जागरण संपादकीय: मंदी आई तो क्या होगा? ट्रंप की टैरिफ नीति पर उठे कई सवाल

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वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था को हम दो हिस्सों में बांट सकते हैं। इसमें एक हिस्सा अमेरिका का जिसका विश्व अर्थव्यवस्था में लगभग 26 प्रतिशत हिस्सेदारी है। दूसरा भाग शेष विश्व का जिसका हिस्सा 74 प्रतिशत है। 74 प्रतिशत अर्थव्यवस्था वाले देशों में अब आपसी व्यापार बढ़ेगा। बिल्कुल वैसे जैसे जमींदारी समाप्त होने पर किसानों ने दूसरे बाजार शीघ्र ही पकड़ लिए...

डॉ. भरत झुनझुनवाला। कई विश्लेषकों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति से अमेरिका सहित विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी आ सकती है। इस विषय को समझने के लिए पहले ट्रंप की दृष्टि को समझना होगा। ट्रंप इससे चिंतित हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का लाभ बढ़ रहा है और अमेरिका द्वारा पूरे विश्व से भारी मात्रा में ऋण लिया जा रहा है, लेकिन अमेरिकी श्रमिकों के वेतन सपाट बने हुए हैं। वर्ष 2000 से 2023 के बीच अमेरिकी कंपनियों का लाभ 500 अरब डॉलर से बढ़कर 3,500 अरब डॉलर हो गया। इसमें सात गुना वृद्धि हुई। इसी अवधि में अमेरिका द्वारा लिया जाने वाला ऋण 5.

