चीन के राष्ट्रपति ने दी थी पाकिस्तान को सलाह- कश्मीर मुद्दे को भूलना ही बेहतर रहेगा

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चीन के राष्ट्रपति ने दी थी पाकिस्तान को सलाह- कश्मीर मुद्दे को भूलना ही बेहतर रहेगा
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आजादी के सात दशक बाद भी कश्मीर का मुद्दा जस का तस बना हुआ है। पाकिस्तान ने इसके कुछ हिस्से पर कब्जा कर रखा है। वहां के नेता इसे एक अनसुलझा मामला कहते हैं। हालांकि उनकी इस बात पर दुनिया कान नहीं देती है, फिर भी वो इस राग को अलापना नहीं छोड़ रहे हैं। कमोबेश हर बार संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान इस मुद्दे को उठाता है और मुंह की खाता है। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का प्रिय विषय कश्मीर ही रहता है। चाहे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री हों या फिर संयुक्त राष्ट्र में उसके प्रतिनिधि, सब की बातचीत में कश्मीर का जिक्र होता ही है। कश्मीर को लेकर पाकिस्तानी हठ इस कदर है कि फर्जी फोटो दिखाकर अपनी फजीहत कराने से भी नहीं चूके हैं। एक पाकिस्तानी लेखक एमएमआर खान ने 1955 में लिखा था कि पाकिस्तान के लिए कश्मीर भारत के डर और विश्वासघात का मानवीकरण है। पाकिस्तान ने हमेशा इस समस्या को निबटाने के लिए दकियानूसी रवैया ही अख्तियार किया है। अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने अपनी किताब भारत vs पाकिस्तान में एक आर्मी चीफ के हवाले से लिखा था, "इतना समय, संसाधन और शक्ति लगाने के बाद भी पाकिस्तानी इस कटु सत्य को अब तक अपना नहीं सके हैं कि कश्मीर की समस्या फिलहाल सुलझने वाली नहीं है।" पाकिस्तान के सबसे खास सरपरस्त देश चीन ने भी कश्मीर मुद्दे पर उसे एक सलाह और समझाइश दी थी। 1996 में चीन के राष्ट्रपति रहे जियांग जेमिन ने पाकिस्तानी संसद में दिए अपने संबोधन में कहा था, "अगर कुछ मुद्दो को फिलहाल सुलझाया नहीं जा सकता तो उन्हें ठंडे बस्ते में डाल देना चाहिए, जिससे दो देशों के बीच सामान्य संबंधों के रास्ते पर आगे बढ़ा जा सके।" लेकिन पाकिस्तान ने इसे नहीं माना। उसने 1948 से 1963 के बीच अंतरराष्ट्रीय दबाव का इस्तेमाल करते किया, 1965 में युद्ध छेड़ा, सशस्त्र विद्रोह को 1989 से 2002 तक लगातार भड़काया। 1999 में कारगिल के जरिये सेना और घुसपैठियों का इस्तेमाल कर वास्तविक नियंत्रण रेखा को बदलने की नाकाम कोशिश भी की। भारत के खिलाफ जिहादी आतंकवाद को भी समर्थन दिया, जिसकी कीमत खुद उसे भी चुकानी पड़ रही है। इस तमाम कोशिशों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मुद्दे पर ज्यादा दखलअंदाजी नहीं करना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान की कोशिश में कोई बदलाव नहीं हुआ है। ब्रिटिश प्लान के मुताबिक रियासतों के राजाओं को ब्रिटिश राजशाही से मुक्त कर दिया गया था। चेंबर ऑफ प्रिंसेज को संबोधित करते हुए माउंटबेटन ने कहा था कि सभी रियासतें तकनीकी तौर पर आजाद हैं, पर उन्हें नए बन रहे दो देशों में से उसे चुनना होगा या नजदीकी बनानी होगी, जो भौगोलिक रूप से उसके नजदीक हो। करीब 562 रियासतों में से सिर्फ 6 ने भारत में विलय से संकोच दिखाया था। इतिहासकार रामचंद्र गुहा के अनुसार, नेहरू हमेशा से यह चाहते थे कि कश्मीर भारत का हिस्सा बने पर एक समय ऐसा भी था जब सरदार पटेल कश्मीर को पाकिस्तान के साथ जाने देने पर भी राजी दिख रहे थे। पटेल ने अपना यह रुख 13 दिसंबर 1947 को पूरी तरह बदल दिया जिस दिन पाकिस्तान सरकार ने जूनागढ़ के पाकिस्तान में विलय को स्वीकार कर लिया। पाकिस्तानी ये मानते हैं कि कश्मीर पाकिस्तान के गले की नस है। कहा जाता है कि यह वाक्य जिन्ना का है, जो उन्होंने बंटवारे के समय कहा था। आज यह वाक्य हर पाकिस्तानी बच्चे को स्कूल से लेकर घर तक कंठस्थ कराया जाता है। जनरल परवेज मुशर्रफ ने एक और बहुत ही विख्यात बयान दिया था कि कश्मीर हमारे खून में है।.

