मूवी रिव्यू: जानिए कैसी है अली फजल और श्रद्धा की 'मिलन टॉकीज'
Scroll for moreआपने जब 'हासिल', 'पान सिंह तोमर' और 'साहब बीवी और गैंग्सटर' जैसी अर्थपूर्ण फिल्में बनाई हों तो आपसे उम्मीदों और अपेक्षाओं का होना तो बनता है, मगर आप रोमांटिक ड्रामा को चटपटा बनाने के चक्कर में उसमें इतने मसाले डाल देते हैं कि जायका बिगड़ जाता है। हम बात कर रहे हैं, तिग्मांशु धूलिया की ताजा-तरीन फिल्म '' की, जिस पर तिग्मांशुं तमाम कोशिशों के बावजूद अपनी पकड़ नहीं बना पाए। बॉलिवुड पर यों भी इन दिनों उत्तर भारत छाया हुआ है, तो 'मिलन टॉकीज' की कहानी भी उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इलाहाबाद में सेट है, जहां फिल्मों का दीवाना अनिरुद्ध उर्फ अनु एक दिन बहुत बड़ा निर्देशक बनने के सपने देख रहा है। उसकी इस ख्वाहिश में उसके दोस्त भी साथ हैं। फिल्म मेकिंग के साथ-साथ अनु चीटिंग करके बुद्धू स्टूडेंट्स को पास कराने का गैरकानूनी काम भी करता है। अनु के पिता भी हिंदी फिल्मों के जबरा फैन हैं और खुद को धर्मेंद्र समझकर उन्हीं के अंदाज में जीते हैं। उन्हीं के इलाके का गुंडा प्रेमी जोड़ी के सख्त खिलाफ है और जिस जोड़े को प्यार की पेंगे बढ़ाते देखता है, मारने और खदेड़ने से बाज नहीं आता। एग्जाम में चीटिंग कराने के सिलसिले में अनु की मुलाकात पंडित की बेटी मैथिली से होती है और दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं। मैथिली की शादी होनेवाली है, मगर इसी शर्त पर कि वह अपने एग्जाम में अच्छे मार्क्स ले आए। अनु मैथिली को चीटिंग कर पास कराने के तरह-तरह के अनोखे नुस्खे अपनाता है और कहानी में एक पॉइंट ऐसा आता है, जब मैथिली की शादी होनेवाली है और अनु के पास मैथिली को घर से भगाने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता। घर से भागने के दौरान उन्हें पकड़ लिया जाता है। अनु को मुंबई भागना पड़ता है। तीन साल बाद अनु बड़ा डायरेक्टर बनकर अपने शहर वापस आता है, मगर तब तक हालात बदल चुके हैं। मैथिली की शादी लोकल गुंडे से कर दी गई है। मैथिली और अनु एक बार फिर मिलते हैं और अब वे हमेशा के लिए एक हो जाना चाहते हैं, मगर क्या यह संभव हो पाएगा? यह तो आप फिल्म देखने के बाद ही जान पाएंगे।निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने अपनी रोमांटिक कॉमिडी के लिए मजेदार सीन्स चुने, मगर कई ट्रैक्स में चलनेवाली कहानी पर उनका नियंत्रण नहीं रहा। फर्स्ट हाफ में स्क्रीनप्ले के घालमेल के कारण समझ में नहीं आता कि क्या हो रहा है। सेकंड हाफ में कहानी सीरियस होने के बाद रफ्तार पकड़ती है, मगर प्रिडिक्टिबल हो जाती है। फिल्म में कई दिलचस्प पंच हैं, जो माहौल को खुशनुमा और एंटेरटेनिंग बनाए रखते हैं, मगर फिर एक हद के बाद फिल्म की 2 घंटे 10 मिनट की लंबाई खेलने लगती है। हालांकि फिल्म के ट्रीटमेंट के लिए तिग्मांशु की तारीफ करनी होगी। फिल्म का क्लाइमैक्स कमजोर है।फिल्म दर फिल्म संवरते जा रहे हैं। फिल्म में वह पिटे भी खूब हैं, मगर सहजता से। अपनी भूमिका में उन्होंने सही संतुलन साधा है। साउथ ऐक्ट्रेस श्रद्धा इस फिल्म से अपना बॉलिवुड डेब्यू कर रही हैं। उन्होंने मैथिली की भूमिका को खूबसूरती से निभाया है। वह और अली परदे पर अच्छे लगे हैं। तिग्मांशु धूलिया ने हिंदी फिल्मों के दीवाने के रूप में अपने चरित्र द्वारा भरपूर मनोरंजन किया है। वे जब भी पर्दे पर आते हैं, मुस्कान आ जाती है। लंबे अरसे बाद पर्दे पर नजर आए सिकंदर खेर ने लोकल गुंडे की भूमिका में अपना दम दिखाया है। आशुतोष राणा अपनी भूमिकाओं में कभी नहीं चूकते। यहां भी नहीं चुके, मगर उनके चरित्र को और बेहतरीन ढंग से लिखा जाना चाहिए था। दीपराज राणा अलग अंदाज में नजर आए हैं। दोस्तों की भूमिकाओं में सभी कलाकारों ने राहत दी है। संजय मिश्रा हमेशा की तरह अच्छे रहे। आकृति कक्कर और राना मजूमदार के संगीत में कुछ गाने अच्छे बन पड़े हैं।क्लाइमैक्स अलर्ट! अगर फिल्म देख चुके हैं, तभी आगे पढ़ें, वरना फिल्म देखने से पहले ही आप जान जाएंगे फिल्म की पूरी कहानी क्लाइमैक्स के साथ.
