MP: OBC आरक्षण में बढ़ोतरी पर HC की रोक
भोपाल मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने मंगलवार को शैक्षणिक संस्थानों और सरकार नौकरियों में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के राज्य सरकार के फैसले पर रोक लगा दी है। इससे मध्य प्रदेश की कांग्रेसनीत कमलनाथ सरकार को अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बड़ा झटका लगा है। बता दें कि कमलनाथ सरकार ने गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने के प्रावधान के साथ राज्य में ओबीसी आरक्षण में वृद्धि का ऐलान किया था। इसके तहत राज्य में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया था। भोपाल की रहने वाली सुमन सिंह, जबलपुर की रहने वाली अर्पिता दुबे सहित कई अन्य लोगों ने सरकार के इस फैसले के खिलाफ कोर्ट में याचिका डाली थी। आरक्षण वृद्धि को बताया संविधान के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में बताया कि वे लोग NEET-2019 की परीक्षा में शामिल हुए थे और अगले हफ्ते से मेडिकल कॉलेजों में ऐडमिशन के लिए उनकी काउंसलिंग शुरू होनी थी। 8 मार्च 2019 को राज्य सरकार ने अध्यादेश के जरिए ओबीसी कोटे के आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का ऐलान कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि ओबीसी कोटा में आरक्षण वृद्धि संविधान के खिलाफ है। तमाम दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस आरएस झा और जस्टिस संजय द्विवेदी की पीठ ने सरकार के फैसले पर रोक लगा दी। कोर्ट ने सचिव से मांगा जवाब याचिकाकर्ताओं की तरफ से पैरवी कर रहे अधिवक्ता आदित्य संघी ने बताया कि अदालत ने इस मामले में मध्यप्रदेश चिकित्सा शिक्षा निदेशक एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को नोटिस जारी कर दो हफ्ते के अंदर जवाब भी मांगा है। उन्होंने कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश में ओबीसी आरक्षण पहले की तरह 14 प्रतिशत लागू रहेगा। 14 प्रतिशत से अधिक आरक्षण पर ही रोक लगाई गई है। सांघी ने पीठ को बताया कि वर्तमान में एससी वर्ग के लिए 16 प्रतिशत तथा एसटी वर्ग के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण है। ओबीसी वर्ग के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण था जिसे प्रदेश सरकार ने बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया है। इस प्रकार कुल आरक्षण का प्रतिशत 63 प्रतिशत पहुंच जायेगा। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए उन्होंने युगल पीठ को बताया कि किसी भी स्थिति में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। यह खबर अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
भोपाल मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने मंगलवार को शैक्षणिक संस्थानों और सरकार नौकरियों में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के राज्य सरकार के फैसले पर रोक लगा दी है। इससे मध्य प्रदेश की कांग्रेसनीत कमलनाथ सरकार को अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बड़ा झटका लगा है। बता दें कि कमलनाथ सरकार ने गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने के प्रावधान के साथ राज्य में ओबीसी आरक्षण में वृद्धि का ऐलान किया था। इसके तहत राज्य में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया था। भोपाल की रहने वाली सुमन सिंह, जबलपुर की रहने वाली अर्पिता दुबे सहित कई अन्य लोगों ने सरकार के इस फैसले के खिलाफ कोर्ट में याचिका डाली थी। आरक्षण वृद्धि को बताया संविधान के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में बताया कि वे लोग NEET-2019 की परीक्षा में शामिल हुए थे और अगले हफ्ते से मेडिकल कॉलेजों में ऐडमिशन के लिए उनकी काउंसलिंग शुरू होनी थी। 8 मार्च 2019 को राज्य सरकार ने अध्यादेश के जरिए ओबीसी कोटे के आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का ऐलान कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि ओबीसी कोटा में आरक्षण वृद्धि संविधान के खिलाफ है। तमाम दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस आरएस झा और जस्टिस संजय द्विवेदी की पीठ ने सरकार के फैसले पर रोक लगा दी। कोर्ट ने सचिव से मांगा जवाब याचिकाकर्ताओं की तरफ से पैरवी कर रहे अधिवक्ता आदित्य संघी ने बताया कि अदालत ने इस मामले में मध्यप्रदेश चिकित्सा शिक्षा निदेशक एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को नोटिस जारी कर दो हफ्ते के अंदर जवाब भी मांगा है। उन्होंने कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश में ओबीसी आरक्षण पहले की तरह 14 प्रतिशत लागू रहेगा। 14 प्रतिशत से अधिक आरक्षण पर ही रोक लगाई गई है। सांघी ने पीठ को बताया कि वर्तमान में एससी वर्ग के लिए 16 प्रतिशत तथा एसटी वर्ग के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण है। ओबीसी वर्ग के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण था जिसे प्रदेश सरकार ने बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया है। इस प्रकार कुल आरक्षण का प्रतिशत 63 प्रतिशत पहुंच जायेगा। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए उन्होंने युगल पीठ को बताया कि किसी भी स्थिति में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। यह खबर अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
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