केलि: भाषा शृंखला में एक शब्द

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केलि: भाषा शृंखला में एक शब्द
केलिहिंदीकेदारनाथ अग्रवाल
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आज की भाषा शृंखला में 'केलि' शब्द पर आधारित जानकारी, जिसका अर्थ है खेल, क्रीड़ा, रति, स्त्रीप्रसंग, हँसी-ठट्ठा। केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'खजुराहो के मंदिर' के माध्यम से इस शब्द को समझाया गया है, जिसमें खजुराहो के मंदिरों में कला, प्रेम, और विलास का वर्णन है।

' हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- केलि , जिसका अर्थ है- खेल, क्रीड़ा, रति, स्त्रीप्रसंग, हँसी-ठट्ठा। प्रस्तुत है केदारनाथ अग्रवाल की कविता - खजुराहो के मन्दिर चंदेलों की कला -प्रेम की देन-- देवताओं के मन्दिर बने हुए हैं अब भी अनिंद्य जो खड़े हुए हैं खजुराहो में, याद दिलाते हैं हम को उस गए समय की जब पुरुषों ने उमड़-उमड़ कर-- रोमांचित होकर समुद्र-सा, कुच-कटाक्ष वैभव-विलास की कला - केलि की कामिनियों को बाहु-पाश में बांध लिया था, और भोग-सम्भोग-सुरा का सरस पान कर, देश-काल को, जरा-मरण को भुला दिया था । चले गए वे कामकण्ठ-आभरण पुरुष-जन; चली गईं वे रूप-दीप-दीपित-बालाएँ; लोप हुई वे मदन-महोत्सव की लीलाएँ; शेष नहीं रह गईं हृदय की वे स्वर-ध्वनियाँ ! किन्तु मूर्तियाँ पुरुष-जनों की और मूर्तियाँ कामिनियों की ज्यों की त्यों निस्पन्द खड़ी हैं उसी तरह से देव-मन्दिरों की दीवारों पर विलास के हाव-भाव से । काल नहीं कर सका उन्हें खण्डित कृपाण से किन्तु किसी दुर्धर मनुष्य ने गदा मार कर कहीं-कहीं पर तनिक-तनिक-सा तोड़ दिया है; और आज तक इसीलिए वे उसे कोसती हैं क्षण-प्रतिक्षण । नर हैं तो आजानु-बाहु उन्नत ललाट-- रागानुराग-रंजित शरीर हैं, अधर-पान, कुच-ग्रहण, और आलिंगन में आसक्त लीन हैं। तिय हैं तो आकुलित केश-पट-नदी-वेश, कामातुर-मद विह्वल अधीर हैं, सदियों से पुरुषों की जांघों पर बैठी करती विहार हैं । इन्हें नहीं संकोच-शील है; यह मनोज के मन लोक के नर-नारी हैं, आदि काल से इसी मोद के अधिकारी हैं; चाहे हम-तुम कहें इन्हें, ये व्याभिचारी हैं ! हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।.

'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- केलि, जिसका अर्थ है- खेल, क्रीड़ा, रति, स्त्रीप्रसंग, हँसी-ठट्ठा। प्रस्तुत है केदारनाथ अग्रवाल की कविता- खजुराहो के मन्दिर चंदेलों की कला-प्रेम की देन-- देवताओं के मन्दिर बने हुए हैं अब भी अनिंद्य जो खड़े हुए हैं खजुराहो में, याद दिलाते हैं हम को उस गए समय की जब पुरुषों ने उमड़-उमड़ कर-- रोमांचित होकर समुद्र-सा, कुच-कटाक्ष वैभव-विलास की कला-केलि की कामिनियों को बाहु-पाश में बांध लिया था, और भोग-सम्भोग-सुरा का सरस पान कर, देश-काल को, जरा-मरण को भुला दिया था । चले गए वे कामकण्ठ-आभरण पुरुष-जन; चली गईं वे रूप-दीप-दीपित-बालाएँ; लोप हुई वे मदन-महोत्सव की लीलाएँ; शेष नहीं रह गईं हृदय की वे स्वर-ध्वनियाँ ! किन्तु मूर्तियाँ पुरुष-जनों की और मूर्तियाँ कामिनियों की ज्यों की त्यों निस्पन्द खड़ी हैं उसी तरह से देव-मन्दिरों की दीवारों पर विलास के हाव-भाव से । काल नहीं कर सका उन्हें खण्डित कृपाण से किन्तु किसी दुर्धर मनुष्य ने गदा मार कर कहीं-कहीं पर तनिक-तनिक-सा तोड़ दिया है; और आज तक इसीलिए वे उसे कोसती हैं क्षण-प्रतिक्षण । नर हैं तो आजानु-बाहु उन्नत ललाट-- रागानुराग-रंजित शरीर हैं, अधर-पान, कुच-ग्रहण, और आलिंगन में आसक्त लीन हैं। तिय हैं तो आकुलित केश-पट-नदी-वेश, कामातुर-मद विह्वल अधीर हैं, सदियों से पुरुषों की जांघों पर बैठी करती विहार हैं । इन्हें नहीं संकोच-शील है; यह मनोज के मन लोक के नर-नारी हैं, आदि काल से इसी मोद के अधिकारी हैं; चाहे हम-तुम कहें इन्हें, ये व्याभिचारी हैं ! हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

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