कैसे तय करेंगे पहाड़ की 100 मीटर ऊंचाई?: इससे छोटी सभी पहाड़ियों पर खनन का खतरा? अरावली से जुड़े 10 सवालों के ...

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कैसे तय करेंगे पहाड़ की 100 मीटर ऊंचाई?: इससे छोटी सभी पहाड़ियों पर खनन का खतरा? अरावली से जुड़े 10 सवालों के ...
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सुप्रीम कोर्ट ने 100 मीटर की ऊंचाई ही क्यों मानी? : आदेश के बाद अरावली खत्म हो जाने की आशंका कितनी सही, कैसे तय की जाएगी पहाड़ की 100 मीटर लंबाई राजस्थान सहित पूरे देश में सेव अरावली का कंपेन चल रहा है और अरावली

इससे छोटी सभी पहाड़ियों पर खनन का खतरा? अरावली से जुड़े 10 सवालों के जवाबराजस्थान सहित पूरे देश में अरावली बचाने की मुहिम चल रही है। मुहिम की शुरुआत हुई, जब सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा को मंजूरी दे दी। इस परिभाषा के अनुसारकांग्रेस इस मुद्दे पर लगातार केंद्र सरकार को घेर रही है। केंद्र सरकार और बीजेपी का दावा है कि यह परिभाषा पहले से ज्यादा सख्त है। इस फैसले का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले अरावली के सभी इलाके खनन के लिए खोल दिए जाएंगे।90% से ज्यादा पहाड़ 100 मीटर से कम ऊंचाई के हैं, क्या अब उनका वजूद खत्म हो सकता है?सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आखिर दशकों से अवैध खनन क्यों होता रहा है?भास्कर : अरावली में दशकों से अवैध खनन क्यों होता रहा? माफिया किस बात का फायदा उठाते रहे?दशकों से अरावली में अवैध खनन का मुद्दा बना हुआ है। खनन माफिया इन स्थितियों का फायदा उठाते रहे हैं.

..राजस्थान सहित अरावली वाले राज्य इन पहाड़ियों और रेंज की परिभाषा अपने-अपने तरीके से तय कर रहे हैं।भ्रम की स्थितियों के बीच अवैध खनन नहीं रोका जा सकता, जिसका फायदा माफिया उठा रहा है।भास्कर : सुप्रीम कोर्ट ने अरावली खनन मामले में कब और क्यों दखल किया? एक्सपर्ट : 1992 में एक्टिविस्ट एमसी मेहता दिल्ली में अरावली के अवैध खनन के विरोध में सुप्रीम कोर्ट गए। कोर्ट ने माना कि कोई स्पष्ट फॉर्मूला नहीं होने का फायदा माफिया उठा रहे हैं। 1996 में दिल्ली में अरावली इलाके में अवैध निर्माण पर और 2002 में दिल्ली एनसीआर में खनन पर पूरी तरह से रोक लगाई गई थी। 2009 में अरावली स्थित सभी जिलों में खनन पर पाबंदी लगा दी गई। राजस्थान और हरियाणा के अवैध खनन माफिया पर कार्रवाई के लिए कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बीच-बीच में कई आदेश दिए। अरावली में खनन को लेकर सही फॉर्मूला तय करने के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत मार्च 2024 में एक समिति गठित करने के आदेश दिए। मई 2024 में केंद्रीय सशक्त समिति का गठन किया गया। इस समिति में केंद्र और राज्यों के वन एवं पर्यावरण सचिव, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और भारतीय वन सर्वेक्षण के प्रतिनिधि शामिल रहे। इस समिति ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट दी। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत बनी समिति की सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को स्वीकार किया और इस परिभाषा को मान्यता दे दी है।पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत बनी समिति की सिफारिशों में बताया गया है कि किसी पहाड़ी को अरावली का हिस्सा तभी माना जाएगा, जब उसकी ऊंचाई 100 मीटर या उससे अधिक होगी। इसके अलावा कमेटी ने सिफारिशों में कहा है...खनन से पर्यावरण पर होने वाले प्रभाव की जांच हो संवेदनशील इलाकों में खनन पर पूरी रोक रहे। इनमें संरक्षित जंगल, जल स्रोत, टाइगर कॉरिडोर, एक्वीफर रिचार्ज जोन और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र शामिल हैं।