हरियाणा में बीजेपी ने सत्ता विरोधी लहर से निपटने के लिए बहुत ही प्रभावी रणनीति अपनाई है. इनमें गैर-जाट वोटों का मजबूती से एकजुट होना, नायब सिंह सैनी का पार्टी चेहरा बनना, भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी अभियान और किसानों के आंदोलन का फायदा उठाना शामिल है.
हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे लगभग साफ हो गए हैं और बीजेपी ने यहां हैट्रिक लगा लिया है. खास बात यह है कि पार्टी के लिए राज्य में यह सबसे बड़ी जीत है. बीते चुनाव में पार्टी को कई सीटों का नुकसान हुआ था और और फिर गठबंधन में सरकार बनानी पड़ी थी.
हालांकि, इस चुनाव में पार्टी आला कमान ने बड़ी ही सूझबूझ के साथ रणनीति बनाई. मसलन, गैर जाट वोटों की लामबंदी, समुदायों के बीच ध्रुविकरण और नायब सिंह सैनी की ओबीसी जाति जैसे कुछ पांच फैक्टर हैं, जो पार्टी के लिए फायदेमंद रही. गैर-जाट वोटों पर फोकसहरियाणा में बीजेपी ने सत्ता विरोधी लहर का सामना करने के लिए कई अहम रणनीतियों पर काम किया है. इसमें सबसे अहम ये है कि बीजेपी ने गैर-जाट वोटों को लामबंद करने में कामयाबी हासिल की. पार्टी के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता की मानें तो, जहां जाट मतदाता अपनी मांगों को लेकर हमेशा मुखर रहते हैं, वहीं गैर-जाट समुदायों ने बीजेपी के स्वच्छ शासन का समर्थन किया है. इससे यह संकेत मिलता है कि गैर-जाटों ने बड़े पैमाने पर बीजेपी को वोट दिया है.यह भी पढ़ें: देश की सबसे अमीर महिला फिर बनीं हरियाणा की MLA, निर्दलीय लड़कर बीजेपी-कांग्रेस को हरायासमुदायों के बीच ध्रुविकरणबीजेपी ने हमेशा सभी समुदायों के लिए काम करने की बात कही, लेकिन पार्टी को लगता है कि हरियाणा में जाट हमेशा से अन्य समुदायों जैसे ओबीसी, पंजाबी, दलित पर दबदबा कायम करने की कोशिश करते रहे हैं. बीजेपी सूत्रों ने कहा कि हुड्डा के समर्थकों द्वारा खुले तौर पर सीएम के रूप में जाट का समर्थन करने से अन्य समुदायों के बीच ध्रुवीकरण हुआ और उन्होंने एक ही समुदाय के दबदबे के खिलाफ मतदान किया.Advertisementसैनी को चेहरा बनाना पार्टी के लिए फायदेमंदबीजेपी ने नायब सिंह सैनी को चेहरा बनाकर सत्ता विरोधी लहर का मुकाबला करने में मदद की. चूंकि सीएम सैनी ओबीसी समुदाय से आते हैं और पार्टी ने एक ओबीसी नेता को प्रमुखता देकर समुदाय का एक मजबूत समर्थन हासिल किया है. सैनी की साफ छवि और आम लोगों के साथ उनकी पहुंच ने भी इसमें योगदान दिया.खर्ची और पर्ची के आरोपों से भी हुआ लाभइनके अलावा, "खर्ची और पर्ची" के आरोपों ने भी बीजेपी की चुनाव जीतने में मदद की. एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा कि कांग्रेस के सत्ता में लौटने पर वसूली का रैकेट फिर से शुरू होने की आशंका फैलाकर पार्टी ने प्रभावी रूप से जनता को अपने पक्ष में किया है.यह भी पढ़ें: 'ऑल इज वेल'... किसान और जवान नहीं हैं नाराज! BJP की ये रणनीति हरियाणा में आई कामकिसान आंदलोन को भी प्रभावी ढंग से संभालावहीं, किसान आंदोलन के दूसरे चरण ने भी पार्टी को फायदा पहुंचाया. बीजेपी के एक नेता ने बताया कि पहले चरण के किसान आंदोलन के समय कानून व्यवस्था के मुद्दे को ध्यान में रखते हुए शंभू बॉर्डर पर उन्हें रोका, जो पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हुआ है. मसलन, अगर एक लाइन में कहें तो बीजेपी ने सत्ता विरोधी लहरे को संभालने में बड़ी कामयाबी हासिल की और यही वजह है कि पार्टी राज्य में बड़ी जीत हासिल की है.Advertisementबीजेपी की जीत का बोनसहरियाणा में बीजेपी के चार प्रभारी हैं - धर्मेंद्र प्रधान, बिप्लब कुमार देब, सुरेंद्र नागर और सतीश पूनिया. इन चार नेताओं ने लोकसभा की सीटों को आपस में बांटा और उन्हें संभाला. हर प्रभारी ने अपने प्रभार की लोकसभा सीट पर माइक्रोमैनेजमेंट किया. जातिगत समीकरणों को साधा, उम्मीदवारों का चयन उसी हिसाब से किया और मुद्दे तय किए.दलितों को अपने पाले में लाने के लिए बीजेपी ने विशेष रूप से काम किया. कुमारी सैलजा की नाराजगी को बीजेपी ने अपने पक्ष में किया. सीएम पद से खट्टर को हटाने का फैसला सही रहा. खट्टर के चेहरे को प्रचार से दूर रखा गया, ताकि लोगों में उन्हें लेकर नाराजगी न हो. किसान, जवान के मुद्दे ने काम किया और किसानों को 24 फसलों पर MSP और अग्निवीरों को पेंशन वाली नौकरी का वादा भी पार्टी के लिए फायदेमंद रहा. ये भी देखें
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