क्या विदेशी कंपनियां भारत के चुनाव में दे सकती हैं दखल? FCRA एक्ट में बदलाव से बढ़ी आशंका

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जानकारों के मुताबिक़ FCRA के कई संशोधनों से विदेशी स्रोत से राजनीतिक दलों को चंदा मिलना आसान हो गया है | prasannamohanty

इलेक्टोरल बॉन्ड से जहां अज्ञात स्रोतों के हवाले से आने वाले राजनीतिक चंदे के जारी रहने पर चुनाव आयोग ने चिंता जताई है, वहीं FCRA एक्ट में बदलाव से लोगों में यह चिंता बढ़ी है कि विदेशी कंपनियां भारतीय चुनावों में दखल दे सकती हैं.

जानकारों का मानना है कि फॉरेन कंट्रीब्यूशन एक्ट के कई संशोधनों से विदेशी स्रोत से राजनीतिक दलों को चंदा मिलना आसान हो गया है. FCRA एक्ट साल 1976 में बना था. वास्तव में इसका उद्देश्य राजनीतिक दलों को विदेशी प्रभाव से बचाना था. बाद में FCRA 2010 के द्वारा इसे और स्पष्ट किया गया. FCRA एक्ट 1976 की धारा 4 और FCRA 2010 की धारा 3 में कहा गया है, 'कोई भी राजनीतिक दल या उसका पदाधिकारी विदेश से कोई मदद स्वीकार नहीं कर सकता.' एफसीआरए के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करने पर पांच साल की जेल और या जुर्माना हो सकता है. जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 29 बी के मुताबिक भी राजनीतिक दल किसी विदेशी स्रोत या सरकारी कंपनियों से फंड नहीं ले सकते.FCRA 2010 और 1976 के मुताबिक किसी भी ऐसी कंपनी को विदेशी कंपनी माना जाता है जिसमें 50 फीसदी से ज्यादा शेयरहोल्ड‍िंग विदेशी हो. बीजेपी और कांग्रेस द्वारा विदेशी स्रोतों और कंपनियों से कथित रूप से चंदा लेने को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी और उन्हें नोटिस मिला था. साल 2014 में दिल्ली हाईकोर्ट ने यह माना कि दोनों पार्टियों ने एफसीआरए और आरपी एक्ट का उल्लंघन किया है और केंद्र सरकार से कहा कि छह माह के भीतर इनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए. लेकिन कार्रवाई करने की जगह केंद्र सरकार ने फाइनेंस बिल 2016 के द्वारा पहले तो FCRA 2010 में ही संशोधन कर इस तरह के उल्लंघनों को ही वैध बना दिया और दूसरे, इसका विस्तार FCRA एक्ट 1976 तक कर दिया यानी इसे 1976 से ही लागू मान लिया गया.इस बदलाव का मतलब यह हुआ कि यदि किसी भारतीय कंपनी में विदेशी शेयरहोल्ड‍िंग विदेशी निवेश के फेमा और अन्य नियमों के द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर है तो कंपनी के द्वारा चंदे को विदेशी स्रोत नहीं माना जाएगा. भले ही उसमें 50 फीसदी से ज्यादा विदेशी निवेश हो. इसका मतलब यह है कि विदेशी कंपनियां राजनीतिक दलों को चंदा देना जारी रख सकती हैं. दूसरी तरफ, केंद्र सरकार ने ग्रीनपीस इंडिया एनजीओ की विदेशी फंडिंग पर काफ सख्ती बरती है और पिछले वर्षों में हजारों एनजीओ के एफसीआर लाइसेंस रद्द किए गए हैं. नवंबर, 2018 में अपने रिटायरमेंट से पहले तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा था, 'चुनाव आयोग का यह मानना है कि चुनावों किसी भी तरह से विदेशी फंडिंग की इजाजत नहीं दी जा सकती.' लेकिन इसे रोकने के लिए चुनाव आयोग ने क्या कदम उठाए इसकी कोई जानकारी नहीं है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में कम से कम दो ऐसी याचिकाएं लंबित हैं जिसमें यह मांग की गई है कि केंद्र सरकार को बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ कार्रवाई करने को मजबूर किया जाए, जिन्होंने एफसीआर एक्ट का उल्लंघन किया है. यह भी मांग की गई है एक्ट में बदलाव को वापस लिया जाए. दोनों बड़े राजनीतिक दलों ने विदेशी स्रोतों और एसटीसी तथा एमएमटीसी जैसी सरकारी कंपनियों से चंदा लिया है और इसलिए उन पर एफसीआरए तथा आरपी एक्ट के उल्लंघन का आरोप है.

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