जागरण संपादकीय: जोखिम भरे राजमार्ग, ब्लैक स्पॉट के साथ व्हाइट कॉरिडोर भी चिह्नित करना जरूरी

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जागरण संपादकीय: जोखिम भरे राजमार्ग, ब्लैक स्पॉट के साथ व्हाइट कॉरिडोर भी चिह्नित करना जरूरी
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राजमार्गों पर यातायात नियमों का वैसा पालन नहीं किया जाता जैसा आवश्यक है। न जाने कितनी दुर्घटनाएं इस कारण हो चुकी हैं कि राजमार्ग पर कोई वाहन उलटी दिशा से चला आ रहा था। स्पष्ट है कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को राज्य सरकारों से मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि राजमार्गों पर यातायात नियमों का पालन हो। इसे लेकर लोगों को भी सजगता दिखानी...

राष्ट्रीय राजमार्गों पर हादसे रोकने के लिए ब्लैक स्पॉट यानी दुर्घटना बहुल हिस्सों को चिह्नित करने की तैयारी में नया कुछ नहीं है। इस तरह की घोषणाएं एक लंबे समय से की जा रही हैं, लेकिन ऐसे हिस्से खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं, जहां दुर्घटनाएं होती रहती हैं। अब राष्ट्रीय राजमार्गों पर ब्लैक स्पॉट के साथ व्हाइट कॉरिडोर भी चिह्नित किए जाएंगे, ताकि जोखिम वाले हिस्सों के साथ उन हिस्सों की भी पहचान हो सके, जो ठीक-ठाक हैं और जहां बीते तीन वर्षों में कोई दुर्घटना नहीं हुई। यह ठीक ही है, लेकिन इस कवायद की सार्थकता तभी है, जब राजमार्गों पर दुर्घटनाएं और उनमें जान गंवाने एवं घायल होने वालों की संख्या में कमी आए। यह निराशाजनक है कि राष्ट्रीय राजमार्गों के जोखिम वाले हिस्सों की पहचान कर उन्हें ठीक करने की पहल अंजाम तक पहुंचने का नाम नहीं ले रही है। राजमार्गों के ब्लैक स्पॉट खराब इंजीनियरिंग और डिजाइन का नतीजा हैं। समझना कठिन है कि आखिर राजमार्गों का निर्माण और उनकी मरम्मत करते समय ही इसकी सुध क्यों नहीं ली जाती कि कहीं कोई ब्लैक स्पॉट न रहने पाए? यह प्रश्न इसलिए गंभीर है, क्योंकि राजमार्गों पर ब्लैक स्पॉट के चलते लगातार हादसे हो रहे हैं। किसी-किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर तो ब्लैक स्पॉट कहे जाने वाले हिस्सों की लंबाई पांच सौ मीटर तक है। 2023 के एक आंकड़े के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों पर ब्लैक स्पॉट के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में 39 हजार लोगों की जान गई थी। यह सही है कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ब्लैक स्पॉट खत्म करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ऐसा लगता है कि वह उसकी प्राथमिकता में नहीं। शायद ही कोई राष्ट्रीय राजमार्ग ऐसा हो, जिसमें ब्लैक स्पॉट न हों। राजमार्गों में इनकी संख्या नौ हजार से अधिक है। इन्हें अगले साल मार्च तक ठीक करने का वादा किया गया है, लेकिन यह कठिन काम है और यह तब पूरा होगा, जब नए ब्लैक स्पॉट न बनने पाएं। ब्लैक स्पॉट केवल राजमार्गों की खराब डिजाइन के कारण ही नहीं बनते, बल्कि मनमाने तरीके से पार्किंग करने से भी बनते हैं। इसे लेकर गत दिवस ही सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की। यह भी किसी से छिपा नहीं कि राजमार्ग जहां कहीं किसी अन्य सड़क से जुड़ते हैं, वहां पर अवैध आटो-टेंपो स्टैंड कायम हो जाते हैं। वे यातायात को बाधित करने के साथ ही दुर्घटना का कारण भी बनते हैं। एक समस्या यह भी है कि राजमार्गों पर यातायात नियमों का वैसा पालन नहीं किया जाता, जैसा आवश्यक है। न जाने कितनी दुर्घटनाएं इस कारण हो चुकी हैं कि राजमार्ग पर कोई वाहन उलटी दिशा से चला आ रहा था। स्पष्ट है कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को राज्य सरकारों से मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि राजमार्गों पर यातायात नियमों का पालन हो। इसे लेकर लोगों को भी सजगता दिखानी होगी।.

