ये एक ऐसे हीरे की कहानी है जिसे हैदराबाद के छठे निजाम ने इतना अशुभ माना कि गंदे कपड़े में लपेट कर पुराने जूते के अंदर रख दिया. और ऐसी जगह सरका दिया कि देखना ही नहीं पड़े.
हम सभी ने प्रसिद्ध कोहिनूर हीरे के बारे में सुना है, जो इस समय टॉवर ऑफ़ लंदन में रखा है. क्या आप जानते हैं कि कोहिनूर से दोगुना बड़ा एक और हीरा अब भी भारत में मौजूद है? यह हीरा हैदराबाद के निज़ाम का था, जो कभी दुनिया के सबसे अमीर आदमी भी थे.
लेकिन इस हीरे जो बात दिलचस्प बनाती है, वो ये कि निजाम इस हीरे से इतना दूर भागता था कि इसे अपने एक पुराने जूते में छिपाकर रख दिया कि इस पर निगाह ही नहीं पड़े. इस हीरे को जैकब डायमंड के नाम से ज्यादा जाना गया. इसका भी किस्सा है. ये हीरा उसे रहस्यमयी व्यापारी से मिला था, जिसका नाम मिस्टर जैकब था. मिस्टर जैकब खुद बहुत रहस्यमयी था. वह खुद को जौहरी, ज्योतिषी, जादूगर, विद्वान, लेखक और व्यापारी सभी कुछ कहता था. चलिए इसकी पूरी कहानी ही जान लेते हैं. जैकब डायमंड की कहानी के तीन किरदार जैकब डायमंड की कहानी तीन बहुत ही रोचक किरदारों की कहानी है, हैदराबाद के छठे निज़ाम महबूब अली खान, उनका प्रमुख अर्मेनियाई सेवक अल्बर्ट आबिद और अलेक्जेंडर मैल्कम जैकब नामक एक रहस्यमयी जौहरी. 1890 के दशक में इस हीरे ने काफी विवाद खड़ा कर दिया था. तब आंध्र प्रदेश में हीरों की एक रहस्यमय घाटी थी कहा जाता है कि एक जमाने में भारत को दुनिया की हीरा राजधानी कहा जाता था. हालांकि ये बहुत पुरानी बात है. चाणक्य या कौटिल्य के लिखे ग्रंथ अर्थशास्त्र में ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से ही देश में हीरों का उल्लेख मिलता है. कहा जाता है कि भारत में हैदराबाद के आसपास कृष्णा नदी के पास एक गुप्त घाटी थी, जिसको हीरों की घाटी कहते थे. ऐसा लगता है कि ज़्यादातर हीरे कृष्णा-गोदावरी डेल्टा में पाए गए थे, जो आज के आंध्र प्रदेश में है. जैकब डायमंड की अजब कहानी. द एडवेंचर्स ऑफ सिंदबाद जैसी बेस्ट सेलर किताब में भी इस हीरों की घाटी का जिक्र हुआ. इसमें जहरीले कोबरा रहते थे. ऐसी कहानियां हैं कि कैसे चतुर व्यापारी घाटी में मांस के बड़े-बड़े टुकड़े गिराते थे ताकि हीरे मांस से चिपक जाएं. उनके पीछे चील भेज देते थे. ये प्रशिक्षित चील मांस के टुकड़े उठाकर व्यापारियों के पास वापस ले आती थीं. जिसमें हीरे चिपके होते थे. गोलकुंडा हीरे फेमस हुआ करते थे मार्को पोलो, वेनिस के यात्री जो भारत आए. उन्होंने 1293 ई. में आंध्र क्षेत्र का दौरा किया. उन्होंने भी यहां के हीरों का जिक्र किया. 