विभिन्न खेल संगठन भी खेल प्रतिभाओं को तलाशने और उन्हें निखारने का काम नहीं कर पाते। एक समस्या यह भी है कि खिलाड़ियों को बेहतर प्रदर्शन करने के साथ ही अपने करियर की भी चिंता करनी पड़ती है। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि केंद्र सरकार के साथ कुछ ही राज्य सरकारें खेलों को बढ़ावा देने के लिए तत्पर दिखती...
पेरिस ओलिंपिक के समापन के पहले ही भारत का सफर खत्म हो चुका था। इस बार भारत एक रजत पदक समेत कुल छह पदक ही हासिल कर सका। इस प्रदर्शन को उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भारत तमाम तैयारी के बावजूद पिछले प्रदर्शन को भी नहीं दोहरा सका। इससे यही रेखांकित होता है कि भारत को खेलों में बड़ी शक्ति बनने के लिए अभी लंबा सफर तय करना है। पदक तालिका में भारत का स्थान पहले 50 देशों में भी नहीं है। सबसे बड़ी आबादी वाले देश का पदक तालिका में इतना पीछे रहना ठीक नहीं। इस बार कुछ ही खेलों में भारतीय खिलाड़ी बेहतर प्रदर्शन कर सके। इनमें सर्वोपरि रहे नीरज चोपड़ा, जिन्होंने पिछली बार स्वर्ण पदक जीतकर करिश्मा किया था और इस बार उन्हें रजत से संतोष करना पड़ा। इसके बाद भी वह भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के रूप में अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे। शूटिंग में मनु भाकर ने भी चमत्कृत करने वाला प्रदर्शन किया। उन्होंने व्यक्तिगत स्पर्धा के साथ युगल प्रतिस्पर्धा में भी सरबजोत सिंह के साथ कांस्य पदक जीता। शूटिंग में ही ऐसा ही प्रदर्शन स्वप्निल कुसाले ने भी किया। कुश्ती में अमन सहरावत के कांस्य के रूप में एक ही पदक मिला। विनेश फोगाट से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया। पदकों की संख्या कम रह जाने का एक कारण यह भी रहा कि लक्ष्य सेन, अर्जुन बबूटा समेत कई खिलाडी चौथे स्थान से आगे नहीं जा सके। हॉकी टीम की ओर से लगातार दूसरा कांस्य पदक हासिल करना एक बड़ी उपलब्धि है। यह उपलब्धि यही बताती है कि भारतीय हॉकी अपने स्वर्णिम दिनों की ओर लौट रही है। ओलिंपिक में समापन के साथ ही हमारे नीति-नियंताओं, खेल संगठनों, खेल प्रशासकों और स्वयं खिलाड़ियों को इस पर आत्ममंथन करना चाहिए कि भारत ओलिंपिक में इतना पीछे क्यों है। यह तो साफ है कि अपने देश में वैसी खेल संस्कृति विकसित नहीं हो सकी है, जैसी अब तक हो जानी चाहिए थी। चूंकि खेल संस्कृति का सही तरह विकास नहीं हो सका है इसलिए विभिन्न खेलों में प्रतिभाओं की तलाश और उनका समुचित प्रशिक्षण नहीं हो पाता। इस काम में सरकारी विद्यालय भी पीछे हैं और निजी स्कूल भी। विभिन्न खेल संगठन भी खेल प्रतिभाओं को तलाशने और उन्हें निखारने का काम नहीं कर पाते। एक समस्या यह भी है कि खिलाड़ियों को बेहतर प्रदर्शन करने के साथ ही अपने करियर की भी चिंता करनी पड़ती है। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि केंद्र सरकार के साथ कुछ ही राज्य सरकारें खेलों को बढ़ावा देने के लिए तत्पर दिखती हैं। खेलों और खिलाड़ियों का विकास कैसे हो, इसकी सीख चीन समेत अन्य देशों से भी ली जानी चाहिए। अब जब भारत दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और आर्थिक विकास खेलों के विकास में सहायक होता है तब फिर भारत को ओलिंपिक की पदक तालिका में पहले बीस स्थानों में तो अपनी जगह बनानी ही चाहिए।.