राष्ट्रीय राजमार्गों पर हादसे रोकने के लिए ब्लैक स्पॉट यानी दुर्घटना बहुल हिस्सों को चिह्नित करने की तैयारी में नया कुछ नहीं है। इस तरह की घोषणाएं एक लंबे समय से की जा रही हैं, लेकिन ऐसे हिस्से खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं, जहां दुर्घटनाएं होती रहती हैं। अब राष्ट्रीय राजमार्गों पर ब्लैक स्पॉट के साथ व्हाइट कॉरिडोर भी चिह्नित किए जाएंगे, ताकि जोखिम वाले हिस्सों के साथ उन हिस्सों की भी पहचान हो सके, जो ठीक-ठाक हैं और जहां बीते तीन वर्षों में कोई दुर्घटना नहीं हुई। यह ठीक ही है, लेकिन इस कवायद की सार्थकता तभी है, जब राजमार्गों पर दुर्घटनाएं और उनमें जान गंवाने एवं घायल होने वालों की संख्या में कमी आए। यह निराशाजनक है कि राष्ट्रीय राजमार्गों के जोखिम वाले हिस्सों की पहचान कर उन्हें ठीक करने की पहल अंजाम तक पहुंचने का नाम नहीं ले रही है। राजमार्गों के ब्लैक स्पॉट खराब इंजीनियरिंग और डिजाइन का नतीजा हैं। समझना कठिन है कि आखिर राजमार्गों का निर्माण और उनकी मरम्मत करते समय ही इसकी सुध क्यों नहीं ली जाती कि कहीं कोई ब्लैक स्पॉट न रहने पाए? यह प्रश्न इसलिए गंभीर है, क्योंकि राजमार्गों पर ब्लैक स्पॉट के चलते लगातार हादसे हो रहे हैं। किसी-किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर तो ब्लैक स्पॉट कहे जाने वाले हिस्सों की लंबाई पांच सौ मीटर तक है। 2023 के एक आंकड़े के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों पर ब्लैक स्पॉट के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में 39 हजार लोगों की जान गई थी। यह सही है कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ब्लैक स्पॉट खत्म करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ऐसा लगता है कि वह उसकी प्राथमिकता में नहीं। शायद ही कोई राष्ट्रीय राजमार्ग ऐसा हो, जिसमें ब्लैक स्पॉट न हों। राजमार्गों में इनकी संख्या नौ हजार से अधिक है। इन्हें अगले साल मार्च तक ठीक करने का वादा किया गया है, लेकिन यह कठिन काम है और यह तब पूरा होगा, जब नए ब्लैक स्पॉट न बनने पाएं। ब्लैक स्पॉट केवल राजमार्गों की खराब डिजाइन के कारण ही नहीं बनते, बल्कि मनमाने तरीके से पार्किंग करने से भी बनते हैं। इसे लेकर गत दिवस ही सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की। यह भी किसी से छिपा नहीं कि राजमार्ग जहां कहीं किसी अन्य सड़क से जुड़ते हैं, वहां पर अवैध आटो-टेंपो स्टैंड कायम हो जाते हैं। वे यातायात को बाधित करने के साथ ही दुर्घटना का कारण भी बनते हैं। एक समस्या यह भी है कि राजमार्गों पर यातायात नियमों का वैसा पालन नहीं किया जाता, जैसा आवश्यक है। न जाने कितनी दुर्घटनाएं इस कारण हो चुकी हैं कि राजमार्ग पर कोई वाहन उलटी दिशा से चला आ रहा था। स्पष्ट है कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को राज्य सरकारों से मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि राजमार्गों पर यातायात नियमों का पालन हो। इसे लेकर लोगों को भी सजगता दिखानी होगी।

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