16वीं शताब्दी तक, भारतीय हीरे गोलकुंडा के कुतुब शाही साम्राज्य के नाम पर ‘गोलकुंडा हीरे’ के नाम से लोकप्रिय थे. यहां बहुत से लोगों को हीरे कृष्णा नदी के किनारे समृद्ध जलोढ़ मिट्टी में मिले. हालांकि तब वहां के राजा ने कानून बना रखा था कि कोई भी हीरा जो एक तय आकार से बड़ा होगा, उसे खजाने में जमा करना होगा. और निजाम दुनिया के सबसे अमीर शख्स बन गए 18वीं शताब्दी तक कृष्णा घाटी डेल्टा से हीरे खत्म हो गए थे. यह वही समय था जब दक्कन के मुगल वायसराय मीर कमरुद्दीन खान ने अपना अर्ध-स्वतंत्र राज्य स्थापित किया. 1724 में खुद को हैदराबाद का पहला निज़ाम घोषित किया. दक्कन की अपार संपत्ति ने उनके वंशजों यानी निज़ामों को दुनिया के सबसे अमीर आदमी बना दिया. हैदराबाद के छठे निजाम महबूब अली खान छठे निजाम को हीरों के कलेक्शन का शौक था हैदराबाद के छठे निज़ाम मीर महबूब अली खान 1869 में हैदराबाद के सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली राज्य की गद्दी पर बैठे. उनके बारे में बहुत सी कहानियां कही जाती हैं. निजाम महबूब अली को जीवन में अच्छी चीजें पसंद थीं और हीरे इकट्ठा करने का विशेष शौक था. नौकर ने इतना कमाया कि बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर खोला महबूब अली खान का दाहिना हाथ उनका नौकर था, जो अल्बर्ट आबिद नामक अर्मेनियाई था. प्रसिद्ध हैदराबादी इतिहासकार डीएफ कराका ने लिखा है, ‘हर बार जब महबूब अली पाशा बटन खोलते थे या कपड़े बदलते थे तो आबिद वहां मौजूद होते थे. उन्हें निजाम की मदद करनी होती थी. वह तब निज़ाम के कपड़े, जूते, घड़ियाँ, आभूषण और अन्य सामान संभालते थे और देखरेख करते थे. चूंकि निजाम कभी एक सूट दो बार नहीं पहनता था लिहाजा आबिद इसका बहुत फायदा उठाता था. वो इसे या तो खुद ले लेता था या कुछ दिनों बाद निजाम को ही बेच देता था. आबिद ने निज़ाम को धोखा देकर इतना पैसा कमाया कि उसने हैदराबाद में एक बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर खोल लिया, जिसे आबिद के नाम से जाना जाता था. अब तो ये दुकान नहीं है लेकिन हैदराबाद में इस जगह का नाम आबिद स्क्वेयर जरूर है. निजाम के नौकर आबिद ने उसे खूब बेवकूफ बनाकर जमकर पैसा बनाया और 20वीं सदी के दूसरे दशक में हैदराबाद में बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोरी “आबिद्स” खोला. पसंद या नापसंद साथ ही आबिद किसी भी व्यापारी को निजाम तक पहुंचने के लिए भारी कमीशन भी लेता था. प्रोटोकॉल ये था कि जो वस्तुएं निज़ाम को पेश की जाएंगी, तब वह केवल एक शब्द बोलेगा – या तो ‘ पसंद ‘ या ‘ नापसंद ‘ . पहले वाली चीजों को कीमत की परवाह किए बिना खरीदा जाएगा, जबकि बाद वाले से कुछ नहीं लिया जाएगा. और शिमला का वो रहस्यमयी रत्न व्यापारी जब हैदराबाद में ये सब चल रहा था, तब उत्तर में शिमला में अलेक्जेंडर मैल्कम जैकब नामक रत्न और प्राचीन वस्तुओं का मशहूर व्यापारी था. वह पूरे ब्रिटिश भारत में एक विलक्षण व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध