाल होगा जैसे अफगानिस्तान में हुआ और पाकिस्तान में हो...
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के पलायन के बाद कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की चुनौतियां बढ़ती दिख रही हैं। मोदी सरकार ने शेख हसीना को शरण देकर अच्छा किया, लेकिन इसके नतीजे में बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाएं और बढ़ सकती हैं। वहां भारत विरोधी तत्व पहले से ही सक्रिय थे। शेख हसीना उन पर लगाम लगा रही थीं, लेकिन उनके भारत आने और बांग्लादेश लौटने की संभावनाएं शून्य होने के साथ ही पश्चिम ने जिस प्रकार उनसे मुंह मोड़ा, उससे साफ है कि भारत को बांग्लादेश में अपने हित सुरक्षित करना और कठिन हो सकता है। ब्रिटेन शेख हसीना को शरण देने को तैयार नहीं और अमेरिका ने तो न केवल उनका वीजा रद कर दिया, बल्कि वहां की सेना को यह जानते हुए भी सलाम किया कि वह अंतरिम सरकार में कट्टरंपथी तत्वों की भागीदारी के लिए भी तैयार है। फिलहाल यह कहना कठिन है कि बांग्लादेश में सेना के वर्चस्व वाली अंतरिम सरकार का भारत के प्रति मित्रवत रवैया होगा। इस सरकार में घोर भारत विरोधी कट्टरपंथी संगठन जमाते इस्लामी के शामिल होने के साथ ही विपक्षी नेता एवं उन पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की भी भागीदारी हो सकती है, जिनसे भारत के संबंध कभी सहज नहीं रहे। यदि इस अंतरिम सरकार में उन तत्वों की भागीदारी बढ़ी, जो शेख हसीना को नई दिल्ली की कठपुतली बताते थे, तो भारत की चुनौतियां और बढ़ जाएंगी। बांग्लादेश में भारत के नजरिये से असहमत पश्चिमी देशों के साथ चीन का भी दखल बढ़ने का अंदेशा है। चीन पहले से ही मालदीव एवं नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ा चुका है और पाकिस्तान तो उसकी गोद में ही बैठा है। वह श्रीलंका में भी अपना दबदबा बढ़ाने की ताक में है। एक अन्य पड़ोसी देश म्यांमार भी अस्थिरता से जूझ रहा है और वहां भी चीन का दखल साफ दिख रहा है। भारत की समस्या केवल यह नहीं है कि वह बांग्लादेश में अपने हितों की रक्षा कैसे करे, बल्कि यह भी है कि वहां के अल्पसंख्यकों और विशेष रूप से हिंदुओं को कैसे बचाए? आरक्षण विरोध के बहाने शेख हसीना को सत्ता से हटाने के आंदोलन के दौरान हिंदुओं पर छिटपुट हमले ही हो रहे थे, लेकिन तख्तापलट के बाद तो उनकी शामत ही आ गई है। बांग्लादेश का शायद ही कोई ऐसा इलाका हो, जहां से हिंदुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों को निशाना बनाए जाने की खबरें न आ रही हों। शेख हसीना के शासन में बांग्लादेश के जो हिंदू खुद को थोड़ा-बहुत सुरक्षित महसूस करते थे, वे फिलहाल असहाय-निरुपाय दिख रहे हैं। चिंता की बात यह है कि सेना उनकी रक्षा को उतनी तत्पर नहीं दिख रही, जितना उसे दिखना चाहिए। भारत को बांग्लादेश के हिंदुओं को बचाने के लिए कुछ करना होगा, अन्यथा उनका वैसा ही बुरा हाल होगा, जैसे अफगानिस्तान में हुआ और पाकिस्तान में हो रहा है।.
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के पलायन के बाद कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की चुनौतियां बढ़ती दिख रही हैं। मोदी सरकार ने शेख हसीना को शरण देकर अच्छा किया, लेकिन इसके नतीजे में बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाएं और बढ़ सकती हैं। वहां भारत विरोधी तत्व पहले से ही सक्रिय थे। शेख हसीना उन पर लगाम लगा रही थीं, लेकिन उनके भारत आने और बांग्लादेश लौटने की संभावनाएं शून्य होने के साथ ही पश्चिम ने जिस प्रकार उनसे मुंह मोड़ा, उससे साफ है कि भारत को बांग्लादेश में अपने हित सुरक्षित करना और कठिन हो सकता है। ब्रिटेन शेख हसीना को शरण देने को तैयार नहीं और अमेरिका ने तो न केवल उनका वीजा रद कर दिया, बल्कि वहां की सेना को यह जानते हुए भी सलाम किया कि वह अंतरिम सरकार में कट्टरंपथी तत्वों की भागीदारी के लिए भी तैयार है। फिलहाल यह कहना कठिन है कि बांग्लादेश में सेना के वर्चस्व वाली अंतरिम सरकार का भारत के प्रति मित्रवत रवैया होगा। इस सरकार में घोर भारत विरोधी कट्टरपंथी संगठन जमाते इस्लामी के शामिल होने के साथ ही विपक्षी नेता एवं उन पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की भी भागीदारी हो सकती है, जिनसे भारत के संबंध कभी सहज नहीं रहे। यदि इस अंतरिम सरकार में उन तत्वों की भागीदारी बढ़ी, जो शेख हसीना को नई दिल्ली की कठपुतली बताते थे, तो भारत की चुनौतियां और बढ़ जाएंगी। बांग्लादेश में भारत के नजरिये से असहमत पश्चिमी देशों के साथ चीन का भी दखल बढ़ने का अंदेशा है। चीन पहले से ही मालदीव एवं नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ा चुका है और पाकिस्तान तो उसकी गोद में ही बैठा है। वह श्रीलंका में भी अपना दबदबा बढ़ाने की ताक में है। एक अन्य पड़ोसी देश म्यांमार भी अस्थिरता से जूझ रहा है और वहां भी चीन का दखल साफ दिख रहा है। भारत की समस्या केवल यह नहीं है कि वह बांग्लादेश में अपने हितों की रक्षा कैसे करे, बल्कि यह भी है कि वहां के अल्पसंख्यकों और विशेष रूप से हिंदुओं को कैसे बचाए? आरक्षण विरोध के बहाने शेख हसीना को सत्ता से हटाने के आंदोलन के दौरान हिंदुओं पर छिटपुट हमले ही हो रहे थे, लेकिन तख्तापलट के बाद तो उनकी शामत ही आ गई है। बांग्लादेश का शायद ही कोई ऐसा इलाका हो, जहां से हिंदुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों को निशाना बनाए जाने की खबरें न आ रही हों। शेख हसीना के शासन में बांग्लादेश के जो हिंदू खुद को थोड़ा-बहुत सुरक्षित महसूस करते थे, वे फिलहाल असहाय-निरुपाय दिख रहे हैं। चिंता की बात यह है कि सेना उनकी रक्षा को उतनी तत्पर नहीं दिख रही, जितना उसे दिखना चाहिए। भारत को बांग्लादेश के हिंदुओं को बचाने के लिए कुछ करना होगा, अन्यथा उनका वैसा ही बुरा हाल होगा, जैसे अफगानिस्तान में हुआ और पाकिस्तान में हो रहा है।
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