सही मैपिंग और स्टडी पूरी होने तक कोई नई लीज या रिन्यूअल नहीं हो। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं सिफारिशों को माना है। 100 मीटर वाला फॉर्मूला राजस्थान सरकार द्वारा 2003 में खनन नीतियों के लिए अपनाया गया था, ताकि कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों पर खनन की अनुमति मिल सके, लेकिन विवाद लगातार चलता ही रहा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बनी समिति ने भी 100 मीटर का फॉर्मूला माना, फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी सिद्धांत को माना है। एक्सपट्‌र्स का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक बैलेंस निर्णय दिया है। कोर्ट की मंशा है कि अरावली का संरक्षण भी हो जाए और विशेष परिस्थितियों में खनन की स्वीकृतियां भी दी जाएं। भास्कर : 100 मीटर का फाॅर्मूला क्या पहाड़ की सीधी ऊंचाई के लिए माना जाएगा या चोटी से चारों ओर के ढलान इसमें शामिल होंगे? एक्सपर्ट : पहाड़ की पूरी और सभी संरचनाएं दायरे में आएंगी। जब पहाड़ की ऊंचाई की बात होती है तो इसका मतलब केवल चोटी की खड़ी ऊंचाई वाले पॉइंट से नहीं होता। पहाड़ की ऊंचाई में शिखर से लेकर जहां ढलान खत्म हुआ है, सारा पहाड़ इसमें शामिल होता है। पहाड़ की ऊंचाई में सभी तरह के ढलानें शामिल होता है, चाहे सीधा हो या झुका हो। भास्कर : सरकार का तर्क कितना उचित है कि 100 मीटर या इससे अधिक ऊंचे दो पहाड़ों के बीच सभी तरह की छोटी पहाड़ियों पर भी 100 मीटर वाले ही नियम लागू होंगे, चाहे दूरी आधा किलोमीटर ही क्यों न हो? एक्सपर्ट : सरकार का ये तर्क बिल्कुल सही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मकसद भी यही है। नई परिभाषा में अरावली श्रेणी को भी साफ किया गया है। इसमें कहा गया है कि अगर दो या उससे ज्यादा 100 मीटर वाली अरावली पहाड़ियां एक-दूसरे से पांच सौ मीटर के अंदर हैं, तो उन्हें अलग-अलग नहीं माना जाएगा। बीच की सभी पहाड़ियों को एक अरावली श्रेणी माना जाएगा। मतलब साफ है कि इन पहाड़ियों के बीच की जमीन, छोटे टीले और घाटियां भी उसी श्रेणी का हिस्सा होंगी। इससे ये तस्वीर साफ है कि ऐसी पहाड़ियों के बीच खनन या निर्माण नहीं हो सकेगा और पूरा क्षेत्र सुरक्षित रहेगा। भास्कर : पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कह रहे हैं कि ऊंचाई वाला फाॅर्मूला आने के बाद अरावली की छोटी पहाड़ियां खनन से नष्ट हो जाएंगी? एक्सपर्ट : पहली बात तो यह कि आमजन के बीच अरावली को लेकर जो आशंका है, वह निराधार नहीं कही जा सकती। चाहे कोई व्यक्ति कम पढ़ा-लिखा हो या ज्यादा, सभी को यह मालूम है कि अरावली राजस्थान के लिए जीवनदायिनी है। अरावली से राजस्थान को बहुत फायदा है। बड़ा खतरा लीगल खनन से नहीं है, बल्कि अवैध खनन से है। एफएसआई के आंतरिक आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में कुल 12,081 पहाड़ी ढलान वाले क्षेत्र हैं, जिनकी ऊंचाई 20 मीटर से ऊपर है। उनमें से केवल 1,048 पहाड़ियां ही 100 मीटर से अधिक ऊंची हैं। लगभग 8.7 प्रतिशत ही मापदंड पूरा करती हैं। अब सवाल यह है कि आमजन के बीच आशंकाएं कैसे पैदा हुईं? आसानी से समझा जा सकता है कि हमारे आस-पास या छोटे बड़े रास्तों पर हमने खत्म होती हुईं पहाड़ियां देखी हैं। ऐसे हालात में मन में धारणा बनता है कि अगर खनन होने लगेगा, तो सभी पहाड़ियां खत्म हो जाएंगी। सरकार को आमजन की आशंकाओं को देखते हुए अवैध खनन पर लगाम कसनी होगी। ताकि लोगों के बीच भरोसा कायम किया जा सके। इससे ही अरावली का संरक्षण हो सकेगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार, अरावली के लिए एक सतत खनन प्रबंधन योजना बनानी है। इसके तैयार होने तक नई खनन लीज पर रोक रहेगी। सरकार को इस प्लान में साफ बताना होगा कि अरावली का संरक्षण कैसे होगा। खनन आदि की प्रक्रिया उसके बाद ही होगी। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश सहित कांग्रेस के कई नेता अरावली को लेकर सरकार को घेर रहे हैं। भास्कर : केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का एक तर्क और है कि अरावली में इतने सारे रिजर्व क्षेत्र होता है। इस बफर जोन में भी खनन नहीं हो सकता। नियमानुसार देखें तो खनन के लिए काफी तरह की शर्तें होती हैं। सरकार खनन के क्षेत्र को चिह्नित करती है। खनन वहीं हो सकता है, जहां खनिज हों। संपूर्ण अरावली क्षेत्र खनन योग्य नहीं है। साफ है कि सरकार का तर्क काफी हद तक उचित लगता है कि अरावली के अधिकांश क्षेत्र में खनन नहीं हो सकता। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा है कि जब तक साइंटिस्ट अपना प्लान नहीं बना लेते हैं, तब तक अरावली में कोई नई खनन लीज नहीं दी जाएगी। कुल 1.44 लाख वर्ग किमी अरावली में सिर्फ 0.19% हिस्सा ही खनन के लायक है।अरावली के लिए सबसे बड़ा खतरा है अवैध खनन। इस पर कोई नियंत्रण नहीं है। वैध खनन की बात करें तो ये एक तकनीकी प्रक्रिया है। इसमें सरकार खनिज का अध्ययन करती है और ब्लॉक्स तय कर देती है। फिर प्राइवेट या सरकारी एजेंसी खनन करने से पहले कई प्रक्रियाओं से गुजरती हैं। अवैध खनन में ऐसा कुछ नहीं है। जब तक अवैध खनन पर रोक नहीं लगाई जाएगी, तो अरावली की रक्षा की कितनी बात कर लें, बेमानी रहेगी।सुप्रीम कोर्ट ने 100 मीटर ऊंची पहाड़ी को लेकर जो कहा है, उससे साफ है कि संबंधित पहाड़ियों पर किसी भी तरह का खनन संभव नहीं होगा। सरकार भविष्य में ऐसी पहाड़ियों पर खनन की अनुमति नहीं दे सकेंगी। सुप्रीम कोर्ट की दी गई गाइडलाइन के अनुसार, केंद्र और राजस्थान सहित अरावली वाले राज्यों की सरकारों को एक प्लान तैयार करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली के लिए एक सतत खनन प्रबंधन योजना बनाने का निर्देश दिया है। सरकार को इस प्लान में साफ बताना होगा कि अरावली का संरक्षण कैसे होगा? खनन आदि की प्रक्रिया उसके बाद ही होगी। इसके अलावा बचे क्षेत्र में अनुमति तभी दी जाएगी, जब केंद्र और राज्य सरकार एक विस्तृत प्लान तैयार करेंगे। प्लान में प्राकृतिक वातावरण के संरक्षण बनाए रखने पर ही फोकस होगा। प्लान तैयार करने से पहले अरावली में खनन की अनुमति नहीं दी जाएगी।अरावली राजस्थान के लिए जल, जलवायु और पर्यावरण संतुलन की रीढ़ है। यदि अरावली नहीं होती, तो...भूजल स्तर गिर जाएगा। वर्षा के पानी को अरावली की पहाड़ियां ही चैनलाइज करती हैं और बरसाती नदियों का रूप देती हैं। अरावली की वजह से मिट्टी अपनी जगह बनी रहती है। जब पहाड़ कटते हैं, तो मिट्टी बह जाती है और खेत बंजर हो जाते हैं। धूल भरी आंधी के लिए दीवार का काम करती है। पश्चिम की तरफ से आने वाली गर्म हवाओं और धूल भरी आंधियों को रोकती है। अरावली सांस की बीमारियां भी रोकती है। अरावली के विनाश से जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की कई प्रजातियां समाप्त हो जाएंगी। इससे प्रकृति का बैलेंस बिगड़ेगा।-------------------------------पीली हो जाएगी गुलाबी नगरी, बिना झीलों का उदयपुर; AI से देखिए अरावली खत्म होने के खतरे झीलों की नगरी उदयपुर में टूरिस्ट नहीं आएंगे। क्योंकि झीलों में पानी नहीं सिर्फ सूखे की दरारें होंगी। गुलाबी नगरी जयपुर का रंग धूल से पीला हो जाएगा। सूर्यनगरी जोधपुर में तापमान 50 डिग्री पहुंच जाएगा।MP में 4°C से नीचे पारा, पचमढ़ी सबसे ठंडाहरियाणा में 30 दिसंबर तक शीतलहर के आसारऔरंगाबाद में दिन-रात के टेम्प्रेचर में 1 डिग्री का अंतरबनारस में चल रही पछुआ हवा, कड़ाके की ठंड

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