6 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 33.2 ट्रिलियन डॉलर हो गया। इसमें भी लगभग छह गुना वृद्धि हुई, लेकिन इसी अवधि में एक अमेरिकी श्रमिक का औसत वेतन 335 डॉलर प्रति सप्ताह से बढ़कर 375 डॉलर प्रति सप्ताह ही हो पाया। इसमें मात्र 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ट्रंप का लक्ष्य है कि अमेरिकी श्रमिकों के वेतन में वृद्धि हो और अमेरिका द्वारा लिया जाने वाला ऋण घटे, क्योंकि इतनी भारी मात्रा में ऋण लेने से अमेरिका की आर्थिक संप्रभुता पर संकट आ सकता है। ट्रंप द्वारा आयात कर यानी टैरिफ बढ़ाने से अमेरिका में आयातित होने वाली वस्तुओं के दाम में वृद्धि होगी। जैसे, जो विदेशी कार वर्तमान में 20,000 डॉलर में बिक रही है, वह आयात कर आरोपित होने के बाद 25,000 डॉलर में बिकेगी। इस कारण अमेरिकी नागरिकों की खपत में गिरावट आ सकती है। जो परिवार 20,000 डॉलर में कार खरीदने को उत्सुक था, वह उसी कार को 25,000 डॉलर में खरीदने से शायद हिचकेगा। अमेरिका में खपत घटने से मंदी आ सकती है। जेपी मार्गन बैंक ने मंदी की 60 प्रतिशत तक आशंका व्यक्त की है। हालांकि मेरी समझ से यह आकलन सही नहीं है। कहानी का दूसरा पहलू देखें तो आयातित कार महंगी होने से अमेरिका में उत्पादित कार सस्ती पड़ने लगेगी। अमेरिकी कार का उत्पादन बढ़ेगा। मान लीजिए 20,000 डॉलर की अमेरिकी कार के उत्पादन में 1,000 डॉलर का पार्ट भारत से बनकर आता है। ट्रंप द्वारा आयात कर बढ़ाने के कारण यह पार्ट अब 1,300 डॉलर में आयातित होगा। अमेरिकी कार का विक्रय मूल्य 20,000 से बढ़कर 20,300 डॉलर हो जाएगा। तुलना में आयातित कार 25,000 डॉलर में आयातित होगी। इसलिए पार्ट्स पर बढ़े हुए आयात कर को अदा करना अमेरिकी उद्यमियों के लिए लाभप्रद होगा और अमेरिका में उत्पादन बढ़ेगा। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी सरकार को 300 डॉलर की आय होगी, जिससे सरकार का वित्तीय घाटा कम होगा और अमेरिका का ऋण कम होगा। हालांकि इसमें दूसरा संकट यह है कि यदि दूसरे देशों ने जवाबी आयात कर में वृद्धि की तो अमेरिकी निर्यात प्रभावित होंगे, जिससे वहां के उद्यमों को नुकसान पहुंचेगा। निश्चित ही कुछ क्षेत्रों में ऐसा होगा, लेकिन यह नुकसान न्यून ही होगा। हर देश के उद्यमी दूसरे बाजार की खोज करेंगे। जैसे अमेरिका में टोयोटा का ट्रक महंगा पड़ने के कारण अमेरिकी निर्माता ट्रक का उत्पादन बढ़ाएंगे। अमेरिका में उत्पादन बढ़ने से वहां श्रम की मांग बढ़ेगी। इसका अंतिम प्रभाव सकारात्मक होगा। इसी प्रकार भारत में अमेरिका से आयातित होने वाले माल के स्थान पर घरेलू उत्पादन बढ़ेगा। जैसे अमेरिका से आयातित होने वाले बिजली के उपकरणों के स्थान पर बिजली के घरेलू उपकरणों का उपयोग बढ़ेगा। इस उठापटक में कुछ समय तक बाजार में मंदी आएगी, परंतु दीर्घकाल में प्रभाव सकारात्मक होगा। मूल बात यह है कि टैरिफ बढ़ाने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उत्पादन करना अधिक लाभप्रद हो जाएगा। घरेलू उत्पादन बढ़ने से वहां पर श्रमिकों की मांग बढ़ेगी और श्रमिकों के वेतन भी बढ़ेंगे। अमेरिका में एक्साइज ड्यूटी एवं आयात कर की वसूली बढ़ेगी। घरेलू कंपनियों का लाभ बढ़ेगा। वे अधिक कर अदा करेंगी। इन सब कारणों से अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। ट्रंप की नीति मूल रूप से सही है। टैरिफ नीति का दूसरे देशों पर अल्प समय में नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। जैसे भारत से 1,000 डॉलर मूल्य के कलपुर्जे बेचने वाले उद्यमों के निर्यात प्रभावित होंगे। भारत में उत्पादन के स्तर पर तत्काल कुछ गिरावट आएगी। भारतीय कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ेगा। इसी प्रकार दूसरे देशों में उत्पादन घटने से संपूर्ण विश्व में मंदी आ सकती है। यह मंदी कितने समय तक होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दूसरे ग्राहक कितने समय में उपलब्ध हो जाते हैं। जैसे कार के पार्ट्स को बनाने वाले भारतीय उद्यम के लिए यह संभव होगा कि वह यूरोप अथवा दक्षिणी अमेरिका में उत्पादित होने वाली कार के लिए पार्ट्स बनाकर निर्यात करें। वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था को हम दो हिस्सों में बांट सकते हैं। इसमें एक हिस्सा अमेरिका का, जिसका विश्व अर्थव्यवस्था में लगभग 26 प्रतिशत हिस्सेदारी है। दूसरा भाग शेष विश्व का, जिसका हिस्सा 74 प्रतिशत है। 74 प्रतिशत अर्थव्यवस्था वाले देशों में अब आपसी व्यापार बढ़ेगा। बिल्कुल वैसे जैसे जमींदारी समाप्त होने पर किसानों ने दूसरे बाजार शीघ्र ही पकड़ लिए थे। इस प्रक्रिया में कुछ समय लग सकता है, लेकिन अमेरिका को निर्यात बाधित होने के कारण, जो मंदी आएगी वह दीर्घकालिक नहीं होगी। भारत इस संकट से निपटने को लेकर सुदृढ़ स्थिति में है। भारत द्वारा अमेरिका को निर्यात किए जाने वाला माल हमारे देश की आय का मात्र 2.1 प्रतिशत है। यह संपूर्ण निर्यात बंद हो जाए तो भी 2.1 प्रतिशत का बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि इसमें से कुछ माल हम दूसरे देशों को निर्यात कर सकेंगे। जैसे दूध बिकना कम हो जाए तो किसान खोया बनाकर दूसरा बाजार पकड़ लेता है। हालांकि अमेरिकी बाजार को छोड़ने में कठिनाई होगी। हमें अमेरिका-केंद्रित विश्व को पीछे छोड़कर बहुकेंद्रित विश्व की ओर बढ़ना चाहिए। टैरिफ मामले का सार यही है कि ट्रंप द्वारा टैरिफ बढ़ाना अमेरिकी नागरिकों के लिए लाभप्रद हो सकता है, जो शेष विश्व के लिए अल्प समय में हानिकारक, किंतु दीर्घकाल में नए विश्व के निर्माण में मददगार होगा।

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