Scroll for moreआपने जब 'हासिल', 'पान सिंह तोमर' और 'साहब बीवी और गैंग्सटर' जैसी अर्थपूर्ण फिल्में बनाई हों तो आपसे उम्मीदों और अपेक्षाओं का होना तो बनता है, मगर आप रोमांटिक ड्रामा को चटपटा बनाने के चक्कर में उसमें इतने मसाले डाल देते हैं कि जायका बिगड़ जाता है। हम बात कर रहे हैं, तिग्मांशु धूलिया की ताजा-तरीन फिल्म '' की, जिस पर तिग्मांशुं तमाम कोशिशों के बावजूद अपनी पकड़ नहीं बना पाए। बॉलिवुड पर यों भी इन दिनों उत्तर भारत छाया हुआ है, तो 'मिलन टॉकीज' की कहानी भी उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इलाहाबाद में सेट है, जहां फिल्मों का दीवाना अनिरुद्ध उर्फ अनु एक दिन बहुत बड़ा निर्देशक बनने के सपने देख रहा है। उसकी इस ख्वाहिश में उसके दोस्त भी साथ हैं। फिल्म मेकिंग के साथ-साथ अनु चीटिंग करके बुद्धू स्टूडेंट्स को पास कराने का गैरकानूनी काम भी करता है। अनु के पिता भी हिंदी फिल्मों के जबरा फैन हैं और खुद को धर्मेंद्र समझकर उन्हीं के अंदाज में जीते हैं। उन्हीं के इलाके का गुंडा प्रेमी जोड़ी के सख्त खिलाफ है और जिस जोड़े को प्यार की पेंगे बढ़ाते देखता है, मारने और खदेड़ने से बाज नहीं आता। एग्जाम में चीटिंग कराने के सिलसिले में अनु की मुलाकात पंडित की बेटी मैथिली से होती है और दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं। मैथिली की शादी होनेवाली है, मगर इसी शर्त पर कि वह अपने एग्जाम में अच्छे मार्क्स ले आए। अनु मैथिली को चीटिंग कर पास कराने के तरह-तरह के अनोखे नुस्खे अपनाता है और कहानी में एक पॉइंट ऐसा आता है, जब मैथिली की शादी होनेवाली है और अनु के पास मैथिली को घर से भगाने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता। घर से भागने के दौरान उन्हें पकड़ लिया जाता है। अनु को मुंबई भागना पड़ता है। तीन साल बाद अनु बड़ा डायरेक्टर बनकर अपने शहर वापस आता है, मगर तब तक हालात बदल चुके हैं। मैथिली की शादी लोकल गुंडे से कर दी गई है। मैथिली और अनु एक बार फिर मिलते हैं और अब वे हमेशा के लिए एक हो जाना चाहते हैं, मगर क्या यह संभव हो पाएगा? यह तो आप फिल्म देखने के बाद ही जान पाएंगे।निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने अपनी रोमांटिक कॉमिडी के लिए मजेदार सीन्स चुने, मगर कई ट्रैक्स में चलनेवाली कहानी पर उनका नियंत्रण नहीं रहा। फर्स्ट हाफ में स्क्रीनप्ले के घालमेल के कारण समझ में नहीं आता कि क्या हो रहा है। सेकंड हाफ में कहानी सीरियस होने के बाद रफ्तार पकड़ती है, मगर प्रिडिक्टिबल हो जाती है। फिल्म में कई दिलचस्प पंच हैं, जो माहौल को खुशनुमा और एंटेरटेनिंग बनाए रखते हैं, मगर फिर एक हद के बाद फिल्म की 2 घंटे 10 मिनट की लंबाई खेलने लगती है। हालांकि फिल्म के ट्रीटमेंट के लिए तिग्मांशु की तारीफ करनी होगी। फिल्म का क्लाइमैक्स कमजोर है।फिल्म दर फिल्म संवरते जा रहे हैं। फिल्म में वह पिटे भी खूब हैं, मगर सहजता से। अपनी भूमिका में उन्होंने सही संतुलन साधा है। साउथ ऐक्ट्रेस श्रद्धा इस फिल्म से अपना बॉलिवुड डेब्यू कर रही हैं। उन्होंने मैथिली की भूमिका को खूबसूरती से निभाया है। वह और अली परदे पर अच्छे लगे हैं। तिग्मांशु धूलिया ने हिंदी फिल्मों के दीवाने के रूप में अपने चरित्र द्वारा भरपूर मनोरंजन किया है। वे जब भी पर्दे पर आते हैं, मुस्कान आ जाती है। लंबे अरसे बाद पर्दे पर नजर आए सिकंदर खेर ने लोकल गुंडे की भूमिका में अपना दम दिखाया है। आशुतोष राणा अपनी भूमिकाओं में कभी नहीं चूकते। यहां भी नहीं चुके, मगर उनके चरित्र को और बेहतरीन ढंग से लिखा जाना चाहिए था। दीपराज राणा अलग अंदाज में नजर आए हैं। दोस्तों की भूमिकाओं में सभी कलाकारों ने राहत दी है। संजय मिश्रा हमेशा की तरह अच्छे रहे। आकृति कक्कर और राना मजूमदार के संगीत में कुछ गाने अच्छे बन पड़े हैं।क्लाइमैक्स अलर्ट! अगर फिल्म देख चुके हैं, तभी आगे पढ़ें, वरना फिल्म देखने से पहले ही आप जान जाएंगे फिल्म की पूरी कहानी क्लाइमैक्स के साथ
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