आजादी के सात दशक बाद भी कश्मीर का मुद्दा जस का तस बना हुआ है। पाकिस्तान ने इसके कुछ हिस्से पर कब्जा कर रखा है। वहां के नेता इसे एक अनसुलझा मामला कहते हैं। हालांकि उनकी इस बात पर दुनिया कान नहीं देती है, फिर भी वो इस राग को अलापना नहीं छोड़ रहे हैं। कमोबेश हर बार संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान इस मुद्दे को उठाता है और मुंह की खाता है। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का प्रिय विषय कश्मीर ही रहता है। चाहे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री हों या फिर संयुक्त राष्ट्र में उसके प्रतिनिधि, सब की बातचीत में कश्मीर का जिक्र होता ही है। कश्मीर को लेकर पाकिस्तानी हठ इस कदर है कि फर्जी फोटो दिखाकर अपनी फजीहत कराने से भी नहीं चूके हैं। एक पाकिस्तानी लेखक एमएमआर खान ने 1955 में लिखा था कि पाकिस्तान के लिए कश्मीर भारत के डर और विश्वासघात का मानवीकरण है। पाकिस्तान ने हमेशा इस समस्या को निबटाने के लिए दकियानूसी रवैया ही अख्तियार किया है। अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने अपनी किताब भारत vs पाकिस्तान में एक आर्मी चीफ के हवाले से लिखा था, "इतना समय, संसाधन और शक्ति लगाने के बाद भी पाकिस्तानी इस कटु सत्य को अब तक अपना नहीं सके हैं कि कश्मीर की समस्या फिलहाल सुलझने वाली नहीं है।" पाकिस्तान के सबसे खास सरपरस्त देश चीन ने भी कश्मीर मुद्दे पर उसे एक सलाह और समझाइश दी थी। 1996 में चीन के राष्ट्रपति रहे जियांग जेमिन ने पाकिस्तानी संसद में दिए अपने संबोधन में कहा था, "अगर कुछ मुद्दो को फिलहाल सुलझाया नहीं जा सकता तो उन्हें ठंडे बस्ते में डाल देना चाहिए, जिससे दो देशों के बीच सामान्य संबंधों के रास्ते पर आगे बढ़ा जा सके।" लेकिन पाकिस्तान ने इसे नहीं माना। उसने 1948 से 1963 के बीच अंतरराष्ट्रीय दबाव का इस्तेमाल करते किया, 1965 में युद्ध छेड़ा, सशस्त्र विद्रोह को 1989 से 2002 तक लगातार भड़काया। 1999 में कारगिल के जरिये सेना और घुसपैठियों का इस्तेमाल कर वास्तविक नियंत्रण रेखा को बदलने की नाकाम कोशिश भी की। भारत के खिलाफ जिहादी आतंकवाद को भी समर्थन दिया, जिसकी कीमत खुद उसे भी चुकानी पड़ रही है। इस तमाम कोशिशों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मुद्दे पर ज्यादा दखलअंदाजी नहीं करना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान की कोशिश में कोई बदलाव नहीं हुआ है। ब्रिटिश प्लान के मुताबिक रियासतों के राजाओं को ब्रिटिश राजशाही से मुक्त कर दिया गया था। चेंबर ऑफ प्रिंसेज को संबोधित करते हुए माउंटबेटन ने कहा था कि सभी रियासतें तकनीकी तौर पर आजाद हैं, पर उन्हें नए बन रहे दो देशों में से उसे चुनना होगा या नजदीकी बनानी होगी, जो भौगोलिक रूप से उसके नजदीक हो। करीब 562 रियासतों में से सिर्फ 6 ने भारत में विलय से संकोच दिखाया था। इतिहासकार रामचंद्र गुहा के अनुसार, नेहरू हमेशा से यह चाहते थे कि कश्मीर भारत का हिस्सा बने पर एक समय ऐसा भी था जब सरदार पटेल कश्मीर को पाकिस्तान के साथ जाने देने पर भी राजी दिख रहे थे। पटेल ने अपना यह रुख 13 दिसंबर 1947 को पूरी तरह बदल दिया जिस दिन पाकिस्तान सरकार ने जूनागढ़ के पाकिस्तान में विलय को स्वीकार कर लिया। पाकिस्तानी ये मानते हैं कि कश्मीर पाकिस्तान के गले की नस है। कहा जाता है कि यह वाक्य जिन्ना का है, जो उन्होंने बंटवारे के समय कहा था। आज यह वाक्य हर पाकिस्तानी बच्चे को स्कूल से लेकर घर तक कंठस्थ कराया जाता है। जनरल परवेज मुशर्रफ ने एक और बहुत ही विख्यात बयान दिया था कि कश्मीर हमारे खून में है।

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