था, जिसके पास गहरे रहस्य थे. कोई नहीं जानता था कि वह कहां से आया या क्या करता था. कुछ लोग उसे रूसी जासूस बताते थे. कुछ की नजर में वह गुप्त कलाएं जानने वाला जादूगर था. उसने शिमला अपना फेसम घर भी बनवाया. वह बड़े ब्रिटिश अफसरों और राजाओं को गहने और एंटीक वस्तुएं बेचता था. एक किताब जो रहस्यमयी व्यापारी जैकब पर लिखी गई, उसमें उसका चित्र इस तरह बनाया गया. जैकब ने निजाम को बड़ा हीरा बेचने की योजना बनाई जैकब के खरीदारों में निजाम भी थे. 1891 में जैकब अपने जीवन का सबसे बड़ा सौदा करने की तैयारी कर रहा था. उसने दक्षिण अफ्रीका में निकाले गए 184.75 कैरेट के ‘इंपीरियल’ हीरे को 21 लाख रुपये में खरीदकर निज़ाम को 50 लाख रुपये में बेचने की योजना बनाई. सौदा पक्का होने पर आबिद को 5 लाख रुपये कमीशन देने का वादा किया. निजाम ने हीरे के लिए दी 23 लाख रुपए की पेशगी निजाम ने जैकब से कहा वो पसंद आने पर हीरा खरीद लेंगे लेकिन साथ में ये शर्त भी थी कि निज़ाम ये तय करने के लिए स्वतंत्र होंगे कि उन्हें ये पसंद है या नापसंद. निजाम ने पेशगी के तौर पर 23 लाख रुपए जैकब को बैंक में ट्रांसफर कर दिये, ताकि हीरे को भारत में को लाया जा सके. जब जैकब हीरा लेकर हैदराबाद आया तो निजाम ने उस पर एक नजर डाली और केवल एक शब्द बोला ‘ नापसंद’. फिर इस पर लंबा और चर्चित केस चला इसके बाद तो बड़ा विवाद हुआ. निजाम ने अपनी एडवांस रकम वापसी मांगी. मुकदमा चला. यह केस लंबा और महंगा था. इंटरनेशनल मीडिया में इसने सनसनी मचा दी. ये हीरा पेशगी की रकम नहीं लौटाने की स्थिति में निजाम के पास ही रहा. लेकिन इसे हैदराबाद में ‘ मनहूस ‘ या ‘अशुभ’ माना गया. मुकदमे जैकब बरी तो हो गया लेकिन लेकिन ना तो उसे शेष राशि मिली और ना ही हीरा. उस पर अदालत ने निजाम का स्वामित्व माना. निजाम ने इस हीरे को अशुभ और मनहूस माना निजाम इस हीरे से इतना नाखुश था और मनहूस मानता था उसने उसे गंदे कपड़े में लपेट कर एक पुराने जूते में रख दिया और दराज के पीछे धकेल दिया. जिससे इसकी शक्ल तक नहीं देखनी पड़े. बाद में इसी हीरे को सातवें निजाम ने मीर उस्मान अली खान ने पेपरवेट के रूप में इस्तेमाल किया. दरअसल छठे निजाम को सबसे बुरा ये लगा था कि इसके चलते उसे अदालत तक जाना पड़ा था. अब ये मुंबई में रिजर्व बैंक के पास दशकों बाद जैकब हीरा एक ट्रस्ट को हस्तांतरित कर दिया गया. 1995 में भारत सरकार ने इसे अधिग्रहित कर लिया. अब ये मुंबई में भारतीय रिजर्व बैंक की तिजोरियों में सुरक्षित है. अलेक्जेंडर जैकब ने जैकब डायमंड केस में न केवल पैसे गंवाए बल्कि अपनी प्रतिष्ठा भी खो दी. उसके ज़्यादातर ग्राहक उसे छोड़कर चले गए. उसने अपनी दुकान बेच दी। बाकी ज़िंदगी घुमक्कड़ की तरह गुज़ारी.
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