पेरिस ओलिंपिक के समापन के पहले ही भारत का सफर खत्म हो चुका था। इस बार भारत एक रजत पदक समेत कुल छह पदक ही हासिल कर सका। इस प्रदर्शन को उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भारत तमाम तैयारी के बावजूद पिछले प्रदर्शन को भी नहीं दोहरा सका। इससे यही रेखांकित होता है कि भारत को खेलों में बड़ी शक्ति बनने के लिए अभी लंबा सफर तय करना है। पदक तालिका में भारत का स्थान पहले 50 देशों में भी नहीं है। सबसे बड़ी आबादी वाले देश का पदक तालिका में इतना पीछे रहना ठीक नहीं। इस बार कुछ ही खेलों में भारतीय खिलाड़ी बेहतर प्रदर्शन कर सके। इनमें सर्वोपरि रहे नीरज चोपड़ा, जिन्होंने पिछली बार स्वर्ण पदक जीतकर करिश्मा किया था और इस बार उन्हें रजत से संतोष करना पड़ा। इसके बाद भी वह भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के रूप में अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे। शूटिंग में मनु भाकर ने भी चमत्कृत करने वाला प्रदर्शन किया। उन्होंने व्यक्तिगत स्पर्धा के साथ युगल प्रतिस्पर्धा में भी सरबजोत सिंह के साथ कांस्य पदक जीता। शूटिंग में ही ऐसा ही प्रदर्शन स्वप्निल कुसाले ने भी किया। कुश्ती में अमन सहरावत के कांस्य के रूप में एक ही पदक मिला। विनेश फोगाट से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया। पदकों की संख्या कम रह जाने का एक कारण यह भी रहा कि लक्ष्य सेन, अर्जुन बबूटा समेत कई खिलाडी चौथे स्थान से आगे नहीं जा सके। हॉकी टीम की ओर से लगातार दूसरा कांस्य पदक हासिल करना एक बड़ी उपलब्धि है। यह उपलब्धि यही बताती है कि भारतीय हॉकी अपने स्वर्णिम दिनों की ओर लौट रही है। ओलिंपिक में समापन के साथ ही हमारे नीति-नियंताओं, खेल संगठनों, खेल प्रशासकों और स्वयं खिलाड़ियों को इस पर आत्ममंथन करना चाहिए कि भारत ओलिंपिक में इतना पीछे क्यों है। यह तो साफ है कि अपने देश में वैसी खेल संस्कृति विकसित नहीं हो सकी है, जैसी अब तक हो जानी चाहिए थी। चूंकि खेल संस्कृति का सही तरह विकास नहीं हो सका है इसलिए विभिन्न खेलों में प्रतिभाओं की तलाश और उनका समुचित प्रशिक्षण नहीं हो पाता। इस काम में सरकारी विद्यालय भी पीछे हैं और निजी स्कूल भी। विभिन्न खेल संगठन भी खेल प्रतिभाओं को तलाशने और उन्हें निखारने का काम नहीं कर पाते। एक समस्या यह भी है कि खिलाड़ियों को बेहतर प्रदर्शन करने के साथ ही अपने करियर की भी चिंता करनी पड़ती है। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि केंद्र सरकार के साथ कुछ ही राज्य सरकारें खेलों को बढ़ावा देने के लिए तत्पर दिखती हैं। खेलों और खिलाड़ियों का विकास कैसे हो, इसकी सीख चीन समेत अन्य देशों से भी ली जानी चाहिए। अब जब भारत दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और आर्थिक विकास खेलों के विकास में सहायक होता है तब फिर भारत को ओलिंपिक की पदक तालिका में पहले बीस स्थानों में तो अपनी जगह बनानी ही चाहिए।
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